हेना अरेंट : सर्वाधिकारवाद का उद्भव

एलफान्स सोलनर : हेना अरेंट की रचना ‘’द ओरिजिन्स ऑफ टोटालिटेरियनिज्म’’ (सर्वाधिकारवाद का उद्भव) 1951 में प्रकाशित हुई. पर वह 20वीं शताब्दी के सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक लेखों में से एक है. रूसी साम्यवाद के अवसान के बाद भी हेना अरेंट पर बहस जारी है. उत्तर साम्यवादी राज्यों की संक्रमणकालीन समस्याएं बनी हुई हैं. उन राज्यों की ये समस्याएं यूरोपीय प्रजातांत्रिक देशों की जमात में शामिल होने मात्र से खत्म होने वाली नहीं. इन समस्याओं की संरचना व स्वरूप ही अरेंट के लेख का प्रमुख विषय है. ‘’द ओरिजिन्स आफ टोटालिटेरियनिज्म’’ वास्तव में राजनीतिक चिंतन पर एक अनुपम पुस्तक के रूप में उभरी है.

हेना अरेंट की इस पुस्तक को समकालीन विवादों के परिप्रेक्ष्य में रखने का क्या तात्पर्य है ? अगर हम अरेंट की किताब प्रकाशित होने के बाद, अमेरिका में इस पर हुई प्रतिक्रिया को ध्यान में रखें तो हम ‘’परिप्रेक्ष्य’’ का बहुत ही विस्तृत अर्थ निकालने लगते हैं.

‘सर्वाधिकारवाद’ पर हेना अरेंट की किताब सही तरह से तभी समझी जा सकती है जब हम इसके लिखे जाने के परिप्रेक्ष्य में तीन बातें ध्यान में रखें; (1) लेखक का नाज़ी जर्मनी से पलायन, (2) पुस्तक का जर्मनी में एक विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान, तथा (3) द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के राजनीतिक विचारों के लिए इसकी प्रेरणात्मक भूमिक. प्रथम विश्व युद्ध के बाद, नाज़ी जर्मनी से यहूदी-विद्वानों का एक समूह पलायन करने को विवश हुआ. यह एक ऐसी पीढ़ी थी जिसने प्रथम विश्व युद्ध के भयानक मनोवैज्ञानिक व राजनीतिक परिणाम देखे थे. इसके प्रमुख अनुभवों में एक और ‘नाज़ी जर्मनी से पलायन’ था (जिसमें वे हिटलर के भयानक नरसंहार से बच निकले) तो दूसरी तरफ, एक अन्य देश में प्रवेश पाना निर्वाण जैसा था (जिसने पहले सुरक्षा दी, फिर इस पीढ़ी के राजनीतिक – बौद्धिक अनुभवों के आत्मसात् कर लिया). लेकिन इसके परिणाम स्वरूप जर्मनी और यूरोप से उनके सारे सामाजिक व बौद्धिक सम्बन्ध टूट गए. सामाजिक विज्ञान एवं मानविकी में तो इसका प्रभाव है ही उन देशों पर भी इसका प्रभाव दिखायी देता है जहां से इन्होंने पलायन किया. इसके लिए हम 1930 और 1940 के दशक में फासीवाद तथा राष्ट्रीय समाजवाद(नाजीवाद) तथा 1950 के दशक में सर्वाधिकारवादी सिद्धान्त के विमर्श पर ध्यान देंगे. विचारों के इतिहास की इस रूप रेखा में हेना अरेंट की पुस्तक को रखने हेतु मैं कुछ उदाहरणों का सहारा लूंगा. इसके लिए चार पुस्तकें – एर्नस्ट फ्रैंकेल की ‘डूअल स्टेट’ (1941), फ्रैंज न्यूमैन की ‘बेहेमॉथ’ (1942), सिंग्मंड न्यूमैन की ‘पर्मानेन्ट रिवोल्यूशन’ (1942), तथा फ्रेडरिक और ब्रिझेजिन्सकी की ‘टोटालिटेरियन डिक्टेटरशिप एण्ड आटोक्रेसी’ (1956), का संदर्भ ठीक रहेगा.

Hannah

ये पुस्तकें एक तरफ ‘राष्ट्रीय समाजवाद’ व ‘फासीवाद’ तो दूसरी ओर सर्वाधिकारवादी सिद्धान्त के विकास पर प्रकाश डालती हैं. इन पुस्तकों के लेखकों ने एक-दूसरे को संदर्भित अवश्य किया है, पर उसमें उनके आपसी वैचारिक मतभेदों, राजनीतिक अवरोधों और व्यक्तिगत् वैमनस्य दिखाई देते हैं. फिर भी उनके बीच एक गहन समानता नज़र आती है. तो हेना अरेंट की सर्वाधिकारवाद पर किताब को कित प्रकार स्वदेश त्यागी राजनीतिक वैज्ञानिकों के  संवादिक ढांचे में स्थित किया जा सकता है? अरेंट की किताब के तीसरे हिस्से तक ही मैं अपने आप को सीमित रखूंगा. इस भाग के बारे में अरेंट ने जर्मन संस्करण में लिखा कि यह (तीसरा भाग) ‘सर्वाधिकारवाद का शुद्ध रूप’ था जिसे उन्होंने सर्वाधिकारवादी सत्ता के उद्भव और तत्वों से अलग बताया. हेना अरेंट पर समकालीन साहित्य इस तथ्य की उपेक्षा करता है.

राष्ट्रीय समाजवाद (नाज़ीवाद) पर अर्नेस्ट फ्रैंकेल एवं  फ्रैंज न्यूमैन

फासीवाद की तरह ही राष्ट्रीय समाजवाद पर उसकी स्थापना के समय से ही अध्ययन व शोध प्रारम्भ हो गया. इस पर आरम्भिक साहित्य का सम्बन्ध मुसोलिनी और हिटलर के विरुद्ध संघर्ष से था, बाद में पूरे यूरोप में यह फासीवाद के खिलाफ एक अभियान बन गया. फासीवाद व नाज़ीवादी अधिनायकों द्वारा वामपंथियों की हत्या की जा रही थी. अत: वामपंथियों द्वारा सर्वाधिकारवाद के विरुद्ध एक विमर्श आरम्भ हुआ. राजनीतिक निष्कासितों के मध्य विमर्श का भी यही स्वरूप था, पर वे इस विमर्श को एक सैद्धान्तिक स्वरूप देना चाहते थे. इसे फासीवाद और राष्ट्रीय समाजवाद की व्याख्या का क्रांतिकारी काल कहा जा सकता है जिसमें ‘हिटलर की सत्ता’ को मानवता का प्रथम शत्रु माना गया है. फ्रैंकल और न्यूमैन की किताबें इसी काल का प्रतिनिधित्व करती हैं तथा निर्वासित लेखकों द्वारा सभी सीमाओं और अवरोधों के बावजूद हासिल की गई ऊंचाइयों को दर्शाती हैं. अर्नेस्ट फैंकेल ने ‘डूअल स्टेट’ पुस्तक जर्मन प्रवास के दौरान लिखी और स्वयं 1938 में जर्मनी छोड़ने के पहले ही उसने पुस्तक की पांडुलिपि को जर्मनी से बाहर चोरी छुपे भेज दिया. फ्रैंकल के अनुसार जर्मनी में 1933 के बाद दो परस्पर विरोधी कानूनी व्यवस्थाएं चल रहीं थीं; एक तरफ ‘विशेषाधिकारवादी राज्य’ पुरानी कानूनी व्यवस्था और अधिकारों को धीरे-धीरे खत्म कर रहा था, तो दूसरी ओर ‘कानूनी राज्य’ था जो पतन की ओर अग्रसर था, जो केवल पूंजीवादी उत्पादन द्वारा हथियार निर्माण में लिप्त था. राष्ट्रीय समाजवादी आंदोलन ने स्वयं को संगठित कर राजनीतिक सत्ता हथिया ली. इसने संवैधानिक व वैधानिक अवरोध हटा कर पुलिस, न्यायालय और अन्य संस्थाओं को अपने अधीन कर लिया. इसने शत्रुओं पर नियंत्रण कर लिया. सामाजिक समूहों की स्वायत्तता समाप्त कर दी. तथा समाज में जबरदस्ती समन्वय कायम कर दिया. इसने नस्लवाद के सिद्धान्त को वास्तविकता में बदल मताधिकारविहीन अल्पसंख्यकों विशेषकर यहूदियों को उनके वैधानिक और सामाजिक अस्तित्व से वंचित कर दिया, पर सर्वाधिक चिंता पैदा करने वाली वह परिकल्पना थी जिसमें फ्रैंकल ने बताया कि वे विधिवेत्ता जो कानून व न्याय की परम्परा में पले पढ़े थे, न केवल बड़ी आसानी से उन्होंने नाज़ी जर्मनी के सामने समर्पण कर दिया, बल्कि उसका साथ भी देने लगे. फ्रैंकल ने इसका प्रमुख उदाहरण संवैधानिक अधिवक्ता कार्लश्मिट को बताया जिसने राष्ट्रीय समाजवादियों को सत्ता में लाने, उन्हें राजनीतिक विचारधारा देने तथा नाज़ी राज्य की नस्लवादी नीति बनाने का काम किया.

न्यूमैन की पुस्तक ‘’बेहेमॉथ’’ में विश्लेषण ‘द डूअल स्टेट’ से आगे जाता है. वीमर गणराज्य के बाद के वर्षों में फ्रैंकल के वैधानिक साथी-सहयोगी न्यूमैन थे लेकिन 1933 में ही उन्हें जर्मनी छोड़ने पर मजबूर कर दिया गया था. उन्होंने इंग्लैण्ड में हैराल्ड लास्की और कार्ल मानहाइम के निर्देशन में राजनीति विज्ञान में एक लघु शोध किया. न्यूमैन की ‘बेहेमॉथ’ राजनीतिक दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण पुस्तक थी क्योंकि इसने राष्ट्रीय समाजवाद के आंतरिक ढांचे का विस्तृत विश्लेषण उस समय किया जब अमेरिका ध्रुवीय शक्तियों के विरुद्ध युद्ध में उतरने वाला था और जब सब कुछ इस बात पर निर्भर करता था कि जिस शत्रु को वह हराना चाहता था उसकी विनाशक क्षमता को पूरी तरह से सामने लाया जाए. न्यूमैन ने अपना विश्लेषण राजनीतिक, आर्थिक एवम् समाजशास्त्रीय आधार पर दिया. राजनीतिक दृष्टि से राष्ट्रीय समाजवाद आंदोलन उदारवाद और प्रजातंत्र के विरुद्ध संघर्ष था, और यद्यपि इस पर निरंकुश राज्य का जामा चढ़ा हुआ था पर इसमें राज्य सत्ता व दलीय सत्ता का समन्वय दिखाई देता था जिसमें दोनों अपने वर्चस्व केलिए संघर्षरत् थे. परिणाम स्वरूप, सामाजिक व राजनीतिक जीवन में एक समन्वय हो गया, और इस समन्वित व्यवस्था में वेबर के ‘करिश्माई नेतृत्व’ द्वारा राष्ट्रीय समाजवादी विचारधारा और उसके व्यवहारिक दृष्टिकोण का सहारा लेकर दैनिक जीवन में शक्ति का प्रयोग किया गया. न्यूमैन के अनुसार, इसी का सहारा लेकर ‘नस्लवाद और यहूदी विरोध’ की नीतियां तैयार हुईं जिसने न केवल अन्तर्राष्ट्रीय कानून को नष्ट किया बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान वह एक भयावह सच्चाई भी बनी.

आर्थिक क्षेत्र में राष्ट्रीय समाजवाद, न्यूमैन के अनुसार, अर्थव्यवस्था के वर्चस्व तथा पूंजीवाद के बीत करता है. लेकिन वह 1930 व 1940 के दशकों में आये परिवर्तनों की भी अनदेखी नहीं करता. एक ओर एकाधिकारवादी प्रकृति से परिपूर्ण निजी क्षेत्र की शक्तियों में अभिवृद्धि थी जो राज्य के समर्थन से फल-फूल रही थी, वहीं दूसरी ओर राज्य का ‘बाध्यकारी’ स्वरूप था जो यद्यपि ‘नियोजित अर्थव्यवस्था’ तो नहीं, पर ‘आदेशात्मक अर्थव्यवस्था’ तक पहुंच रहा था. पर न्यूमैन की थीसिस का सबसे अहम् वह पहलू था जिसमें उन्होंने बताया कि राज्य यहूदी सम्पत्ति के आर्थिकरण तथा विदेशी उद्योगों के जर्मनीकरण द्वारा पूंजीवाद के दिग्गजों को फायदा पहुंचाने का काम कर रहा था. इस प्रकार सामूहिक अपराध में राजनीति व अर्थव्यवस्था की मिली-जुली भागीदारी हो रही थी.

‘बेहेमॉथ’ का तृतीय खण्ड राष्ट्रीय समाजवाद का समाजशास्त्रीय अर्थ बताता है. न्यूमैन के अनुसार जर्मनी में वर्गों और विशिष्टजनों द्वारा सत्ता का एक नया प्रभावी ढांचा विकसित हुआ जो कि प्रत्यक्ष हिंसा से स्थापित किया गया और जिसे स्थापित रखने में आतंक व प्रचार का सहारा लिया गया. तो भी सत्ता वर्ग इसमें एकजुट न होकर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक शक्ति पुंजों की भांति थे जिनके पारस्परिक हितों में संघर्ष को विचारधारा द्वारा छुपाया जाता था. देश या विदेश में केवल नग्न हिंसा के प्रयोग में ही ये शक्तियां एक साथ थीं.

राष्ट्रीय समाजवादी व्यवस्था में राजनीतिक दल, नौकरशाही, सेना व उद्योगपतियों के अतिरिक्त आम जनता बिल्कुल शक्तिहीन व लाचार थी. मज़दूर वर्ग भी अन्य स्वायत्त संस्थाओं की भांति पूंजी व तानाशाही राज्य की दया पर निर्भर हो गया. न्यूमैन द्वारा राष्ट्रीय समाजवाद की सामाजिक व्यवस्था का महत्वाकांक्षी संरचनात्मक विश्लेषण राज्य के वैधानिक और राजनीतिक सिद्धान्त में एक बड़ा रास्ता खोलता है और बताता है कि न्यूमैन किस हद तक आम मामलों के एक अधिवक्ता से एक राजनीतिक वैज्ञानिक बन गए. समाजवाद का आधार वैधानिक अधिकारों के ह्रास तथा उससे उत्पन्न भय के शून्य को प्रचार व आतंक से भरना था जो स्वयं एक राजनीतिक सिद्धान्त है.

राष्ट्रीय समाजवाद पर सिगमंड न्यूमैन तथा कार्ल फ्रेडरिक

फासीवाद पर अभी तक अपर्याप्त विमर्श के विपरीत सर्वाधिकारवाद की अवधारणा पर हम उसके प्रारम्भ के इतिहास के बारे में काफी जानते हैं जो मुसोलिनी (फासीवाद) के उदारवादी विरोधियों के मध्य 1920  के दशक में शुरू हुआ. 1930 का दशक कई स्वदेशत्यागी, ज्यादातर रूढ़िवादियों का रहा जैसे कि वाल्डेमर गुरियन व एरिक बोगेलिन. सिगमंड न्यूमैन की 1942 में प्रकाशित पुस्तक ‘परमानेन्ट रिवोल्यूशन’ अधिनायकवादी अवधारणा के विकास में महत्वपूर्ण स्थान रखती है. इस पुस्तक ने न केवल सर्वाधिकारवाद द्वारा उठायी गई पद्धति सम्बन्धी समस्यायें सामने रखी, बल्कि काफी प्रशंसनीय ढंग से उन्हें हल भी किया. सिगमंड न्यूमैन यह जानना चाहता था कि विभिन्न समाजिक व्यवस्थाओं का एक समग्रता के रूप में तुलनात्कम विश्लेषण कैसे किया जा सकता है. उसका मानना था कि इटली का फासीवाद, जर्मनी का राष्ट्रीय समाजवाद(नाज़ीवाद) तथा रूसी बोल्शेविकवाद एक समान नहीं है. इन्हीं तीनों अध्ययनों (इटली, जर्मनी, रूस) के आधार पर यह उन पांच स्रोतों को रेखांकित करते हैं जिनके प्रति सर्वाधिकारवादी समान दृष्टि रखते हैं. यह क्षेत्र है – ‘स्थायित्व की मान्यता’, ‘कार्यक्रम की जगह कदम’, ‘राजनीति का अर्द्ध-प्रजातांत्रिक आधार’, ‘युद्ध-मनोविज्ञान’ और ‘नेतृत्व सिद्धान्त’. इसे कार्यान्वित करने में न्यूमैन तुलनात्मक पद्धति का अनुसरण करते हैं. न्यूमैन इससे ‘सर्वाधिकारवादी शासनों’ की अवधारणा तक पहुंचते हैं. सर्वाधिकार की आंतरिक संरचना के लिए निम्न बिन्दु महत्वपूर्ण हैं, एक, समूह समर्थित नेतृत्व : अर्थात् एकल नेतृत्व के पीछे एक प्रतिबद्ध समूह का अस्तित्व; दो, इस नेतृत्व के पीछे एक भीड़ का समर्थन (जो बुर्जुआ समाज का अवशेष है); तीन, अधिनायकवादी सत्ता का केन्द्रीय संस्थान ‘एक दलीय राज्य’ है जो नेतृत्व व भीड़ के बीच तथा राज्य व समाज के बीच एक सेतु का काम करता है. यद्यपि ये सत्ता चुनाव, नौकरशाही का प्रयोग, सैन्यीकरण व शिक्षा पर नियंत्रण जैसे परम्परागत् तरीकों का सहारा लेता है, पर यह प्रचार और युद्ध प्रोपगेण्डा द्वारा उत्पन्न भय  को ‘राजनीतिक अस्त्र’ के रूप में प्रयोग करता है.

1942 में सिगमंड न्यूमैन के पुस्तक लोकतान्त्रिक व सर्वाधिकारवादी सिद्धान्तों के ध्रुवीकरण पर खत्म होती है. पर यह ध्रुवीकरण तत्कालीन सैन्य ध्रुवीकरण के अनुकूल नहीं था क्योंकि विश्वयुद्ध में जहां एक ओर फासीवादी शक्तियां थीं, वहीं दूसरी ओर लोकतांत्रिक शक्तियों के साथ सोवियत संघ(सर्वाधिकारवादी  शक्ति) भी था. 1942 में लिखी इस पुस्तक के बाद यदि 1950 के दशक के मध्य में लिखी फ्रेडरिक व ब्रिझेजिन्सकी की किताब पढ़ी जाए तो राजनीति विज्ञान के क्षेत्र में सर्वाधिकारवाद के विश्लेषण सम्बन्धी अनेक प्रश्नों के समाधान मिल सकते हैं जैसे पद्धति सम्बन्धी प्रश्न जिससे सर्वाधिकारवादी व्यवस्थाओं के बीच तुलना की जा सके, ऐसा करने में कौन से बदलाव सामने आयेंगे, उनको किस तरीके से जोड़ा जाए जिससे विषय वैज्ञानिक बने आदि. एक स्तर पर इन प्रयोगों का अंतर स्पष्ट है – इसके लिए हमें और अधिक ऐतिहासिक तथा अनुभवमूलक सामग्री पर ध्यान देना होगा जो कि 1950 के दशक के लेखकों (फ्रेडरिक और ब्रिझेजिन्सकी) के हाथ में थी. इन लेखकों की पुस्तक ‘टोटालिटेरियन डिकटेटरशिप एण्ड आटोक्रेसी’ (1956) की तीन प्रमुख विशेषताओं की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूं;  (1) पुस्तक में सर्वाधिकारवादी प्रणाली की 6 विशेषताएं बतायी गई हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि वे किस तरह एक विशेष प्रकार के सर्वाधिकारवाद को जन्म देती हैं क्योंकि पुस्तक में यह थीसिस भी प्रतिपादित की गई है कि प्रत्येक सर्वाधिकारी सत्ता अपने में स्वयं एक प्रकार है जो एक ऐतिहासिक नवीनता को व्यक्त करती है;  (2) पुस्तक में सत्ता के एकाधिपत्य को सैद्धान्तिक एवम् अनुभवात्मक आधार पर न्यायसंगत ठहराया गया है (सत्ता का एकाधिपत्य एकदलीय वर्चस्व, तथा संचार, सेना और आर्थिक मामलों पर एकाधिकार में व्यक्त होता है) क्या यह राजनीति विज्ञान में ‘राज्य-केन्द्रिकता’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन नहीं ? और फिर यह उस थीसिस के भी प्रतिकूल है जिसमें प्रत्येक सर्वाधिकारवादी सत्ता को ऐतिहासिक नवीनता माना गया है, और क्या बोल्शेविकवाद और राष्ट्रीय समाजवाद को एक ही सैद्धान्तिक मॉडल से समझा जा सकता है; (3) पुस्तक में सर्वाधिकारवादी व्यवस्थाओं की ‘शासन पद्धतियों’ पर ज्यादा ध्यान दिया गया है अर्थात् इन व्यवस्थाओं की ‘प्रौद्योगिक व्याख्याएं’ की गई हैं.

हेना अरेन्ट द्वारा सर्वाधिकारवाद की दार्शनिक व्याख्या

हेना अरेन्ट की पुस्तक द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद प्रकट हुई, और इसने सर्वाधिकारवाद पर विमर्श को एक नया आयाम दिया. इसमें विज्ञान और राजनीतिक सिद्धान्तों का अनुपम मेल किया गया है. उस समय एक ओर फासीवाद और नाजीवाद की व्यवस्थाएं थीं, जिन पर युद्ध और विध्वंस की छाप थी तो दूसरी ओर सर्वाधिकारवाद पर विचारधारामूलक विमर्श था जिसे राजनीति विज्ञान के विकास के रूप में भी देखा जाता रहा है. हेना अरेन्ट की पुस्तक द्वारा राजनीतिक रूप से संवेदनशील और सैद्धान्तिक दृष्टि से उलझाऊ ‘सर्वाधिकारवाद’ विषय पर विमर्श में सशक्त हस्तक्षेप किया गया है. उनके हस्तक्षेप के तीन बिन्दु विशेष महत्व के हैं. प्रथम, हेना अरेंट के अनुसार मानवता के इतिहास में ‘सर्वाधिकारवाद का अभ्युदय एक पूर्णत: नवीन तथा भंयकर व दहलाने वाली घटना थी. पुस्तक में दो ऐसी बातें थीं जिन्होंने पूरे विमर्श में उत्तेजना पैदा कर दी तथा इतिहास और समाज विज्ञान की आधारशिला पर कुठाराघात किया. एक, अरेंट ने वैज्ञानिक शोध की दो मूलभूत मान्यताओं ऐतिहासिक तथा सामाजिक प्रक्रियाओं में निरन्तरता एवं कारण-परिणाम सम्बन्ध – पर प्रश्नवाचक लगाया; दो, उसने गैर-यहूदी और साम्राज्यवाद को प्रागैतिहास की संज्ञा दी जिसने सर्वाधिकारवाद को जन्म दिया. यद्यपि सर्वाधिकारवादी विमर्श साहित्य की गुणवत्ता को अरेन्ट ने नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया, पर इस सम्बन्ध में अपना दार्शनिक सिद्धान्त प्रतिपादित करने में उसने कुछ बातों की अनदेखी भी कर दी. एक तो उसने विभिन्न सर्वाधिकारवादी व्यवस्थाओं की आन्तरकि सहायता एवं कार्यात्मक भिन्नता को स्पष्ट करने हेतु उपलब्ध नवीन समाजशास्त्रीय सिद्धान्तों की उपेक्षा की, वहीं दूसरी ओर, उसने तुलनात्मक सामाजिक एवं राजनीतिक शोध की उन्नत विधियों की भी उपेक्षा की.

द्वितीय, हेना अरेंट की पुस्तक ने पूर्ववर्ती रचनाओं को जैसे पछाड़ दिया. उनका सर्वाधिकारवाद का विश्लेषण् इतना पैना क्यों था ? उन्होंने यही नहीं कहा कि हमें इसके बारे में खुली चर्चा करनी चाहिये, वरन् यह भी कि इसे चिन्तन और अभिव्यक्ति के एक नये सार्वभौमिक रूप में भी देखना चाहिये. अरेंट के विश्लेषण की प्रभावशीलता के कारणों को जानने के लिये उनके जीवन वृत्त से काफी कुछ पता चलता है. अरेंट के विचारों पर (वीमर रिपब्लिक में) जर्मन अस्तित्ववाद का प्रभाव है, विशेषकर मार्टिन हेडेगर और कार्ल जेस्पर्स के विचारों का. इन विचारों को उन्होंने अपने अध्ययन व अनुभवों के आधार पर संसोधित किया. विश्व में मानव के एकाकीपन तथा घटते सामाजिक सम्बन्धों के कारण भी सर्वाधिकारवाद में राज्य व सेना को दरकिनार कर गुप्तचर – पुलिस, विचारधारा और भय का वर्चस्व स्थापित हो जाता है. अरेंट के अनुसार अन्तत: ‘कन्सन्ट्रेशन कैम्पस’ सर्वाधिकारवादी व्यवस्थाओं की सबसे शक्तिशाली संस्था हो जाती है जिससे विरोधियों का सफाया किया जाता है. वास्तव में सर्वाधिकारवादी व्यवस्था ‘मनुष्य के अस्तित्व’ को ही नकार देती है.

तृतीय, हेना अरेंट ने केवल जर्मन नाज़ीवाद तथा रूसी स्टालिनवाद को ही सर्वाधिकारवादी व्यवस्थआ माना; फासीवाद (इटली)  या स्टालिन के बाद की साम्यवादी व्यवस्था को नहीं. बहुत लोगों का मानना है कि संभवत: अरेंट को इस संबंध में पूरा ज्ञान न था पर इतना अवश्य है कि उनकी पुस्तक ने सर्वाधिकारवादी व्यवस्थाओंके सम्बन्ध में ऐतिहासिक एवम् समाज-वैज्ञानिक शोध को काफी प्रभावित किया.

(पुनर्लेखन : चेतना मिश्रा, प्रवक्ता राजनीति विज्ञान विभाग, एच.के. एम. कॉलेज, सीतापुर, उ. प्र., एवं शोधार्थी शोध-मण्डल)

प्रस्तुत लेख ‘यूरोपियन जर्नल ऑफ पोलिटिकल थियरी’ अंक 3(2), 2007 पृष्ठ 219-238 से साभार उद्धत. मूल लेख ‘हेना अरेंट्स द ओरिजिन ऑफ टोटालिटेरियनिज्म इन इट्स ओरिजनल कन्टेक्स्ट’ शीर्षक से प्रकाशित.

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