हेबरमॉस और लोकतान्त्रिक सिद्धान्त

जोसेफ एल. स्टास : जुर्गेन हेबरमॉस की लोकतान्त्रिक सिद्धान्तों के प्रति प्रतिबद्धता को समझने में हमें उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकों – ‘द स्ट्रक्चरल ट्रांसफार्मेशन ऑफ द पब्लिक स्फीयर: एन इनक्वायरी इन्टू केटिगरी ऑफ बुर्जुआ सोसाइटी’ (1989) तथा ‘बिटिवन फैक्ट्स एण्ड नार्म्स : कन्ट्रीब्यूशन्स टू ए डिस्कोर्स थ्योरी ऑफ लॉ एण्ड डिमोक्रेसी’ (1996) पर ध्यान केन्द्रित करना होगा. प्रथम पुस्तक में लोकतन्त्र के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण दिखाई देता है, पर बाद की पुस्तक में समकालीन लोकतन्त्र के जीवन्त और बेहतर भविष्य की सैद्धान्तिक आधारशिला का प्रतिपादन किया गया है. यह देखना रुचिकर होगा कि हेबरमॉस के परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों में आज किसे प्रासंगिक माना जाये.

उपरोक्त दोनों पुस्तकें मूलत: जर्मन भाषा में क्रमश: 1962 व 1992 में लिखी गई. अत: हमें न केवल इन दोनों पुस्तकों वरन् इन तीस वर्षों के बीच में हेबरमॉस द्वारा लिखी गयी रचनाओं पर भी ध्यान देना होगा जिससे उनके विचारों में आये परिवर्तनों तथा उसे प्रभावित करने वाले कारकों को समझा जा सके. मेरा यह सुझाव है कि लोकतन्त्र पर (जनसंचार माध्यमों द्वारा) आधुनिक निगमों के प्रभाव का भी अध्ययन किया जाये क्योंकि हेबरमॉस की दूसरी पुस्तक इन निगमों की लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं को भ्रष्ट करने की क्षमताओं का संज्ञान नहीं लेती.

अपनी पुस्तक ‘बिटविन फैक्ट्स एण्ड नार्म्स’ में हेबरमॉस लोकतन्त्र के ‘उदारवादी’ तथा ‘गणतन्त्रात्मक’ दोनों ही सिद्धान्तों की आलोचना करता है. उसके अनुसार ये दोनों ही सिद्धान्त यह बताने में असमर्थ हैं कि आज लोकतन्त्र प्रभावशाली ढंग से कैसे काम करे. उदारवादी सिद्धान्त लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को मूलत: व्यक्तियों के विभिन्न प्रतिस्पर्धी आर्थिक हितों के समझौते के रूप में देखता है. वह मानता है कि ‘गैर-राजनीतिक सामान्य हित’ तक पहुंचने के लिये विभिन्न व्यक्तियों के जीवन लक्ष्यों तथा सुख की अपेक्षाओं को पूरा करना जरूरी है. वहीं गणतन्त्रात्मक सिद्धान्त लोकतन्त्र को राज्य में नागरिकों के एक नैतिक समुदाय के रूप में देखता है. इसका मानना है कि समाज की संरचनात्मक जटिलता एवम् विविधता के बावजूद भी नागरिकों के सक्रिय सामूहिक सहभागिता से ‘सामान्य हित’ तक पहुंचा जा सकता है.

हेबरमॉस उदारवादी तथा गणतन्त्रात्मक दोनों ही सिद्धान्तों से कुछ तत्व लेकर ‘विमर्श-सिद्धान्त’ का प्रतिपादन करता है. उदारवादी सिद्धान्त से वह राज्य व समाज के मध्य अन्तर को लेता है तथा गणतन्त्रात्मक सिद्धान्त से वह जनता की सक्रिय व सामूहिक सहभागिता को लेकर उसे राज्य में स्थापित न मान कर ‘लोकक्षेत्र’ में स्थापित करता है. विमर्श-सिद्धान्त अभिजनों द्वारा संचालित शासन पर नज़र रखने से कुछ ज्यादा है;  इसी प्रकार, वह नागरिकों अनुमोदनों से भी कुछ ज्यादा है. हेबरमॉस सरकार व जनता दोनों को ही खिलाड़ी व दर्शक की भूमिका देता है. नागरिकों द्वारा लोकक्षेत्र में विचारों एवम् दृष्टिकोणों के माध्यम से लगातार विमर्श चलता है जो इंगित करता है कि एक न्यायपूर्ण व स्वतन्त्र समाज को कैसे प्राप्त किया जाये व बनाये रखा जाये.

इस प्रक्रिया से उपजे व संशोधित विचार राजनीतिक क्षेत्र तक पहुंचते हैं जहां राजनीतिक संस्थाएं उन्हें ‘सामान्य उद्देश्यों’ के सांचे में ढाल देती हैं. राजनीतिक संस्था तक विचारों के संप्रेषण से तीन उद्देश्य पूर्ण होते हैं. एक, यह एक संप्रेषणात्मक प्रक्रिया है जो राजनीतिक संस्था के निर्णयों को जनता के विचारों से सम्बद्ध कर सरकारी कार्यों को लोकतान्त्रिक वैधता प्रदान करती है. दो, यह एक शोधन प्रक्रिया भी है जो विचारों को परिष्कृत कर उसे ‘सामान्य हित’ के अनुकूल बनाती है. तीन, यह विचारों और दृष्टिकोणों को ‘कानून का स्वरूप’ देती है- कानून जिसे प्रशासकीय संस्थायें लागू करती हैं और जो नागरिकों को अधिकार, कर्तव्य और अपेक्षायें प्रदान कर लोक-क्षेत्र में एक नये विमर्श का सूत्रपात करती है.

इस प्रकार, लोकतन्त्र के उदारवादी और गणतन्त्रात्मक सिद्धान्तों के बीच की खाई को हेबरमॉस अपने विमर्श-सिद्धान्त से पाटकर अपनी विलक्षणता का परिचय देता है. पर लोकतन्त्र के प्रति उसके आशावादी दृष्टिकोण को समझने के लिये हमें उसकी प्रथम महत्वपूर्ण कृति ‘द स्ट्रक्चरल ट्रांसफार्मेशन ऑफ द पब्लिक स्फीयर’ पर लौटना होगा. इस पुस्तक में हेबरमॉस अट्ठारहवीं व उन्नीसवीं शताब्दी में बुर्जुआ के अभ्युदय को लोकतन्त्र के जन्म व विकास के लिये उत्तरदायी मानता है. इस समय लोकतन्त्र लोक-विमर्श का अहम मुद्दा था और इसे राजनीतिक रूप से सक्रिय व सहभागी बुर्जुआ का वक्त कह सकते हैं. यह उदारवादी लोकतन्त्र का काल था. इस काल में लोकतान्त्रिक मूल्यों और प्रक्रियाओं, नीतियों व अपेक्षाओं के ऊपर जनता में खूब चर्चायें व वाद-विवाद हुये जो आगे औद्योगीकरण की प्रक्रिया और आधुनिक जटिल राज्य के अभ्युदय के दौरान व बाद में नहीं दिखाई देते. शुरुआती दौर की परिस्थितियां ही लोकतन्त्र की अवधारणा के लिये महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इस दौरान श्रेष्ठ वाद-विवादों और विवेकपूर्ण समझौतों के संस्थात्मक स्वरूप द्वारा लोकसत्ता का औचित्य स्थापित हुआ जो हेबरमॉस के विमर्श सिद्धान्त का केन्द्र बिन्दु है.

परन्तु हेबरमॉस लोकतन्त्र का भविष्य केवल एक आधुनिक औद्योगिक राज्य में ही देख पाता है. इसका कारण यह है कि बुर्जुआ काल में श्रेष्ठ लोक-विमर्श और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया पर उसके बौद्धिक प्रभाव का लोप हो गया और स्वार्थी तत्वों ने अभिजनों और संस्थाओं पर प्रभुत्व जमाकर अपने हितों के संवर्द्धन हेतु लोकमत को प्रभावित करना शुरू कर दिया. हेबरमॉस के अनुसार, ‘’ सामान्य नागरिकों के बौद्धिक विचार-विमर्श पर आधारित ‘लोकमत’ अब स्वार्थी तत्वों की अनौपचारिक राय के रूप में विखण्डित हो कर कुछ प्रभावशाली प्रोपेगेण्डा संस्थाओं के औपचारिक विचारों में स्थापित हो गया है.’’ अब लोक-विमर्श में ‘लोक’ का लोप हो गया है और एक सीमित दायरे में होने वाले विमर्श को सशक्त प्रेस व जनसंचार के माध्यम से ‘लोकमत’ के रूप में पेश कर दिया जाता है. इस लोकमत को ‘अर्द्ध-लोकमत’ ही कहा जा सकता है क्योंकि इसकी रचना प्रक्रिया में गैर-संगठित जनता की कोई हिस्सेदारी नहीं होती. हेबरमॉस के इन विचारों की प्रतिध्वनि हमें होर्खीमर व एडोर्नो (1947), सी. राइट मिल्स (1956), तथा वाल्टर लिपमैन (1922) आदि पूर्ववर्तियों की रचनाओं में भी मिलती है. इससे हेबरमॉस द्वारा लोकतन्त्र के व्यावहारिक स्वरूप के प्रति व्यक्त शंकाओं को बल मिलता है.

हेबरमॉस के ‘द स्ट्रक्चरल ट्रांसफार्मेशन ऑफ द पब्लिक स्फीयर’ से ‘बिटिवन फैक्ट्स एण्ड नार्म्स’ को कैसे जोड़ा जाये?  केलनर को इसमें सैद्धान्तिक स्तर पर सातत्य व परिवर्तन दोनों ही दिखाई देता है. उसके अनुसार पहले की रचना ‘फ्रैंकफर्ट स्कूल मॉडल’ पर आधारित है जो उन्नीसवीं शताब्दी के पूंजीवाद और उदारवादी लोकतन्त्र को बीसवीं सदी के राज्य और एकाधिकारवादी पूंजीवाद में संक्रमित होते देखती है जिससे 1930 के दशक में यूरोप में फासीवाद तथा ‘न्यू डील’ के लोककल्याणकारी उदारवाद का अभ्युदय हुआ. इसी समय, समाजवाद के स्टालिनवाद के रूपान्तर से भी फ्रैंकफर्ट स्कूल व्यक्ति की समाज व लोकतन्त्र में स्थिति को लेकर निराशावादी हो गया. अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिये व्यक्ति स्वयं को ‘व्यवस्था’ के अनुरूप ढालने को बाध्य हो गया. केलनर व मैकार्थी के अनुसार फ्रैंकफर्ट स्कूल न तो लोकतन्त्र की कमजोरी का स्पष्टीकरण दे पा रहा था, नही इसके आगे विकास के लिये किसी नये सिद्धान्त का प्रतिपादन कर पा रहा था. हेबरमॉस ने इस घुटन को तोड़ कर अपनी रचना ‘द थ्योरी ऑफ कम्युनिकेटिव एक्शन’ (1981) में एक नवीन ‘प्रतिमान’ स्थापित किया.

मैकार्थी के अनुसार इस पुस्तक की तीन विलक्षणतायें हैं.प्रथम,  यह आधुनिक दर्शन व सामाजिक सिद्धान्तों के वैयक्तिक व आत्मनिष्ठ अवधारणाओं से असम्बद्ध बौद्धिकता का सृजन करती है; द्वितीय, यह समाज के द्वि-आयामी स्वरूप का वर्णन करती है जो ‘सांसारिक’ को ‘व्यवस्था-प्रतिमान’ से सम्बद्ध करता है; तृतीय, यह आधुनिकता के ‘क्रिटिकल सिद्धान्त’ का प्रतिपादन करती है जो इसकी विसंगतियों का स्पष्टीकरण देता है जिससे इसे त्यागने की बजाय इसकी दिशा को ठीक किया जा सके.

इस नूतन प्रवृत्ति के अन्तर्गत व्यक्ति को समाज से हटकर नहीं देखा जा सकता. व्यक्ति के दो स्वरूप  हैं: वह अपनी ‘स्वायत्त अस्मिता’ भी है तथा विभिन्न व्यक्तियों के साथ रहते हुए एक ‘सार्वभौमिक अस्मिता’ भी. हेबरमॉस के अनुसार समाज में एक व्यक्ति अन्य व्यक्तियों के साथ बराबर क्रिया-प्रतिक्रिया करता रहता है- जिसे हम ‘संप्रेषणीयता’ कह सकते हैं. इससे उपजे सामाजिक विमर्श तथा समझौते पर आधारित सामूहिक प्रयासों से मानव समाज विकास करता है.

संप्रेषणीयता पर आधारित विमर्श व्यक्ति के दोनों स्वरूपों- ‘स्वायत्त व सार्वभौमिक’ – से क्रिया-प्रतिक्रिया करता है. इसका एक आन्तरिक व दूसरा वाह्य आयाम होता है. जब दो पक्ष विमर्श कर रहे होते हैं तो वे एक दूसरे की व्याख्याओं में तालमेल कर ‘मेरे’ और ‘तेरे’ से आगे बढ़ कर ‘अपने’ विचार संसार का निर्माण करते हैं.

हेबरमॉस के सिद्धान्त का द्वितीय प्रतिपादन समाज को द्वि-आयामी स्वरूप प्रदान करता है. इसका एक आयाम ‘विसरित’ है और दूसरा ‘व्यवस्था-मूलक’. ‘विसरित’ आयाम के अन्तर्गत सांसारिक पक्ष है जिसमें संप्रेषण द्वारा सामाजिक अन्त: क्रिया, विमर्श व समन्वित क्रिया-कलाप किये जाते हैं जो सामाजिक एकता एवम् प्रजनन को जन्म देते हैं. दूसरी ओर ‘व्यवस्था-मूलक’ आयाम है जो पूरी सामाजिक व्यवस्था, भौतिक उत्पादन, सरकार व वित्तीय संस्थाओं को जन्म देता है.

उसके सिद्धान्तों का तीसरा पक्ष-आधुनिकता की विसंगतियों पर दृष्टिपात करता है. उसका मानना है कि जहां ‘व्यवस्था’ सामाजिक जीवन में ज्यादा हस्तक्षेप करने लगती है वहीं विसंगतियां पैदा होने लगती हैं. लोकतन्त्र के दृष्टिकोण से सांसारिक-मूल्य यह तय करते हैं कि व्यवस्था में अधिकतम क्या अपेक्षा की जा सकती है. लेकिन जब स्वयं व्यवस्था अपनी पहल पर नये-नये मूल्यों को समाज में आरोपित करने लगती है तो नई-नई विसंगतियां पैदा होने लगती हैं. यह विनाशकारी प्रवृत्ति है जो जीवन-संसार को सिस्टम या व्यवस्था का उपनिवेश बना देती है. इस प्रकार, लोकतान्त्रिक सिद्धान्त के अन्तर्गत ही हेबरमॉस विसंगतियों का स्पष्टीकरण प्रदान करता है.

इसी बिन्दु पर हेबरमॉस की पुरानी व नई कृति की तुलना कर देखा जा सकता है कि क्या पुराने व नये हेबरमॉस के लोकतन्त्र के प्रति दृष्टिकोणों में कोई समन्वय किया जा सकता है. केलनर इसे वैसे भी सातत्य व परिवर्तन के रूप में देखता है. हेबरमॉस फ्रैंकफर्ट स्कूल की सीमा से बाहर निकाल कर यह बताने का प्रयास करता है कि लोकतन्त्र को केन्द्र में रखकर एक नये राजनीतिक सिद्धान्त का निर्माण किया जा सकता है. पर ऐसा करने में हेबरमॉस हमें ‘विसंगतिपूर्ण लोकतन्त्र विहीनता’ से ‘विसंगतिपूर्ण लोकतन्त्र’ तक ले जाता है पर वह विसंगति रहित-लोकतन्त्र’ तक फिर भी नहीं पहुंचता अर्थात्, हम हेबरमॉस को ‘द स्ट्रक्चरल ट्रांसफार्मेशन ऑफ पब्लिक स्फीयर से ’ द थ्योरी ऑफ कम्युनिकेटिव एक्शन’ तक जाते तो देखते हैं, लेकिन ‘द थ्योरी ऑफ कम्युनिकेटिव एक्शन’ से ‘बिटिविन फैक्ट्स एण्ड नार्म्स’ तक जाते नहीं देख पाते.

यह कोई सामान्य समस्या नहीं है. ‘बिटविन फैक्ट्स एण्ड नार्म्स’ में वर्णित लोकतान्त्रिक सिद्धान्त उस आधारशिला पर आधारित है जो जीवन संसार के मूल्यपरक व स्वायत्त स्वरूप को स्वीकार कर चलती है- वह स्वरूप जहां नागरिकों के विसरित अन्तर्सम्बन्ध सरकारी आदेशों को वैधता प्रधान करते हैं. ऐसी मूल्यपरक व स्वायत्त सामाजिक व्यवस्था के बिना हेबरमॉस का लोकतन्त्र ताश के पत्ते की तरह ढह जायेगा. पुराने हेबरमॉस को इसका पता था पर क्या नये हेबरमॉस को भी इसका कुछ एहसास था?

हेबरमॉस सामाजिक विमर्श में भ्रष्टाचार की संभावना और उसके परिणामों से काफी पहले से ही चिंतित था. उसने एक लेख ‘दुवर्ड्स ए थ्योरी ऑफ कम्यूनिकेटिव कम्पीटेन्स(1970) में सामाजिक-विमर्श में शामिल लोगों के ’पूर्ण समानता’ की परिकल्पना की थी. ऐसा न होने पर विमर्श में सभी का समान योगदान न हो सकेगा. इसी प्रकार, हेबरमॉस जीवन संसार(समाज) व सिस्टम(व्यवस्था) के मध्य सम्यक् विमर्श के लिये दोनों को बराबर की भूमिका देना चाहता है. लेकिन यदि सिस्टम (व्यवस्था) जीवनसंसार ‘पूर्ण समानता’ तो नष्ट हो जायेगी और विमर्श में ‘व्यवस्था’ ‘समाज’ पर हावी हो कर लोकतन्त्र को प्रदूषित करेगा.

यहां पर हेबरमॉस जर्मन भाषा के शब्द ‘रिफ्लेक्शन’ (मनन) के भिन्न-भिन्न अर्थों में प्रयोग व उससे उत्पन्न भ्रम की स्थिति पर भी ध्यान आकृष्ट करता है. हमारे लिये ‘मनन’ एक ऐसे ‘आलोचनात्मक दृष्टिकोण’ जैसा है जो इस बात पर चिन्तन करता है कि आत्मनिर्माण में कैसे कोई अनचाहे उपजा कारक नकारात्मक प्रभाव पैदा कर देता है. यह हमें भ्रमात्मक चेतना की स्थिति से उबारता है. लेकिन हेबरमॉस ‘मनन’ (रिफ्लेक्शन) को दूसरे अर्थों में प्रयोग करता है. उसके अनुसार विसरित समाज में वैचारिक आदान-प्रदान में ‘मनन’ की महत्वपूर्ण (रूपान्तरकारी) भूमिका है. यह व्यक्तियों को अपनी वैयक्तिक अवधारणाओं से ऊपर उठकर विमर्श के माध्यम से चीजों को एक नये रूप में देखने का अवसर देती है. लेकिन ‘व्यवस्था’ द्वारा समाज को ‘उपनिवेश’ बनाने से हमारे दृष्टिकोण में दो स्तरों पर समस्यायें पैदा हो जाती हैं. प्रथम, सिस्टम(व्यवस्था) द्वारा आरोपित नवीन मूल्य समाज में एक भ्रमात्मक चेतना का निर्माण कर सकते हैं. और जब लोगों को लगे कि विचार और निर्माण करने में वे स्वतन्त्र हैं तब वास्तव में वे किसी बाह्य एजेन्सी द्वारा नियमित व्यवहार कर रहे होते हैं. द्वितीय, समाज को उपनिवेश बनाने की प्रक्रिया इतनी मुखर हो सकती है कि समाज में विमर्श का औचित्य ही संदिग्ध हो जाये और समाज में मनन की प्रक्रिया ही समाप्त हो जाये. इस बिन्दु पर आगे लोकतन्त्र में निगमों के बढ़ते प्रभाव के सन्दर्भ में चर्चा की जायेगी.

हेबरमॉस ‘बिटविन फैक्ट्स एंड नार्म्स’ में लोकतन्त्र की विसंगतियों पर चर्चा करता है. राजनीतिक व्यवस्था समाजाकि एकता की संरक्षक नहीं रह सकती, यदि उसका निर्णय विधि-सम्मत न हो; संवैधानिक शक्ति निरर्थक हो जायेगी, यदि प्रशासकीय निर्णय जनता के विमर्श पर आधारित न हो और समाज में कार्यरत बड़े संगठन (जैसे जनसंचार संस्थायें) गैर-विधिक शक्ति-केन्द्र बन जायें. जनसंचार संस्थायें प्राय: इस तरह से कार्य करती हैं कि जन-विमर्श का जैसे गैर-राजनीतिकरण हो जाता है. फिर भी हेबरमॉस मानता है कि कुछ परिस्थितियों में नागरिक समाज लोकक्षेत्र में अपना प्रभाव जमा सकता है, लोकमत के द्वारा सरकारी संस्थाओं के निर्णयों को प्रभावित कर सकता है और राजनीतिक व्यवस्था को बाध्य कर सकता है कि वह विधिक निर्णय ही करे. ‘कुछ परिस्थितियों में’ का प्रयोग हेबरमॉस के लोकतन्त्र के प्रति आशावाद की आधारशिला है. पर क्यों हेबरमॉस अब आशावादी हो चला?

इसका कारण यह है कि हेबरमॉस ने ‘नागरिक समाज’ में एक नया अर्थ, दिशा व मजबूती देखी. यह नागरिक समाज हीगल के ‘आवश्यकताओं की व्यवस्था’ मात्र नहीं है, वरन् नये-नये संघों, संगठनों और आन्दोलनों का समुच्चय है जो वैयक्तिक क्षेत्र की समस्याओं को परिष्कृत व वृहद् रूप में लोक-क्षेत्र में अभिव्यक्त करता है. इस रूप में नागरिक समाज के पास पर्याप्त संप्रेषण शक्ति व क्षमता होती है जिससे वह समाज में वाह्य कारकों के हस्तक्षेप व वर्चस्व को प्रभावी ढंग से निस्तेज कर सके.

सशक्त मीडिया का सहारा लेकर जनता को बरगलाना आज उतना आसान नहीं. आज का नागरिक/उपभोक्ता मीडिया कार्यक्रमों के संकेतों को चुपचाप स्वीकार नहीं करता, वरन् वह उन कार्यक्रमों के बारे में आपस में विचारों व आलोचनाओं का भी अदान-प्रदान करता है और तब उस पर कोई राय बनाता है.

हेबरमॉस यह भी कहता है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में मीडिया स्वयं अपने आदर्शों पर चलते हुये राजनीतिक प्रक्रिया में जनता के पक्ष में खड़ा हो सकता है. लेकिन यदि नागरिक समाज का एजेण्डा ही किसी कॉर्पोरेट समूह द्वारा पूर्व निर्धारित हो तब लोकतान्त्रिक सिद्धान्त क्या होगा? कुछ विशेष परिस्थिति में क्या होगा? इसके अतिरिक्त, नागरिक समाज के एजेण्डे पर कोई विषय लाना एक बात है, पर कौन-कौन से विषय नागरिक एजेण्डे पर हों यह तय करना और बात है. आगे इस बात पर चर्चा होगी कि किस प्रकार कार्पोरेट जगत जनसंचार पर नियन्त्रण कर एजेण्डा निर्धारण की कोशिश करता है जिससे समाज को उपनिवेश बनाकर लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को भ्रष्ट किया जा सके.

कॉर्पोरेट हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली ‘व्यवस्था’ समाज को अपना उपनिवेश बना सके इसके लिये उनके पास पर्याप्त शक्ति होनी चाहिये. यह शक्ति तीन प्रकार की हो सकती है और इसमें से कोई एक या कई मिलकर समाज को जकड़ सकती हैं. प्रथम, इसके अन्तर्गत कोई व्यक्ति या संस्था अपनी इच्छा के अनुसार दूसरे व्यक्ति या संस्था को अनचाहा व्यवहार करने को बाध्य कर देती है (हन्ना एरेन्ट शक्ति की ऐसी अवधारणा से जुड़ी हैं : 1970). कुछ बड़े कॉर्पोरेट समूहों में ऐसी शक्ति हो सकती है जिससे वे लोक-विमर्श से निकलने वाली आम सहमतियों को प्रभावित कर सकें.

द्वितीय, बैचरेच और बैरेट्ज(1962) के अनुसार यह कॉर्पोरेट जगत की उस क्षमता की ओर इंगित करता है जो यह निर्धारित करती है कि जनता का एजेण्डा कैसे बनाया जाये और किन विषयों पर निर्णय लिये जाये. कॉर्पोरेट समूह दो तरह से अपनी शक्ति का प्रयोग करते हैं- (i) वह राजनीतिक प्रक्रिया में धन का प्रवाह कर यह सुनिश्चित करते हैं कि किन मुद्दों को जनता के विमर्श एजेण्डे पर रखा जाये; (ii) वह मीडिया/जनसंचार माध्यमों को विज्ञापनों और प्रायोजित कार्यक्रमों के लिये ढेर सा धन देकर जनता को दी जाने वाली सूचनाओं को नियन्त्रित करते हैं. इससे धीरे-धीरे मीडिया की रूचि धनार्जन में हो जाती है और लोकतान्त्रिक समाज में स्वतन्त्र व निष्पक्ष विचार-विमर्श को मजबूत करने का उद्देश्य हाशिये पर चला जाता है. इस प्रकार, कौन-कौन से मुद्दों पर चर्चा हो तथा उनके क्या निष्कर्ष निकलें, यह सब कुछ कॉर्पोरेट जगत मीडिया के माध्यम से नियन्त्रित करने लगता है. इसके अतिरिक्त स्टीवन लूकस(1944) के अनुसार मीडिया हमारी आवश्यकताओं को परिभाषित, प्रभावित व नियन्त्रित करने की क्षमता रखती है. यह शायद सबसे खतरनाक है क्योंकि यह दूसरों को एक सी इच्छा व विचार करने को बाध्य कर देती है जैसा कि वह बाह्य एजेन्सी चाहे. कॉर्पोरेट जगत इसके प्रयोग से समाज को पूरी तरह पकड़-जकड़ सकता है. यह नागरिकों को बाध्य कर सकता है कि वे स्वयं को मात्र एक उपभोक्ता के रूप में देखें तथा नेताओं को उपभोक्ता जरूरतों (वस्तुओं व सेवाओं) को उन तक पहुंचाने वाले माध्यम के रूप में. हम देख सकते हैं कि कैसे आर्थिक विकास और बेहतर आर्थिक प्रदर्शन ही धीरे-धीरे राष्ट्रीय, क्षेत्रीय व स्थानीय नेताओं की सफलता का मानक बनता जा रहा है, और कैसे ‘अच्छे-जीवन’ को ‘अच्छे उपभोक्ता क्षमता’ के रूप में परिभाषित किया जा रहा है. अब तो धीरे-धीरे सरकारें भी इसी ‘कॉर्पोरेट मॉडल’ पर चल निकली हैं और नागरिकों को सरकारी सेवाओं के उपभोक्ता के रूप में देख रही हैं. स्थानीय सरकारें तो स्थानीय ऐतिहासिक स्थलों तक को ‘कॉर्पोरेट जगत’ को गिरवी रखकर, उन्हें अपना नाम प्रयोग करने की अनुमति देकर, स्थानीय विकास से अपना मुंह मोड़ रही हैं. यह प्रवृत्ति अमेरिका, इंग्लैंड सहित ज्यादातर लोकतन्त्रों में दिखाई देती है.

ऐसा कैसे हो गया ? कॉर्पोरेट जगत कैसे इतना प्रभावशाली व शक्तिशाली हो गया? शुरुआत में तो प्रयास यह था कि निगमों को सामाजिक रूप से उत्तरदायी बनाया जाये. इसीलिए निगमों को ‘विधिक-व्यक्तित्व’ प्रदान कर उन्हें उनकी गलतियों के लिये कानूनी रूप से जिम्मेदार बनाया गया. 1916 में ‘हॉवर्ड लॉ रिव्यू’  तथा ‘येल लॉ जर्नल’ में हेरल्ड जे. लास्की ने निगमों के ‘विधिक-व्यक्तित्व’ पर टिप्पणी करते हुये कहा था कि लोक नीतियों के आधार पर राज्य को निगमों पर नियन्त्रण रखना चाहिये. आगे चलकर निगमों ने अपने ‘विधिक-व्यक्तित्व’ के उत्तरदायित्वों पर तो कम, अपने अधिकारों पर ज्यादा ध्यान दिया. यहीं से एक गलत शुरूआत हो गई. धीरे-धीरे, अमेरिका में प्रथम, चौथे, पांचवें व छठें संवैधानिक संशोधनों से निगमों के अधिकारों में बाढ़ सी आ गई. खास तौर पर अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से तो इन निगमों को वह संप्रेषण शक्ति प्राप्त हो गई जिससे पूरे समाज को, अपने पैसे के बल पर, वे अपने विचारों से रौंद सकते हैं. इतना ही नहीं, अधिकारों द्वारा उनके ऊपर जो दायित्व लादे गये, उसका निर्वहन करने में उनकी समाज पर पकड़-जकड़ और मज़बूत ही हुई है. ये निगम केवल स्वयं का ही प्रतिनिधित्व करते हैं और कानूनन केवल लाभ के उद्देश्य से बने हैं. अत: अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के साथ जब वे लाभ कमाने के उद्देश्य से समाज में प्रवेश करते हैं तो सामाजिक विमर्श में अत्यन्त सशक्त हस्तक्षेप करते हैं. ऐसा करने में निगमों को समाज के ऊपर खर्चे बढ़ाने पड़ते हैं, फिर भले ही उसका लाभ नागरिकों को मिले या नहीं. वे जिस तरह से किसी समाज का शोषण करते हैं उससे तो ऐसा लगता है कि जैसे वे उस समाज के ‘स्व रोपित-साम्राज्यवादी’ हों. ऐसे ‘स्वरोपित-साम्राज्यवादियों’ के लिये अपने ही समाज को उपनिवेश बनाना आसान होता है. यह बात हमें पुन: हेबरमॉस और ‘लोकतन्त्र के भविष्य’ के प्रश्न पर ला खड़ा करती है. हेबरमॉस के अनुसार जैसे ही कोई महत्वपूर्ण सामाजिक समस्या आसपास के क्षेत्रों में ‘समस्यामूलक चेतना’ का निर्माण करती है वैसे ही शक्ति-सम्पन्न लोक क्षेत्र में शक्ति-सम्बन्ध बदल जाते हैं. पर यदि ल्यूकास द्वारा इंगित तृतीय विधि के अनुसार मनुष्यों के चिन्तन व विचार ही बदल दिये जायें, तब हम कैसे कल्पना करें कि व्यक्ति को अपनी समस्या का एहसास भी होगा? इससे तो संभवत: लोकतन्त्र में वैधता का ही अन्त हो जायेगा. लोकतन्त्र उधार दिखेगा, पर होगा नहीं. फ्रैंकफर्ट स्कूल द्वारा इंगित इसी कमी से हेबरमॉस जूझता रहा.

पुनर्लेखन – सम्पादक एवम् शोधार्थी शोध-मण्डल

प्रस्तुत लेख ‘पोलिटिकल रिसर्च क्वार्टरली’, वाल्यूम 57, संख्या 4 (दिसम्बर 2004) पृष्ठ 585-594 से साभार उद्धृत. मूल लेख ‘हेबरमॉस एण्ड डिमोक्रेटिक थ्योरी; द थ्रेट टू डिमोक्रेसी ऑफ अनचेक्ड कॉर्पोरेट पावर’ शीर्षक से प्रकाशित

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