गांधीवादी दृष्टि में स्वतन्त्रता और व्यक्तिवाद

सुदर्शन आयंगर : समकालीन इतिहास में इस पृथ्वी पर गांधी ने, जैसा उन्होंने सत्य को अनुभूत किया, उसी के अनुरूप जीवन जीने का संभवत: सबसे ईमानदार प्रयोग किया. गांधी ने पूरे जीवनकाल में सत्य की खोज में निरंतर प्रयोग किये. इसी आधार पर उन्होंने व्यक्तिगत जीवन के नियमन हेतु कुछ मूल्य विकसित किये जिनके बारे में गांधी का मानना था कि यदि कोई व्यक्ति इनका दृढ़तापूर्वक पालन करे तो जीवन में गुणात्मक सुधार कर सकता है. ऐसा मनुष्य एक न्यायपूर्ण, मानवीय एवं स्थिर समाज के निर्माण में सक्षम होगा. परन्तु व्यावहारिक धरातल पर किसी राष्ट्र द्वारा विकास के मॉडल के तौर पर गांधी को नहीं अपनाया गया. उनके लिये आर्थिक विकास एवं तकनीक का अधिकारिक प्रयोग ही लक्ष्य रहा.

20वीं सदी में जिस समय विश्व के राष्ट्र युद्धों में फंसे थे उस समय गांधी ने दक्षिण अफ्रीका और भारत में अहिंसात्मक आन्दोलन की शक्ति को प्रमाणित किया. लायड रूडोल्फ ने अपने लेख ‘गांधी इन द माइंड ऑफ अमेरिका’ में लिखा है कि अमेरिका से गांधी का परिचय कराने वाले कुछ विद्वान हैं जैसे 20 व 30 के दशक में जॉन हेम्स होम्स और रेनहोल्ड नीबर. होम्स ने गांधी को विश्व का महानतम् व्यक्ति बताया. प्रारम्भ में तो नीबर ने गांधी की अहिंसा को संदेह और प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा. उन्होंने माना कि अहिंसा कमज़ोर भारतीय और अमेरिकन नीग्रो का साधन हो सकता है पर शक्तिशाली प्रतिरोध में हिंसा आवश्यक होगी. परन्तु बाद में नीबर ने अपना विचार बदला और गांधी की दृष्टि को स्वीकार किया.

द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त अमेरिका एवं यूरोप के कुछ देशों ने विकास का पूंजीवादी मॉडल अपनाया. दूसरी ओर सोवियत संघ, चीन और पूर्वी यूरोप के देशों ने साम्यवादी मॉडल अपनाया. परन्तु ये सभी एक मानवीय और स्थिर समाज के निर्माण में अक्षम सिद्ध हुये. पिछले कुछ वर्षों में जिस प्रकार का समाज उभरा है उसने अध्येताओं, वैज्ञानिकों, नेताओं और समाज-सेवियों को दूरगामी दृष्टि से मानवीय समाज के आर्थिक, समाजिक और पारिस्थितिकीय स्थायित्व की दृष्टि से चिन्तित कर दिया है. कुछ लोग इन चिन्ताओं को बेकार मानते हैं और कहते हैं कि ‘मुक्त बाज़ार व्यवस्था’ इन सभी संकटों का समाधान कर लेगी. समाजवादी ऐसा नहीं मानते हैं. ‘लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पोलिटिकल साइंस’ के डायरेक्टर एंथोनी गिडन्स दक्षिणपंथी विचारों की सीमाओं को रेखांकित करते हुए एक तीसरे मार्ग का सुझाव देते हैं. लेकिन वे भी विश्व-संकट के संभावित समाधान हेतु गांधी-दर्शन को नहीं अपनाते हैं.

Caption from LIFE. "Surrounded by his adoring disciples, Gandhi goes walking each morning. Here he is supported by his granddaughter Sita (left) and daughter-in-law Abha (right)."
Caption from LIFE. “Surrounded by his adoring disciples, Gandhi goes walking each morning. Here he is supported by his granddaughter Sita (left) and daughter-in-law Abha (right).”

गांधी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के नाम पर मुक्त बाजार व्यवस्था को प्रश्रय देने के सख्त खिलाफ थे. दूसरी और वह लोगों के जीवन और अर्थव्यवस्था पर राज्य के पूर्ण नियंत्रण के भी विरोधी थे. पश्चिमी समाज का मुक्त व्यक्ति एक आदर्श और मानवीय समाज के निर्माण में बाधक है. द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त अनेक हिंसक घटनाओं में इतने लोग जान गंवा चुके हैं जितने कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी नहीं गंवायें थे. ऊर्जा के अत्यधिक उपयोग एवं उपभोग में प्रतिबिम्बित होते आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने के लिए प्राकृतिक एवं मानव निर्मित संसाधनों पर स्थायी नियंत्रण बनाये रखना, ने संघर्ष को जन्म दिया है गांधी का मानना था कि तृष्णा पर आधारित अर्थव्यवस्था सामाजिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानप्रद है. गांधी और उदारवाद दोनों की दृष्टि में व्यक्ति महत्वपूर्ण है परन्तु गांधी का व्यक्ति आत्म-नियमन द्वारा अत्यधिक अनुशासित है बजाय समाज द्वारा अनुशासित होने के.

गांधी जी का मोहनदास करमचंद गांधी से महात्मा तक का सफर अनेक घटनाओं से सृजित हुआ है. हिन्दू दर्शन के नैतिक मूल्य और सिद्धान्तों ने गांधी जी पर गहरा असर डाला. हाईस्कूल के प्रथम वर्ष में अध्यापक द्वारा बताने पर भी ‘केटल’ शब्द की स्पेलिंग में सुधार न करना उनकी ईमानदारी का द्योतक है. गांधी द्वारा बचपन में पढ़े गये श्रवण – पितृभक्ति एवं हरिश्चन्द्र नाटक ने पितृभक्ति, सत्य और ईमानदारी की जड़े गहरी कीं. बचपन में की गई एक चोरी की लिखित आत्मस्वीकृति उनके पूरे जीवन में गलत कार्य के प्रायश्चित करने का आधार बनी. 1922 में ‘चौरीचौरा कांड’ के कारण सत्याग्रह आन्दोलन वापस लेना इसका उदाहरण है. 19 वर्ष की उम्र में गांधी जी अध्ययन हेतु इंग्लैण्ड जा रहे थे तो उन्होंने मां से शराब, स्त्री और मांस से दूर रहने का वचन दिया. कई दबावों एवं विकट परिस्थितियों में भी उन्होंने यह वचन नहीं तोड़ा. भूखे रहने पर भी उन्होंने शाकाहार का व्रत नहीं तोड़ा. इसी प्रकार एक बार राजकोट में गांधी जी ने अपने भाई के कहने पर एक ब्रिटिश एजेन्ट, जो कि उनका पूर्व परिचित था, से उनके एक केस के सिलसिले में सिफारिश की. ब्रिटिश एजेन्ट द्वारा उन्हें इसके लिये अपमानित किया गया. उन्होंने उस समय यह निश्चय किया कि वे जीवन में इस प्रकार की सिफारिश नहीं करेंगे और उन्होंने उसका जीवन भर निर्वाह भी किया.

गांधी जी की मृत्यु से 10 वर्ष पूर्व एक अमेरिकन जॉन आर. मॉट के पूछने पर गांधी ने कहा कि मॉरिट्जबर्ग स्टेशन की घटना मेरे जीवन का सर्वाधिक रचनात्मक अनुभव था. प्रिटोरिया में काले लोगों के लिये रात्रि 9 बजे के बाद घूमना वर्जित था. एक रात गांधी जी, जिनके पास रात्रि भ्रमण का वैध अनुमति पत्र था, को एक पुलिस वाले ने पीट दिया. एक गोरे मित्र के हस्तक्षेप के बाद पुलिस वाले ने माफी मांगी. गोरे मित्र चाहते थे कि इसकी शिकायत की जाय. परन्तु गांधी जी किसी सामाजिक समस्या के लिये व्यक्ति विशेष को सजा देने के विरुद्ध थे. 25 वर्षीय गांधी इतने प्रौढ़ थे जिन्होंने अपने जीवन में ईमानदारी, सत्य और अहिंसा का पालन किया. इन अनेक घटनाओं से परिष्कृत गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में 1896 से 1914 तक सत्याग्रह का नेतृत्व किया.

एकादश व्रतआत्मानुशासन एवं आत्मनियमन के ग्यारह सिद्धान्त

सितम्बर 1930 में जब गांधी यवर्दा जेल में थे तो वो आश्रमवासियों को साप्ताहिक पत्र लिखकर ऊर्जा का संचार करते थे. उस समय उन्होंने 10 सिद्धान्तों के बारे में लिखा लेकिन उन्होंने स्वदेशी के बारे में नहीं लिखा क्योंकि उन्होंने सरकार से यह वादा किया था कि जेल में वे ब्रिटिश राज के खिलाफ कुछ नहीं लिखेंगे. जेल से मुक्त होकर उन्होंने स्वदेशी के बारे में लिखा. ये मिलकर एकादश व्रत कहलाये.

  1. सत्य : गांधी के अनुसार सत्य ही ईश्वर है.
  2. अहिंसा : प्रेम और अहिंसा परस्पर परिवर्तनीय हैं. अहिंसा मात्र दूसरों को हानि न पहुंचाना नहीं है बल्कि यह बुरे विचारों से दूर रहना, घृणा न करना है. यह सत्य को प्राप्त करने का साधन है.
  3. ब्रह्मचर्य : इसका तात्पर्य है- ब्रह्म अथवा सत्य की खोज. इसका विशेष अर्थ है इद्रिय निग्रह.
  4. अस्वाद : गांधी का मानना था कि स्वादिष्ट भोजन से दूर ब्रह्मचर्य निर्वाह में सहायक होता है.
  5. अस्तेय : अचौर्य (चोरी न करना).गांधी के लिये संपत्ति संग्रह सत्य के मार्ग में बाधा है.
  6. अपरिग्रह : संपत्ति असंग्रह की प्रवृत्ति. गांधी के लिये संपत्ति संग्रह सत्य के मार्ग में बाधा है.
  7. अभय : इसका तात्पर्य अपने अन्दर के और बाहर के शत्रुओं से भयहीन होना है. अगर व्यक्ति सभी से प्रेम करता है और अहिंसक मार्ग द्वारा सत्य का अन्वेषक है तो उसे किसी से डर नहीं होता. गांधी उपनिषद का उदाहरण देते हुये कहते हैं कि व्यक्ति को ‘तेन त्यक्तेन’ की दृष्टि से कार्य करना चाहिये.
  8. अस्पृश्यता निवारण
  9. शारीरिक श्रम : गांधी के अनुसार यह दैवी कानून है, जो श्रम नहीं करता उसे खाने का अधिकार भी नहीं है.
  10. सर्व-धर्म समभाव
  11. स्वदेशी : यह पड़ोसी के प्रति प्रेम और कर्तव्य का सूचक है.

इस एकादश व्रत का निचोड़ सत्य, अहिंसा और राष्ट्रवाद है. गांधी का कहना था कि वह कुछ नया नहीं कर रहे हैं. यह तो हिन्दू धर्म के मूलभूत सिद्धान्त हैं. हिन्दू धर्म के अनुसार व्यक्ति के जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष है. इस मार्ग में छ: शत्रु हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, घृणा. काम के अनियंत्रित होने से समाज में विकृति पैदा होती है. गांधी ने ब्रह्मचर्य को काम नियंत्रण का साधन माना. यह मस्तिष्क का भी नियमन करता है. काम अन्य पांच शत्रुओं का मूल है. इच्छा स्वामित्व भाव को जगाती है. अगर इसमें कोई बाधक होता है तो क्रोध जन्म लेता है. स्वामित्व भाव लोभ, मोह, मद और घृणा का जनक है.

गांधीवादी दृष्टि में व्यक्ति का व्यवहार आत्मनियमन से अनुशासित है. मुक्ति का संदर्भ आध्यात्मिक है. आत्मानुशासित व्यक्ति सामाजिक सुधार में भी योगदान देता है. गांधी का व्यक्तिवाद जिसमें व्यक्ति सत्य का अन्वेषक है, उसे अहिंसक मार्ग पर ले जाता है और भौतिक आवश्यकताओं के लिये पड़ोसी के प्रति ईमानदार बनाता है जबकि पश्चिमी व्यक्तिवाद अपनी स्वतन्त्रता के लिये शक्ति संघर्ष है. अत: दोनों से भिन्न-भिन्न सामाजिक-आर्थिक संरचना उभरती है.

गांधीवादी दृष्टि में उभरती सामाजिकआर्थिक संरचना:-

गांधी के सामाजिक-आर्थिक संरचना का मुख्य आधार नैतिक था. यह दृष्टि गांधी की पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ में मिलती है. इसकी मुख्य विशेषता है कि गांधी ने पाश्चात्य सभ्यता को एक सिरे से नकार दिया है. हिन्द स्वराज में गांधी ने कहा कि लोग अच्छे घरों में रहना और अच्छे कपड़े पहनने को सभ्यता समझते हैं, शारीरिक सुख को सभ्यता से जोड़ते हैं. इसने इंग्लैण्ड के लोगों को आधा पागल बना दिया है. भारत को अपरिवर्तनशील होने के कारण पिछड़ा माना जाता है. लेकिन यही भारत की शक्ति है. सुधार या आधुनिकीकरण लोगों को अपने कर्तव्यों को भली-भांति करना सिखाता है. यह दोनों को आत्मनुशासित रखता है. यह वास्तविक आधुनिकीकरण है. शरीर को तो जितना आराम दीजिये उसे उतना ही और चाहिये. भारत के पूर्वजों ने इसे समझ लिया था. सुख या दुख मस्तिष्क की अवस्थायें हैं. इसका गरीबी या अमीरी से कोई सम्बन्ध नहीं है. गांधी राज्य की न्यूनतम भूमिका के पक्ष में थे. यह तभी संभव है जब व्यक्ति स्वानुशासित हो. गांधी की दृष्टि में नैतिक उन्नति ही वास्तविक विकास है न कि भौतिक उन्नति. भौतिक उन्नति वाला समाज अन्तत: नैतिक रूप से गिर जाता है. एक गरीब व्यक्ति जितना नैतिक होता है उतना अमीर नहीं. इसी आधार पर उन्होंने अपरिग्रह का सिद्धान्त दिया. भारत के संतों ऋषियों ने उच्च नैतिक आदर्शों के लिये सादा जीवन स्वीकार किया. भौतिक उन्नति केवल अति निर्धनता के कष्ट के निवारण की सीमा तक होनी चाहिये. गांधी के अनुसार व्यक्ति के लिये निर्धारित मानदंड ही समाज के ऊपर भी लागू होते हैं. इस प्रकार की सामाजिक-आर्थिक संरचना ही एक स्थिर समाज दे सकती है.

पश्चिमी विश्व में आधुनिक मनुष्य और सामाजिक स्थायित्व के मुद्दे-

परम्परागत समाज में आर्थिक व्यवस्था सामाजिक व्यवस्था के अधीन थी. परन्तु आधुनिक समाज में स्थिति ठीक उल्टी थी. आज विकास की मुख्य रूप से दो विचारधारायें हैं एक व्यक्तिवादी है जो सभी समस्याओं का समाधान मुक्त बाजार व्यवस्था में मानती है दूसरा-साम्यवादी और समाजवादी. जो समानता और परस्पर अधीनता को प्राप्त करने में राज्य की भूमिका को महत्वपूर्ण मानती है. परन्तु ये दोनों ही विचारधारायें समस्याओं के समाधान में असफल सिद्ध हुयी हैं. दोनों ही विचारधाराओं पर आधारित राज्य व्यवस्था असफल सिद्ध हुयी. पूंजीवादी कल्याणकारी राज्य व्यवस्था ने इस संकट के समाधान के दो विकल्प सुझाये- (1)  नव-उदारवाद (2) एन्थोनी गिडिन्स का ‘तीसरा मार्ग’ नव उदारवाद राज्य की भूमिका का विरोधी है. शास्त्रीय उदारवाद की ही भांति यह भी आर्थिक कार्यों में बाजार को सर्वोपरि मानता है. यह सरकार की अधिकाधिक भूमिका लोक समाज को प्रदान करता है. यह विचारधारा मानती है कि एक व्यक्ति अपने और अपने परिवार के कल्याण के लिये परिश्रम करेगा तो एक समरस एवं सफल समाज का निर्माण हो सकेगा. निश्चित रूप से मुक्त बाजार व्यवस्था सबको समान अवसर उपलब्ध करायेगी.

गिडिन्स ने नवउदारवाद के परस्पर विरोधी तत्वों को रेखांकित किया है. परम्परागत रूप से रूढ़िवाद कट्टर बाजारवाद का समर्थक है. एक तरफ मुक्त बाजार की ओर झुकाव और दूसरी और परम्परागत परिवार और राष्ट्र की  ओर झुकाव परस्पर आत्मविरोधी है. यद्यपि दोनों के बीच का सम्बन्ध दूर-दराज का लगता है. परन्तु ‘विश्व व्यापार संगठन’ की समझौता वार्ताओं की असफलता अनियन्त्रित स्वतन्त्रता, बाजार कट्टरवाद और रूढ़िवाद के परस्पर संघर्ष का द्योतक है. बाजार व्यवस्था के गति सिद्धान्त ने प्रभुत्व की परम्परागत संरचानओं की उपेक्षा की है. इस सिद्धान्त ने व्यक्ति के स्वरूप में परिवर्तन किया है. इसने लालच पर आधारित असीम वृद्धि का मूल्य स्वीकार किया है. शस्त्र नियंत्रण के रूसी अर्थशास्त्रीय समूह के चेयरमैन स्टेनिस्लाव मेनिश्कोव का कहना है कि इन सिद्धान्तों पर आधारित अर्थव्यवस्था ने लोगों के लिये असमान परिस्थितियां पैदा की हैं.

‘तीसरा रास्ता’, जिसे मैं ‘नवसमाजवाद’ कहना चाहूंगा, ने पुराने सामाजिक लोकतंत्र की असफलता को स्वीकार करते हुये दो रास्ते बताये हैं- (1) बाजार व्यवस्था में कमजोर वर्ग का ध्यान, (2) इस हेतु सरकार की न्यूनतम् नहीं वरन् सकारात्मक व महत्वपूर्ण भूमिका. गिडिन्स का कहना है कि सरकार की पुनर्संरचना इस प्रकार की जाय कि ‘न्यूनतम्’ से ‘अधिकतम्’ की प्राप्ति सुनिश्चित हो सके. नव-व्यक्तिवाद में ‘स्व’ को ‘समाज’ से ऊपर रखने का भाव है. पर यदि व्यक्तिगत स्वतन्त्रता अत्यधिक महत्व ग्रहण कर लेगी तो स्वतन्त्रता और समानता के मध्य सामंजस्य की समस्या खड़ी होगी. ‘स्व-प्रधान’ का समाज सामाजिक पारस्परिकता को नुकसान पहुंचायेगा जिसे नव-उदारवाद और नव-समाजवाद दोनों प्राप्त करना चाहते हैं. नव-व्यक्तिवाद परम्पराओं और परम्परागत मूल्यों को नकारता है. परिवार नहीं बल्कि व्यक्ति इकाई है. पर्यावरणीय समस्या न तो बाजार व्यवस्था में सुलझायी जा सकती है न साम्यवादी या सामाजिक लोकतांत्रिक कल्याणकारी राज व्यवस्था में.

कुल मिलाकर यह एक जटिल परिस्थिति है. दोनों ही व्यवस्थायें स्थिर समाज की स्थापना से सम्बन्धित प्रश्नों के उत्तर में असफल है. यहां स्थायित्व का मुद्दा केवल पर्यावरणीय और परिस्थिकीय संदर्भ में उठाया गया है. इसका समाधान क्या है ? जीवन में गांधी के अस्वाद, अस्तेय, अपरिग्रह, शारीरिक श्रम और अहिंसा का व्यवहार असीम मांगे, एकाधिकारवादी व्यवहार, असामान्य लाभ अनुपात और परिस्थितिकीय खतरे जैसे समस्याओं का उत्तर देते हैं. गांधीवादी माडल का व्यक्तिगत् व्यवहार ऐसी शक्ति है जो ऐसे सामाजिक आर्थिक व्यवस्था की रचना कर सकती है जो स्थिर समाज की ओर ले जाने वाला होगा.

(पुनर्लेखन : डॉ. शैलेश कुमार मिश्रा, वरिष्ठ प्राध्यापक, राजनीति विज्ञान, सम्पूर्णान्द संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी, एवं शोधार्थी, शोध-मण्डल)

Leave a Reply

Your email address will not be published.