हमारे बारे में

शोधार्थी मात्र एक शोध पत्रिका ही नहीं वरन एक बौद्धिक आन्दोलन है.इसका उद्देश्य समाज विज्ञान के हिंदी भाषी छात्रों को ज्ञान की स्पर्धा में अंग्रेजी भाषी छात्रों के साथ सशक्त प्रतियोगिता करने योग्य बनाना है.

हिंदी भाषी और गैर-अंग्रेज़ी भाषी छात्र प्रायः अपने विषय में होने वाले गंभीर ज्ञान से वंचित रह जाते हैं क्योंकि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर होने वाले विषयगत विमर्शों और वाद-विवादों का संचालन अंग्रेजी में होता है. इस प्रकार ज्ञान की अद्भुत सम्पदा पर मुट्ठी भर अंग्रेजी बोलने वालों का जैसे एकाधिकार सा हो जाता है. यह ज्ञान के क्षेत्र में एक प्रकार का उपनिवेशवाद जैसा लगता है. राजनीतिक उपनिवेशवाद को आज बौद्धिक उपनिवेशवाद ने विस्थापित कर दिया है और हम कुछ नहीं कर पा रहे हैं.और इसका दुष्परिणाम हमारे गैर-अंग्रेज़ी भाषी छात्रों को भुगतना पड़ रहा है.

इन चुनौतियों से निपटने के लिए भारतीय विद्वानों के एक समूह द्वारा शुरू की गई शोध पत्रिका एक छोटी पर सशक्त पहल है. वर्ष २००४ में पुणे विश्वविद्यालय में लोकनीति, विकासशील समाज अध्ययनपीठ (सी एस डी एस) नई दिल्ली की एक बैठक हुई. उसमे देश भर का प्रतिनिधित्व करने वाले विद्वानों ने भाग लिया.

उस बैठक में लोकनीति, विकासशील समाज अध्ययनपीठ (सी एस डी एस), नई दिल्ली के निदेशक प्रोफेसर वी० बी० सिंह, डी० एल० शेठ (सीनियर फेलो), योगेन्द्र यादव (सीनियर फेलो), संजय कुमार (फेलो) तथा प्रोफेसर के सी सूरी (हैदराबाद यूनिवर्सिटी), प्रोफेसर कोटेश्वर प्रसाद (मद्रास यूनिवर्सिटी), प्रोफेसर प्रियवदन पटेल (बड़ोदा यूनिवर्सिटी), प्रोफेसर रमेश चौहान (हिमांचल यूनिवर्सिटी), प्रोफेसर रेखा चौधरी (जम्मू यूनिवर्सिटी), प्रोफेसर सुहास पल्शिकर (पुणे यूनिवर्सिटी), प्रोफेसर संदीप शास्त्री (बंगलुरु यूनिवर्सिटी), प्रोफेसर गोपा कुमार (केरल यूनिवर्सिटी), प्रोफेसर पीटर डी सूजा (गोवा यूनिवर्सिटी), प्रोफेसर रामशंकर (जबलपुर यूनिवर्सिटी), प्रोफेसर अमिय कुमार चौधरी (कोलकता यूनिवर्सिटी), प्रोफेसर संजय लोढ़ा (उदयपुर यूनिवर्सिटी) एवं डॉ ए० के० वर्मा (कानपुर यूनिवर्सिटी) आदि उपस्थित थे.

विद्वानों के इस समूह ने निर्णय लिया कि बौद्धिक उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष को एक रचनात्मक स्वरुप दिया जाये. इस सम्बन्ध में डॉ ए० के० वर्मा (विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान विभाग, क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर) ने एक प्रस्ताव दिया जिसके अंतर्गत एक ऐसी शोध पत्रिका का प्रकाशन करने का सुझाव था जो हिंदी भाषी छात्रों को अंग्रेजी में प्रवाहित समाज विज्ञान की ज्ञान गंगा से जोड़ सके. विद्वानों ने वह प्रस्ताव सर्वसम्मत स्वीकार किया. उसी पत्रिका को ‘शोधार्थी’ का नाम दिया गया.

शोधार्थी में प्रकाशित लेखों का चयन एक राष्ट्रीय विमर्श की प्रक्रिया से होता है जिसमें शोधार्थी के परामर्श मंडल और सम्पादक मंडल के सदस्यों के अतिरिक्त अनेक विद्वान् भाग लेते हैं. केवल उन लेखों को ही चुना जाता है जो अंग्रेजी की किसी शोध पत्रिका में पूर्व प्रकाशित हो चुके हों और जो ज्ञान के क्षेत्र में कुछ नवीन योगदान कर रहे हों. उन लेखों को हम पूरा का पूरा नहीं देते वरन कोशिश करते हैं कि अति संक्षेप में उस लेख के महत्वपूर्ण मुद्दों, उसमें दिए गए तर्कों और तथ्यों को छात्रों के समक्ष लाया जाये. उद्देश्य यह होता है कि हिदीं भाषी छात्र समाज विज्ञान की विविध विधाओं में होने वाली गहन ज्ञान-चर्चाओं और विमर्शों से जुड़ सके. इसके लिए हम दो बातों का विशेष ध्यान रखते हैं.

एक, मूल शोध पत्र की गूढ़ बातों को अति-सरल ढंग से छात्रों को प्रस्तुत किया जाये. इसके लिए शोधार्थी अनुवाद के स्थान पर पुनर्लेखन की शैली अपनाती है. ऐसा इसलिए क्योंकि अनुवाद से विषय को समझाया नहीं जा सकता. अनुवाद से प्रस्तुतीकरण अत्यंत दुरूह हो जाता है. फिर समाज विज्ञान की विभिन्न विधाओं में अंग्रेजी में होने वाले विमर्शों को हिंदी में प्रस्तुत करने की कोई भाषाई संस्कृति ही नहीं है. अतः, हमें पुनर्लेखन की एक नई शैली तलाशनी पड़ी. हम मूल विषय को समझ कर उसे आत्मसात करने का प्रयास करते हैं और फिर उसे अपने शब्दों में अभिव्यक्त करते हैं. पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि किसी तरह छात्रों को अत्यंत गूढ़ और गंभीर विषयों को समझाया जा सके.

दो, शोधार्थी भाषा के स्तर पर अत्यंत संवेदनशील है और हम छात्रों में सरल, मौलिक और संप्रेषणीय भाषा की संस्कृति विकसित करना चाहते हैं. भाषा न केवल ज्ञान प्राप्त करने का साधन है वरन वह सशक्तिकरण का माध्यम भी है. आज फर्राटे से अंग्रेजी बोलने वाले और न बोल पाने वाले छात्रों में न केवल ज्ञान के स्तर पर फर्क आ जाता है वरन जीवन में प्रगति और उन्नयन में भी वह फर्क दिखाई देता है. इसीलिए शोधार्थी भाषा की शुद्धता से समझौता किये बिना सरलतम भाषा के प्रयोग का प्रयास करती है.

अपने इस प्रयास में हमें बहुत कठिनाई आती है. इसका कारण यह है की शोधार्थी जैसे कार्य के लिए हमें ऐसे विद्वानों की ज़रुरत पड़ती है जो – एक, अंग्रेजी और हिंदी दोनों ही भाषाओं में प्रवीण हों; दो, वे समाज विज्ञान की किसी विधा से अवश्य जुड़े हों अन्यथा वे विषयगत विमर्शों और उसकी दुरुहता को समझ ही नहीं पायेंगे; तीन, वे शोधार्थी जैसी समाजसेवा के कार्य में समय दे सकने की स्थिति में हों. ऐसे विद्वानों की हमें तलाश है.

पिछले लगभग दस वर्षों से तमाम कठिनाइयों के बावजूद भी हम शोधार्थी का प्रकाशन कर पा रहे हैं. लेकिन हम शोधार्थी को त्रैमासिक न बना पाए. कारण यह है कि शोधार्थी की गुणवता के प्रति हमारी प्रतिबद्धता है; उसे त्रैमासिक बनाने के प्रति नहीं. लेकिन जिस प्रकार से पूरे देश से विद्वानों का आशीर्वाद और छात्रों का स्नेह शोधार्थी को मिला है वह हमें अपनी प्रतिबद्धताओं के प्रति और संकल्पशील बनाता है. आशा है कि शीघ्र ही हम अपने उद्देश्य में सफल होंगे.

शोधार्थी को एक बौद्धिक आन्दोलन बनाने में हमें आप सभी के सहयोग की आवश्यकता है.

डॉ अनिल कुमार वर्मा

सम्पादक (शोधार्थी)