वाल्ज़र : उदारवाद की समुदायवादी समालोचना

(माइकल वाल्ज़र के विचारों को अभिव्यक्त करने वाला यह लेख स्वयं वाल्ज़र द्वारा लिखित है. यह लेख पूरी समुदायवादी परम्परा को व्यक्त करता है. वाल्जर द्वारा स्वयं इस लेख को शोधार्थी में प्रकाशित करने की अनुमति दी गई, इसके लिये हम उनका ह्रदय से आभार व्यक्त करते हैं) – सम्पादक

जोसेफ एल. स्टास : फैशन आमतौर पर लोकप्रिय संगीत, कला और पहनावे की तरह ही कुछ समय के लिए होते हैं. किन्तु इनमें से कुछ फैशन घूम-फिरकर, कुछ समय बाद पुन: आ जाते हैं. समुदायवादी चिंतन भी कुछ इसी प्रकार का है. यह उदारवादी राजनीति और सामाजिक संगठन का बार-बार सामने आने वाला स्वरूप है. कोई भी उदारवादी सफलता इसे पूर्णत: अनाकर्षक नहीं बना सकती और कोई भी समुदायवादी समालोचना उदारवाद के एक अस्थायी लक्षण से अधिक की नहीं हो सकती.

समुदायवाद की तुलना सामाजिक लोकतन्त्र से की जाती है जिसने उदारवादी राजनीति के साथ अपना अस्तित्व सुनिश्चित किया. सामाजिक लोकतंत्र के कई समालोचनात्मक पहलू अराजकतावादी और उदारवादी चरित्र के हैं. चूंकि सामाजिक लोकतंत्र के कुछ लक्षण समुदायवादी हैं, अत: समुदायवादी उसकी कम और उदारवाद की ज्यादा आलोचना करते हैं. समुदायवाद भी इस समालोचना से पूर्णत: बच नहीं पाता क्योंकि उदारवादी और सामाजिक लोकतंत्रवादी दोनों ही आर्थिक विकास के पक्षधर हैं और विकासजनित सामाजिक स्वरूपों से सम्बन्ध रखते हैं. आधुनिक समाज में समुदाय स्वयं एक आदर्शवादी अस्तित्व के रूप में सामने आता है अत: इसकी अधिक आलोचना नहीं होती. समुदायवादी उदारवाद की दो परस्पर विधी आलोचनाएं करते हैं: कुछ आलोचनाएं उदारवाद के ‘व्यावहारिक स्वरूप’ की होती हैं, तो कुछ उसके ‘सैद्धान्तिक’ स्वरूप की.

समुदायवादी आलोचना के प्रथम तर्क के अनुसार, उदारवादी राजनीतिक सिद्धांत उदारवादी सामाजिक परिपाटी को सही ढंग से प्रस्तुत करते हैं. पाश्चात्य समाज, विशेषकर अमेरिकी समाज समाज से पूर्णत: कटे हुए व्यक्तियों, वैचारिक अहमवाद और अधिकारों द्वारा सुरक्षित एवं विभक्त व्यक्तियों का निवास है. उदारवाद हमें उदारवादियों द्वारा स्थापित समाजविहीन समाज के बारे में बताता है और परम्पराओं और समुदायों के विरूद्ध उनके संघर्ष के बारे में बताता है.

michael walzar

युवा मार्क्स ने अपने लेखन में समुदायवादी चिंतन के प्रारम्भिक स्वरूप को दर्शाया है और सन् 1840 में दिया हुआ उनका तर्क आज भी दमदार है. मेकण्टायर के आधुनिक बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन की विसंगतियों का वर्णन और आख्यात्मक योग्यता की कमी भी एक अद्यतन, विकसित और सैद्धांतिक भाषा में अपना प्रभाव छोड़ती है. किन्तु समुदायवादी चिंतन के लिए उदारवाद स्वयं ही आवश्यक सिद्धांत है. समालोचकों को उदारवादी सिद्धांत को ही गंभीरतापूर्वक लेना चाहिये. एक व्यक्ति का अपनी इच्छाओं द्वारा प्रेरित होना, समस्त संबंधों से मुक्त हो जाना, सामान्य मूल्यों को महत्व न देना, रीति-रिवाजों और परंपराओं से विलग होकर रहना आदि का विचार उसके मूल्यों का ह्रास करने के लिए किया जाना चाहिए. यह वास्तव में मूल्यों का पूर्णत: अनुपस्थित होना है. ऐसे व्यक्ति का वास्तविक जीवन कैसा होगा ? यदि ऐसा व्यक्ति अपनी योग्यताओं को बढ़ाने लगे तो सभी एक दूसरे से लड़ाई पर आमदा हो जाएगें और एक चूहा-दौड़ शुरू हो जाएगी जिसमें हॉब्स के अनुसार कोई और लक्ष्य या उपलब्धि नहीं होगी-  मात्र सबसे आगे रहना ही महत्वपूर्ण होगा. यदि ऐसा व्यक्ति अपने अधिकारों का उपयोग करेगा तो सामाजिक ताना-बाना नष्ट हो जाएगा और समाज एक दूसरे से विलग व्यक्तियों का रूप ले लेगा.

ऐसा समाज अलगाव, तलाक, अवसाद, अकेलापन, निजता और राजनीतिक उदासीनता को व्यक्त करता है. अंत में व्यक्ति का जीवन उपयोगिता एवं अधिकारों तक सिमट कर, एक विसंगतिपूर्ण जीवन का स्वरूप ले लेगा. उदार समाज में पुरुषों और महिलाओं को कोई एक समान नैतिक संस्कृति उपलब्ध नहीं होती जिसके अनुसार वे औचित्यपूर्ण जीवन जी सकें. इसमें कोई सर्वसहमति, कोई मानसिक जुड़ाव, अच्छे जीवन की प्रकृति पर कोई विचार नहीं होता और इसी कारण व्यक्ति की निजी सनक और उच्छृंखलता दृष्टिगोचर होती है.

इस प्रथम समुदायवादी आलोचना के अनुसार, उदार समाज व्यवहार में विखण्डन उत्पन्न करता है जबकि समुदाय इसका बिल्कुल विपरीत है जो सुसंगति, पारस्परिकता और संवादात्मकता का पोषक है. यदि उदारवादी सिद्धांत का समाजशास्त्रीय तर्क सही है, समाज वास्तव में नष्ट हो रहा है और शेष बचते हैं केवल समस्या उत्पन्न करने वाले तो हम मान सकते हैं कि उदारवादी राजनीति इस विनाश  से निपटने का सबसे कारगर माध्यम है. पर, यदि हम ढेर सारे एकाकी व्यक्तियों का एक कृत्रिम और गैर-एतिहासिक संगठन बनाना चाहते हैं तो क्यों न हम अपने प्रारम्भिक बिन्दु या प्राकृतिक अवस्था से शुरुआत करें ? क्यों न हम उदारवादी दृष्टिकोण के अनुसार प्रक्रियात्मक न्याय को ‘अच्छाई’ से श्रेष्ठ मान लें क्योंकि विखंडित समाज में अच्छाई पर एकमत होना मुश्किल है. माइकल संडल पूछते हैं कि क्या कोई समुदाय जो न्याय को सर्वोपरि मानता हो वह अपरिचितों के समुदाय से श्रेष्ठ हो सकता है? यह प्रश्न अच्छा है किन्तु इसका उल्टा रूप अधिक प्रासंगिक है: यदि हम वास्तव में अपरिचितों का समुदाय हैं तो हम न्याय को सर्वोपरि मानने के सिवाय कर भी क्या सकते हैं ?

उदारवाद की द्वितीय समुदायवादी आलोचना के द्वारा हम इस तर्क से बच गए हैं. द्वितीय आलोचना का मानना है कि उदारवादी सिद्धांत वास्तविक जीवन को सही ढंग से व्यक्त नहीं करता. स्त्री-पुरुष समस्त सामाजिक बंधनों से मुक्त, प्रत्येक व्यक्ति मात्र अपने जीवन का सृजनकर्ता हो, कोई सीमाएं न हो, कोई सामान्य मानक न हो, ये सब मात्र काल्पनिक बातें हैं. व्यक्तियों का कोई भी समूह एक दूसरे से अपरिचित कैसे हो सकता है जब समूह का हर सदस्य अपने माता-पिता से उत्पन्न हुआ हो, जब इन माता-पिता के मित्र, पड़ोसी, रिश्तेदार, साथी, समान धर्मावलंबी और साथी नागरिक हों. ये सब सम्बन्ध चुने होने की अपेक्षा प्राकृतिक रूप से प्राप्त हैं. उदारवाद शुद्ध निजी बंधनों का महत्व बढ़ा सकता है, किन्तु यह कहना गलत होगा कि वे सारे संबंध मात्र बाज़ारीकृत मित्रताएं हैं और ऐच्छिक एवं स्वार्थ से परिपूर्ण हैं. ऐसा होने पर हमें इनका कोई लाभ नहीं मिल पाता. यह एक मानवीय समाज की प्रवृति है कि उसमें पैदा होने वाले लोग स्वयं को उसके बंधनों में महसूस करते हैं. ये बंधन ही उन्हें किसी प्रकार का व्यक्ति बनाते हैं.

द्वितीय आलोचना का सार यह है कि उदारवादी समाज के मूल ढांचे में भी वास्तव में समुदायवाद ही है. उदारवादी सिद्धांत इसी वास्तविकता को तोड़-मरोड़कर हमें अपने अनुभव और समुदाय के प्रति लगाव से दूर करने का प्रयास करता है. उदारवाद हमारी समझ को हमारे ह्रदय तक सीमित कर देता है और हमें समाज से जुड़ने और समाज को स्वयं से जोड़ने के रास्ते बंद कर देता है. यहां मान्यता है कि हम सभी मनुष्य हैं और मनुष्य की प्रवृत्ति समाज के रूप में एक दूसरे से जुड़ने की है. अलगाववाद का उदारवादी आदर्श हमसे हमारे व्यक्तित्व और एक दूसरे से जुड़ने की प्रवृत्ति छीन नहीं सकता. लेकिन वह हमसे ‘व्यक्तित्व रखने’ और ‘समाज से जुड़े होने’ का भाव छीन सकती है. और यही बाद में उदारवादी राजनीति में प्रकट होता है. इससे यह स्पष्ट होता है कि क्यों हम अच्छी तरह से स्थिर मित्रताएं, स्थिर आंदोलन और दल नहीं बना पाते और हमारी प्रतिबद्धताओं को विश्व में व्यक्त कर उन्हें प्रभावी बना सकें. इसी कारण राज्य पर हमारी निर्भरता होती है.

किन्तु इन दोनों समालोचनात्मक तर्कों में अन्तर्विरोध के बावजूद दोनों कुछ हद तक सही हैं. प्रथमत: इस बात में कोई शंका नहीं होनी चाहिए कि हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जहां व्यक्ति अपेक्षाकृत एक दूसरे से विलग हैं और यह अलगाव लगातार बढ़ता चला जा रहा है. अत: हम पूर्णत: अस्थिर समाज में रहते हैं. इन अस्थिरताओं के लिये चार कारक उत्तरदायी होते हैं- भौगोलिक, सामाजिक, वैवाहिक, राजनीतिक.

इन चारों का प्रभाव का प्रभाव ज्ञान के विस्तार तथा उन्नत प्रौद्योगिकी आदि से बढ़ जाता है. किन्तु यहां हमें व्यक्तियों की गतिशीलता से सरोकार हैं. उदारवाद इस गतिशीलता को सैद्धांतिक बल और औचित्य प्रदान करता है. उदारवादी दृष्टिकोण से ये चारों गत्यात्मकताएं स्वतंत्रता स्थापित करने और प्रसन्नता प्राप्ति में बड़ी मददगार साबित हुई हैं. इन चारों में से किसी भी गत्यात्मकता को कम करने के लिए राज्य को कड़े एवं अलोकप्रिय कदम उठाने पड़ते हैं. इसके बावजूद इस लोकप्रियता के दुख और असंतोष जैसे कुछ अवांछित परिणाम भी सामने आते हैं. समुदायवाद इन्हीं परिणामों को प्रकट करता है. यह अवांछित परिणामों पर विचार करता है एवं ये अवांछित परिणाम वास्तविक होते हैं. लोग हमेशा अपना पुराना पड़ोस या गृह नगर आसानी एवं स्वेच्छा से बदलने को तैयार नहीं होते. एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना हमारी सांस्कृतिक पौराणिक कहानियों में व्यक्तिगत साहस का परिचायक हो सकता है किन्तु वास्तविक जीवन में यह किसी परिवार के लिए आघात से कम नहीं.

यह बात सामाजिक गत्यात्मकता पर भी लागू होती है जो लोगों को कभी ऊपर और कभी नीचे ले जाती है. इसमें भी बहुत अनुकूलन की आवश्यकता होती है जो कोई आसान कार्य नहीं. वैवाहिक विच्छेद कई बार नये और अधिक शक्तिशाली सम्बन्धों को जन्म देते हैं किन्तु वे टूटे हुए परिवार जैसे अकेले पड़े स्त्री तथा पुरुष और परित्यक्त बच्चों के रूप में सामने आते हैं. राजनीति में स्वतंत्रता कोई बहुत अच्छा अलगाव नहीं है. इसमें व्यक्ति अपने समूह और कार्यक्रमों से विलग हो जाता है. इसका परिणाम ‘आत्म-स्वाभिमान में कमीं’ के रूप में सामने आता है जिसका सीधा प्रभाव व्यक्ति की प्रतिबद्धता और मनोबल पर पड़ता है.

समुदायवादी समालोचना के द्वितीय तर्क, जिसमें कहा गया कि हम समुदाय के प्राणी मात्र है, वास्तव में सत्य है किन्तु उसका महत्व अनिश्चित है. स्थान सम्ब्धी बंधन, सामाजिक वर्ग, परिवार और यहां तक कि राजनीति भी चारों गत्यात्मकताओं से एक सीमा तक ही प्रभावित होती है. उदाहरण के लिए चारों में से अंतिम गत्यात्मकता पर विचार करें तो हम पाते हैं कि इतने प्रगतिशील और गतिशील समाज में भी लोग अपना मत उसी प्रकार देते हैं जिस प्रकार उनके माता-पिता दिया करते थे. समस्त युवा रिपब्लिकन और डेमोक्रेट मानते हैं कि स्वतंत्रता की स्थापना में उदारवाद पूर्णत:  असफल हो गया है. स्वतंत्र मतदाता भी अपने माता-पिता के प्रभावों से मुक्त नहीं हैं. वे मात्र स्वतंत्रता के उत्तराधिकारी हैं – विचारों के नहीं. यह कहना मुश्किल है कि ऐसी समुदायवादी अनुवांशिकता किस सीमा तक घट रही है; ऐसा प्रतीत होता है कि हर पीढ़ी ने जो अपने पूर्वजों से प्राप्त किया है, उससे कहीं कम अपनी अगली पीढ़ी को दे पा रही है. सामाजिक व्यवस्था का पूर्ण उदारीकरण तथा आत्मज्ञानी व्यक्तियों के उत्पन्न होने में शायद उससे बहुत ज्यादा समय लगेगा जितना उदारवादियों ने सोचा ता. लेकिन, यह समुदायवादी चिंतकों के लिए कोई संतोष की बात नहीं है; वे पुराने समय के तौर-तरीकों पर प्रश्न-चिन्ह है. क्या वास्तव में इस तर्क में कोई दम है कि उदारवाद हमें सामाजिक एकता के बन्धनों को समझने या व्यावहारिक स्वरूप देने में बाधा है?

उदारवाद एक विचित्र सिद्धांत है जो स्वयं को अपनी जड़ों से दूर रखने का प्रयास करता है, अपनी स्वयं की परंपराओं को हेय दृष्टि से देखता है और प्रत्येक पीढ़ी में पिछली पीढ़ी से और अधिक स्वतंत्रता की आशा रखता है. लॉक से रॉल्स तक, पूरे समय उदारवादी राजनीतिक सिद्धांत उदारवाद को स्थिर रूप से परिभाषित करने का प्रयास करता रहा है. किन्तु उदारवाद की हर धारा से आगे एक और अधिक स्वतंत्र और अधिक उदारवादी धारा मिल जाती है.

उदारवाद स्वयं का नाश करने वाला एक सिद्धांत है और इसी कारण इसे समय समय पर समुदायवाद द्वारा सुधारे जाने की आवश्यकता महसूस होती है. किन्तु यह सुझाव कि उदारवाद एक अस्पष्ट सिद्धांत है और इसे किसी अन्य सिद्धांत द्वारा विस्थापित किया जा सकता है – मान्य नहीं. अमेरिकी समुदायवादियों को यह मानना ही होगा कि दुनिया में ऐसे बहुत सारे व्यक्ति हैं जो विलग, अधिकारों का उपयोग करने वाले, स्वेच्छा से जुड़ने  वाले, खुला बोलने वाले, उदारवादी एवं स्वतंत्र विचारों वाले हैं. यह अच्छा होगा कि हम ऐसे लोगों को बताएं कि वे भी सामाजिक प्राणी ही हैं जो इतिहास के उत्पाद हैं और जिनमें उदारवादी मूल्य अधिक है. उदारवाद के समुदायवादी सुधार में हमें उदारवादियों को कुछ मूल्यों का महत्व समझाना होगा.

इसकी शुरुआत करने का उचित स्थान होगा स्वैच्छिक संगठन. अपने सिद्धांत और व्यवहार दोनों में उदारवाद को जोड़ने वाली व अलगाव उत्पन्न करने वाली प्रवृत्तियां होती हैं. इसको उदारवादी समूह बनाते हैं और अपने को इन समूहों से अलग भी कर लेते हैं, वे शामिल होते हैं, बाहर हो जाते हैं, विवाह करते हैं और तलाक भी देते हैं. किन्तु हमारा यह सोचना कि जुड़ाव के वर्तमान कारण पूर्णत: स्वैच्छिक और शर्तों पर आधारित हैं, एक बड़ी उदारवादी गलती है. एक उदारवादी समाज में, जैसा कि अन्य समाजों में होता है, लोग विभिन्न समूहों में, विभिन्न पहचानों के साथ जन्म लेते हैं – वे पुरुष या महिला, कर्मचारी, कैथोलिक या यहूदी, अश्वेत, डेमोक्रेट आदि होते हैं. उनके आगे के कई जुड़ाव केवल इन पहचानों को ही प्रकट करते हैं जो कि चुनी हुई कम और विरासत में मिली अधिक होती है. इन पहचानों के आधार पर समूह बनाना ही उदारवाद नहीं है, बल्कि, उन समूहों और उन पहचानों को त्यागने की स्वतंत्रता उदारवाद की मांग है. एक उदारवादी समाज में जुड़ाव हमेशा अस्थिर वस्तु होती है. विभिन्न समूहों की सीमाएं बिल्कुल भिन्न नहीं होती. लोग आते और जाते रहते हैं या चुपचाप बिना बताए समूह से दूर चले जाते हैं.

उदारवादी समाज सहनशीलता और लोकतंत्र के साझे सिद्धांतों से बंधे समूहों का एक सामाजिक संगठन हैं. यदि ये समस्त छोटे-छोटे समूह स्वयं अनिश्चित एवं अस्थिर हों तो इनसे मिलकर बनने वाले वृहद् संगठन के नेता और अधिकारी स्वैच्छिक संगठनों की असफलता की भरपाई करने के लिए अपने संगठन को और अधिक शक्तिशाली बनाने का प्रयत्न करेंगे जो उदारवाद के सिद्धांतों के विरुद्ध है. ये सीमाएं व्यक्तिगत अधिकार और नागरिक स्वतंत्रता द्वारा भलीभांति समझी जा सकती हैं, पर वे राज्य को तटस्थ रखने का समर्थन करती हैं. व्यक्तियों की अच्छी जीवन की चाह (जिसे समूहों का समर्थन है) को राज्य पूरा करने या समर्थन देने का प्रयास करता है किन्तु वह दोनों ही में शामिल नहीं होता. अत: सिद्धांत और प्रयोग के लिए बड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न है – क्या लोगों की भावनाएं और ऊर्जा लंबे समय तक जीवित रह सकती हैं और चारों गत्यात्मकताओं के परिप्रेक्ष्य में स्वयं को बहुलवाद के योग्य साबित कर सकती हैं ? इसमें कम से कम कुछ सबूत तो हैं कि बिना मदद के वह पर्याप्त साबित नहीं हो सकती. किन्तु फिर वही पुराना पश्न कि मदद आएगी कहां से ? कुछ वर्तमान सामाजिक संगठन ईश्वरीय सहायता की अपेक्षा करते हैं. अन्य एक दूसरे की मदद की उम्मीद करते हैं जिसमें सर्वाधिक प्रभावी मदद राज्य से मिल सकती है. किन्तु वह किस प्रकार का राज्य होगा जो इन गतिविधियों में सहायता करेगा ? वह राज्य किस प्रकार का सामाजिक संगठन होगा जो विभिन्न समूहों को आत्मसात् किये बिना स्वयं में शामिल करेगा ?

ज़ाहिर है यह एक उदारवादी राज्य और सामाजिक संगठन होगा. समुयादवादियों द्वारा किसी वैकल्पिक राज्य की बात बात करना अनुचित होगा क्योंकि इसका अर्थ होगा कि हम अपनी स्वयं की राजनीतिक परंपराओं का विरोध करें और जो कुछ समुदाय हमारे पास है उसे भी नष्ट कर दें. किन्तु अवधारणात्मक स्तर पर समुदायवादी सुधार को किसी उदार राज्य की आवश्यकता तो है :  एक ऐसा संप्रभु राज्य जो तटस्थ न हो. तटस्थ राज्य का उदारवादी तर्क हमें सामाजिक विखंडन की ओर ले जाता है. चूंकि विलग व्यक्ति कभी भी अच्छे जीवन के लिए सहमत नहीं होंगे, इसलिए राज्य को उन्हें उनकी इच्छानुसार जीवन जीने की छूट देनी होगी. पर समस्या यह है कि व्यक्ति जितना भी एक दूसरे से विलग होंगे, राज्य उतना ही शक्तिशाली हो जाएगा. प्रथम समुदायवादी समालोचना के अनुसार, राज्य एक मात्र सामाजिक संगठन या सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संगठन नहीं है. वैयक्तिक अधिकारों के बावजूद, अनेक छोटे-छोटे एच्छिक संगठन व्यक्ति के व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान करते हैं. और राज्य को उदारवादी बने रहने के लिये उन संगठनों को समर्थन व मान्यता देना होगा जो उदारवादी समाज के मूल्यों को प्रगाढ़ कर रहे हों. इसके मैं कुछ उदाहरण देना चाहता हूं.

प्रथम, सन् 1930 का वागनर एक्ट. यह कोई मानक उदारवादी कानून नहीं था  जो श्रमिक यूनियनों के रास्ते की परेशानियों को दूर करे वरन् इसने उन्हें सक्रिय समर्थन दिया जिससे उनमें यह क्षमता आई कि वे, कुछ सीमा तक, औद्योगिक सम्बन्धों का निर्धारण कर सकें.

द्वितीय उदाहरण टैक्स से छूट और टैक्स द्वारा जमा धन के अनुपात में धार्मिक समूहों को वित्तीय अनुदान देने का है जिससे वे समाजसेवी संस्थाएं (नर्सिंग होम, अस्पताल, डे-केयर-सेन्टर आदि) खड़ी कर सकें. इस प्रकार, कल्याणकारी राज्य में कल्याणकारी समाज की स्थापना हुई. इनके फलस्वरूप सेवाओं में वृद्धि हुई और समुदायवादी एकता अधिक मजबूत हुई.

एक अच्छा उदारवादी (या सामाजिक लोकतांत्रिक) राज्य सहकारी सम्बन्धों को प्रगाढ़ बनाने का प्रयत्न करता है. जॉन डीवी ने इस प्रकार के राज्य का एक महत्वपूर्ण विवरण ‘द पब्लिक एंड इट्स प्रॉबलम्स’ में दिया है.

इन दिनों अधिकतर यह तर्क दिया जाता है कि गैर-तटस्थ राज्य को गणतन्त्रात्मक स्वरूप में ही समझा जा सकता है. नव-क्लासिकल गणतन्त्रवाद समकालीन समुदायवादी राजनीति के लिए भूमि तैयार करती है. अमेरिकी समाज में संगठन, चर्च आदि हैं किन्तु कहीं भी गणतन्त्रात्मक संगठन नहीं, न ही ऐसे संगठनों के लिए कोई आंदोलन. जॉन डीवी अपनी ‘जनता’ और रॉल्स अपने ‘सामाजिक संघों’ क गणतन्त्र के संस्करण की मान्यता नहीं देंगे क्योंकि इन दोनों में ऊर्जा और प्रतिबद्धता एक राजनीतिक संगठन से नागरिक समाज के विभिन्न संगठनों में लाई गई है. इनमें से कोई भी इस बात की गारंटी नहीं देता कि गणतन्त्र समुदायों का या स्थानीय प्रतिबद्धताओं का नाश करेगा. उदारवादी समाज की विडम्बना यह है कि इस सिद्धांत को नकारने पर हमें समाज की परम्पराओं व सामाजिक सहमति को भी नकारना पड़ेगा. यदि प्रथम समुदायवादी समालोचना पूर्णत: सत्य है- यदि समुदाय व सामाजिक परम्परायें नहीं हैं – तो हमें उन्हें निर्मित करना पड़ेगा. और यदि द्वितीय समुदायवादी समालोचना अंशत: भी सही हो-  और समुदाय की खोज जारी हो- तब हमें डीवी द्वारा वर्णित समाधानों से संतुष्ट होना चाहिये.

उदारवादियों और समुदायवादियों के बीच मुख्य मुद्दा ‘स्व के निर्माण’ को लेकर है. उदारवादी मान्यता एक ऐसे व्यक्ति की है जो समाज से पूर्व ही पूर्णत: तैयार हो गया हो और समाज से मोर्चा ले रहा हो. समुदायवादी ऐसे व्यक्ति की संभावना से इन्कार करते हैं. वे यह भी मानते हैं कि ‘स्व’ तो प्रारम्भ से ही सामाजिक परिवेश में स्थित होता है और सामाजिक मूल्यों को आत्मसात करता है. पर दोनों ही दृष्टिकोण- उदारवादी और समुदायवादी- व्यवहार में उतने विरोधी नहीं हैं. उदारवादी और समुदायवादी राजनीतिक सिद्धान्त भी ऐसे दृष्टिकोण की मांग नहीं करते. समकालीन उदारवादी आज ‘समाज से पूर्व किसी व्यक्ति’ की परिकल्पना नहीं करते; और आज के समुदायवादी भी सामाजीकरण को ही सब कुछ नहीं मानते. आज राजनीतिक सिद्धान्त का केन्द्र बिन्दु ‘स्व की संरचना’ नहीं है, वरन् ऐसी संरचनाओं का अन्तर्सम्बन्ध है. उदारवाद सच्चे अर्थों में ‘सम्बन्धों का सिद्धान्त’ है जिसके केन्द्र में स्वेच्छा पर आधारित सम्बन्ध है- जो सम्बन्धों को तोड़ने या उसे त्यागने का अधिकार देता है. व्यक्ति की पहचान या सम्बद्धता में ‘स्वेच्छा’ का अर्थ है कि व्यक्ति को ‘वैकल्पिक’ पहचान व ‘वैकल्पिक सम्बद्धतायें’ उपलब्ध हों. लेकिन ‘स्वेच्छा’ का यह स्वरूप जितना ही सुलभ होगा, हमारे सामाजिक सम्बन्धों का ताना-बाना उतना ही कमजोर व अस्थायी होगा.

पुनर्लेखन – डॉ. राजेश कुमार लीडिया, सहायक प्रोफेसर (अंग्रेजी), राजस्थान तकनीक विश्वविद्यालय, कोटा(राजस्थान)

प्रस्तुत लेख ‘पोलिटिकल थ्योरी’, वाल्यूम 18, संख्या 1, फरवरी 1990, पृष्ठ 6-23 से साभार उद्धृत. मूल लेख ‘द कम्यूनिटेरियन क्रिटिक ऑफ लिबरलिज्म’ शीर्षक से प्रकाशित.