भारतीय लोकतन्त्र में समावेशी राजनीति, बसपा की सोशल इंजीनियरिंग

डॉ. एके वर्मा : विगत कुछ समय से भारतीय लोकतन्त्र जातीय आधार पर मतदाताओं के विभाजन, खण्डित जनादेश, त्रिशंकु लोकसभा व विधान सभाओं, राजनीतिक दलों के ध्रुवीकरण और गठबन्धन सरकारों से उपजी राजनीतिक अस्थिरता से ग्रस्त रहा है. यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय व प्रान्तीय दोनों ही स्तरों पर दिखाई देती है. ऐसे में ज्यादातर राज्यों में किसी एक दल की बहुमत सरकार बनना कठिन होता जा रहा है. अनेक विविधताओं वाले बहुसांस्कृतिक भारतीय समाज में राजनीतिक दलों के लिये सामाजिक स्तर पर बहुमत जुटाना काफी चुनौतीपूर्ण होता जा रहा है – खासतौर से तब जबकि स्वयं इन दलों का संरचनात्मक सामाजिक आधार संकीर्ण हो. इस परिप्रेक्ष्य में उत्तर प्रदेश में सक्रिय जातिवादी दलों- बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) के द्वारा कुछ नूतन प्रयोग किये गये. इन प्रयोगों का मूल उद्देश्य अपने जातीय स्वरूप का परित्याग कर, अन्य जातियों को आकर्षित कर ‘समावेशी राजनीति’ करना था जिससे चुनावों में पूर्ण बहुमत प्राप्त कर एक-दलीय स्थायी सरकार का गठन किया जा सके. इस प्रयास में 2007 के विधान सभा चुनावों में बसपा को भारी सफलता प्राप्त हुई.

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बसपा की सफलता चौंकाने वाली थी क्योंकि उत्तर प्रदेश में मतदाता चार प्रमुख दलों – बसपा, सपा, भाजपा और कांग्रेस – के बीच बंटा था. 2002 के विधानसभा चुनावों में बसपा को मात्र 98 सीटें मिली थी जो पूर्ण बहुमत (202/403) से काफी कम थीं. ऐसे में किसी को भी यह उम्मीद न थी कि उसे आगामी चुनावों में पूर्ण बहुमत मिल सकेगा. लेकिन 2002 से 2007 के बीच कुछ ऐसा घटित हो रहा था जो अत्यन्त अप्रत्याशित था, जिसे लेखक ने ‘प्रतिलोम सामाजिक परासरण’ (रिवर्स सोशल ऑस्मासिस) की संज्ञा दी थी, और चुनाव के परिणामों के एक माह पूर्व निम्न टिप्पणी की थी :

“परन्तु, प्रतिलोम सामाजिक परासरण से गठबन्धन राजनीति के अन्त व एक-दलीय शासन व्यवस्था की नई संभावना बनती है. यदि कोई भी दल स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने हेतु अपना सामाजिक-जनाधार बढ़ाने के लिये प्रतिलोम सामाजिक परासरण का प्रयोग कर सकेगा तो उत्तर प्रदेश में लम्बे समय से चले आ रहे खण्डित जनादेश, त्रिशंकु विधान सभाओं तथा गठबन्धन की राजनीति का अन्त हो जायेगा.” (वर्मा : 2007 अ) प्रतिलोम सामाजिक परासरण की चर्चा आगे की जायेगी.

पाश्चात्य लोकतन्त्रों में राजनीतिक विचारधारा को आधार बना कर राजनीति की जाती है, परन्तु भारतीय लोकतंत्र में क्यों जाति को आधार बना कर राजनीति होती है? पाश्चात्य जगत में जब लोकतंत्र की शुरूआत हुई तब वहां की सामाजिक संरचना में काफी समरूपता थी, और राजनीतिक स्पर्धा के लिये जब राजनीतिक गतिमानता की आवश्यकता हुई तो वह सामाजिक समरूपता के कारण किसी सामाजिक कारक के आधार पर संभव न थी. अत: वहां राजनीतिक कारक (विचारधारा) को ही राजनीतिक गतिमान और चुनावी स्पर्धा के लिये प्रयोग किया जा सकता था. परन्तु भारत को सामाजिक विविधताओं का देश है, अत: यहां राजनीतिक गतिमानता और चुनावी स्पर्धा के लिये राजनीतिक के साथ-साथ सामाजिक कारक (जाति, धर्म, भाषा आदि) भी मौजूद थे. हम दोनों में से किसी का भी चयन कर सकते थे. पर हमने राजनीतिक (विचारधारा) के स्थान पर क्यों सामाजिक कारक (जाति) का चयन किया?

इसका एक ऐतिहासिक कारण था : स्वतन्त्रता-आन्दोलन के दौरान देश में जो राजनीतिक एकता स्थापित हुई उससे पूरे देश की राजनीतिक सोच और दृष्टि में भी समरूपता सी आ गई. कांग्रेस की विचारधारा से हट कर किसी अन्य विचारधारा को सामाजिक मान्यता मिलना मुश्लिक हो गया. इसीलिये, भारतीय लोकतन्त्र में वामपंथी और दक्षिणपंथी दलों को काफी समय तक उपेक्षा मिली. अत:, समाज की सभी जातियों व धर्मों के लोग लम्बे समय तक कांग्रेस में ही बने रहे और कांग्रेस एक ‘इन्द्रधनुषीय सामाजिक गठबन्धन’ का चरित्र प्राप्त कर सकी. पर जब 1967 के बाद राज्यों में और 1977 के बाद केन्द्र में गैर-कांग्रेसी दलों की सरकारें बनने लगीं, तब भी इन दलों को कोई वैकल्पिक विचारधारा तलाशे न मिली. अत: इन नये दलों ने राजनीतिक गतिमानता और चुनावी स्पर्धा के लिये सामाजिक कारक ‘जाति’ को अपना आधार बनाया. यह आधार इतना दृढ़ होता गया कि कालान्तर में भारतीय राजनीति में जाति को ही विचारधारा की मान्यता प्राप्त हो गई (श्रीनिवास : 1962). और लगभग सभी दल राजनीतिक स्पर्धाओं और गतिमानताओं के प्रत्येक बिन्दु पर जाति का सहारा लेते हैं.

बसपा ने इसी जाति का सहारा लेकर अपने ‘सोशल इंजीनियरिंग’ से समावेशी राजनीति का एक लोकतान्त्रिक मॉडल तैयार कर डाला. बसपा की सोशल इंजीनियरिंग को दो चरणों में देखा जा सकता है –

बहिर्वेशी राजनीति का काल (1977-2002)

मायावती ने 1977 में बसपा में प्रवेश किया और अपने प्रेरणा स्रोत कांशीराम से मिलकर बसपा को एक ‘दलित-पार्टी’ के रूप में स्थापित कर दिया. इस काल खण्ड में उन्होंने हिन्दू समाज से दलितों के बहिर्वेशन का प्रयोग कर पार्टी का दलित आधार सशक्त किया. इसके लिये कांशीराम ने 1978 में आल इंडिया बैकवर्ड्स एण्ड माइनारिटीज़ कम्यूनिटीज़ एम्प्लाइज फेडरेशन’ (बामसेफ) तथा 1981 में दलित-शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4) बनाकर दलितों को आकर्षित किया. इसमें अम्बेडकर की विचारधारा का प्रमुखत: तथा ज्योतिबा फुले, छत्रपति श्री शाहू जी महाराज (महाराष्ट्र), नारायण गुरू (केरल) तथा पेरियार इ. वी. रामास्वामी (तमिलनाडु) की विचारधाराओं का भी प्रयोग किया गया.

इस कार्य में मददगार एक महत्वपूर्ण घटना 1980 के दशक में घट रही थी जिसे द्वितीय जन-उफान (यादव : 1996) कहा जाता है, और जिसमें दलितों, पिछड़ों आदिवासियों व महिलाओं की राजनीति में हिस्सेदारी बढ़ रही थी. द्वितीय जन-उफान के कारण दलितों व पिछड़ों का कांग्रेस से मोहभंग हो रहा था. दलित समाज काफी समय तक कांग्रेस का ठोस जनाधार था, पर 1989 तक ‘द्वितीय जन-उफान’ के कारण दलितों एवम् पिछड़ों ने कांग्रेस से किनारा कर लिया. यहांदो प्रश्न काफी रोचक हैं –

(i) दलितों व पिछड़ों ने क्यों कांग्रेस छोड़ी ?

(ii) और, कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने उपलब्ध विकल्पों- वामपंथी दलों व दक्षिणपंथी दल (भाजपा) की ओर अपना रूख क्यों नहीं किया ? क्यों वे एकदम नये दलों की ओर आकर्षित हुए- दलित बसपा की ओर, और पिछड़े जनता दल/सपा की ओर?

पहले प्रश्न का उत्तर सरल है. कांग्रेस सभी सामाजिक घटकों के प्रतिनिधित्व का दावा करती थी, पर उसने दलितों और पिछड़ों को नेतृत्व संरचना में समुचित प्रतिनिधित्व नहीं दिया. दलितों के नाम पर कांग्रेस में केवल जगजीवन राम दिखाई देते हैं, और पिछड़ों का तो कांग्रेस में जैसे कोई नेता था ही नहीं. यह काफी हैरत वाली बात है क्योंकि प्रथम पिछड़ा आयोग (काका कालेलकर आयोग) के अनुसार देश में पिछड़े 31.8 प्रतिशत तथा उ. प्र. में 41.13 प्रतिशत थे. अत: कांग्रेस से जुड़े दलितों और पिछड़ों में कहीं उपेक्षित व आहत होने का भाव था. उन्हें अवसर की तलाश थी. इसलिये जैसे ही उत्तर प्रदेश में जातिवादी दलों का अभ्युदय हुआ, उन्हें कांग्रेस छोड़ने का एक अवसर मिल गया.

लेकिन दूसरे प्रश्न का उत्तर देना अभी शेष है; इस पर अभी चर्चा अपूर्ण है. एक नज़रिये से देखा जाये तो वामपंथी व दक्षिणपंथी दलों के लिये यह एक ऐतिहासिक अवसर हो सकता था यदि वे कांग्रेस से निकली इस विशाल ऊर्जा (दलितों-पिछड़ों) को अपने में मिला लेते. दलित और पिछड़े दोनों ही वामपंथी दलों के ‘सहज-जनाधार’ हो सकते थे क्योंकि विचारधारा के स्तर पर वामपंथी इसी वर्ग की वकालत करते हैं. पर ऐसा न हो सका. और, यही कौतूहल दलितों-पिछड़ों के निर्णय पर भी है; उन्हें वामपंथ व दक्षिणपंथ के रेडीमेड दल आसानी से मिल सकते थे, और उन दलों की नेतृत्व संरचना में समुचित प्रतिनिधित्व के लिये वे मोल-भाव भी कर सकते थे. पर यह भी नहीं हुआ. उन्हें छोड़ कर ये सामाजिक घटक नये जातीय दलों – बसपा व जद/सपा की ओर क्यों बढ़ चले? इसी अनुत्तरित प्रश्न को ‘सामाजिक परासरण’ के आधार पर हल करने का प्रयास किया गया है.

सामाजिक परासरण (सोशल ऑस्मासिस)

सामाजिक परासरण उत्तर प्रदेश में जातीय दलों बसपा व सपा के अभ्युदय को स्पष्ट करने का प्रयास करता है, और यह तर्क देने की कोशिश करता है कि इन दलों के अभ्युदय का एक वैज्ञानिक कारण था. इसे स्पष्ट करने के लिये ‘परासरण’ (ऑस्मासिस) जैसी वैज्ञानिक प्रक्रिया का सहारा लिया गया है.

परासरण है क्या ? चित्र 1 व 2 को ध्यान से देखें. जब दो भिन्न  घनत्व वाले द्रवों को एक अर्धपारगम्य झिल्ली से अलग करते हैं तो द्रव का प्रवाह विरल से सघन की ओर होता है. यह ‘परासरण के दबाव’ के कारण होता है. द्रव का प्रवाह तब तक होता रहता है जब तक झिल्ली के दोनों ओर द्रव का घनत्व समान नहीं हो जाता. इसी वैज्ञानिक प्रक्रिया को ‘परासरण’ कहते हैं. इसी परासरण का प्रयोग कर यह समझाने का प्रयास किया गया है कि जातिवादी दलों की ओर जाति समूह क्यों और कैसे आकृष्ट हुये : दलित बसपा तथा पिछड़े सपा की ओर क्यों आकर्षित हुये ?

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चित्र 3 व 4 ध्यान से देखें. यह बसपा में ‘सामाजिक परासरण’ की प्रक्रिया को दर्शाता है. इसमें द्रव के स्थान पर जाति(दलित) को रखा गया है. बसपा को जातिवादी दलित विचारधारा पर आधारित होने के कारण ‘सघन क्षेत्र’ के रूप में और समाज में दलितों को ‘विरल-क्षेत्र’ के रूप में दर्शाया गया है. चुनाव की प्रक्रिया यहां एक अर्धपारगम्य झिल्ली का काम करती है. बसपा ‘उच्च-दलित-सघनता’ को इसलिये व्यक्त करती है क्योंकि यह दलित विचारधारा के आधार पर केवल दलितों और उनके कल्याण की बात करती रही. पर, समाज में दलित वर्ग चंहुओर विसरित होने के कारण वह निम्न-दलित सघनता को दर्शाता है. अत: चुनावों के दौरान ‘दलित परासरण दबाव’ के कारण विरल दलित क्षेत्र (समाज) से सघन दलित क्षेत्र (बसपा)रल की ओर प्रवाह होता है जिससे दलित समाज का बसपा की ओर रुझान एक स्वाभाविक वैज्ञानिक प्रक्रिया के रूप में व्यक्त होता है. इसेस बसपा के बढ़ते दलित जनाधार को स्पष्ट समझा जा सकता है. ठीक इसी प्रकार सपा में अन्य पिछड़ा वर्ग के बढ़ते जनाधार की भी व्याख्या की जा सकती है.

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सामाजिक- परासरण से जातीय दलों के द्वारा की जाने वाली ‘बहिर्वेशन की राजनीति’ की प्रक्रिया समझने में मदद मिलती है. इसके द्वारा जातीय-अस्मिताएं और कठोर हुई, तथा समाज दलितों व गैर-दलितों, और अगड़ों व पिछड़ों में बंट गया. लेकिन इससे इसमें बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी को अपने-अपने दलों को क्रमश: दलितों और पिछड़ों के समर्थन से सशक्त करने का अवसर मिला. परिणामस्वरूप, उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस हाशिए पर आ गये. नीचे दी गई सारणी को देखें :

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उत्तर प्रदेश में 1989 से 2007 तक के विधान सभा चुनावों के परिणाम कांग्रेस, भाजपा, सपा व बसपा के सन्दर्भ में दिखाये गये हैं. 1993 व  1996 के परिणामों पर गौर करें. आप देखेंगे कि इन दोनों ही चुनावों में बसपा को 67-67 सीटें व 11 प्रतिशत वोट मिले तथा सपा को 109-109 सीटें व 18 से 19 प्रतिशत वोट मिले. इससे इन जाति- आधारित दलों को स्पष्ट हो गया कि सामाजिक-परासरण पर आधारित बहिर्वेशन की राजनीति को अब और आगे नहीं लाया जा सकता. इसके आधार पर उनके जनाधार के विस्तार की एक सीमा है, जो बहुमत से काफी दूर है. अत: यदि उन्हें अपने जनाधार का विस्तार का कर 202/403 के आंकड़े को छूना है तो अपनी बहिर्वेशी राजनीति का परित्याग कर समावेशी राजनीति की ओर कदम बढ़ाना पड़ेगा. 2002 के विधान सभा चुनावों के बाद इसे अमली जामा पहनाने में बसपा ने आश्चर्यजनक तेजी व मौलिकता का प्रदर्शन किया.

समावेशी राजनीति का काल (2002 से आगे)

2002 से 2007 के काल को बसपा की ‘समावेशी राजनीति का युग’ कहा जा सकता है. यह युग अनेक अप्रत्याशित घटनाओं से भरा पड़ा है. बहुजन समाज की नेत्री मायावती ने सवर्ण समाज के विरुद्ध पूर्व में काफी विष-वमन कर रखा था जिससे सवर्ण समाज व दलित समाज के बीच कटुता बढ़ गई थी. इसलिये सवर्ण समाज को बसपा की ओर आकृष्ट करना असम्भव सा ही लगता था. परन्तु मायावती ने विलक्षण नेतृत्व का प्रदर्शन करते हुये उस असम्भव को संभव बनाया, और ‘सामाजिक-परासरण’ पर आधारित बहिर्वेशी-राजनीति का परित्याग कर ‘प्रतिलोम-सामाजिक-परासरण’ पर आधारित समावेशी राजनीति का सूत्रपात कर दिया. इसके लिये उन्हें अपनी पार्टी में दार्शनिक, विचारधारामूलक और नीतिगत परिवर्तन करने पड़े.

दार्शनिक फलक पर बसपा ने दो प्रमुख परिवर्तन किये. प्रथम, ‘बहुजन’ की अवधारणा का परित्याग कर ‘सर्वजन’ की अवधारणा को स्वीकार किया गया, अर्थात् पार्टी में केवल दलितों व पिछड़ों का ही नहीं, वरन् सवर्णों का भी स्वागत किया जाने लगा. द्वितीय, बसपा नेतृत्व ने मनुवादी (अर्थात् सवर्ण या उच्च जातियों) को निशाना बनाने के बजाय मनुवाद (ब्राह्मणवादी व्यवस्था, वर्ण-व्यवस्था, अस्पृश्यता) को निशाना बनाना शुरू कर दिया.

विचारधारा के स्तर पर भी बसपा में कुछ परिवर्तन हुये. एक, बसपा ने अम्बेडकरवादी विचारधारा से कुछ दूरी बनानी शुरू की और एक कदम गांधीवाद की ओर बढ़ाया. अम्बेडकर दलितों के लिये हिन्दू समाज से अलग हट कर एक स्वतन्त्र पहचान की वकालत करते थे, पर गांधी उन्हें हिन्दू समाज के अभिन्न अंग के रूप में बनाये रखना चाहते थे और इसके लिये उन्होंने आमरण अनशन (22-25 सितम्बर, 1932) कर अपने प्राणों की बाजी लगा दी जिससे अन्तत: ‘पूना पैक्ट’ हुआ और उनकी बात मानी गई. अत: गांधीवादी दृष्टिकोण के बिना दलितों व गैर-दलितों को एक मंच पर लाना संभव नहीं. अम्बेडकरवादी विचारधारा बहिर्वेशी राजनीति करने तक तो ठीक थी, पर बिना गांधी के किसी समावेशी राजनीति की परिकल्पना कैसे की जा सकती है? मायावती के द्वारा अम्बेडकर व गांधी का समन्वय और बहिर्वेशी से समावेशी राजनीति करने के प्रयासों की स्वाभाविक मांग थी कि बसपा केवल दलितों के हितों का ही नहीं, वरन समाज के सभी वर्गों व जातियों के हितों के प्रश्न उठाये. इससे पार्टी की विचारधारा जाति के स्थान पर वर्ग केन्द्रित होने लगी. यह बसपा की विचारधारा में दूसरा महत्वपूर्ण परिवर्तन था.

नीतियों के स्तर पर भी मायावती की वर्तमान सरकार ने महत्वपूर्ण परिवर्तन किये. जब तक बसपा बहिर्वेशी राजनीति करती रही, और मात्र दलितों पर ध्यान केन्द्रित करती रही तब तक उसने कृषि और उद्योग दोनों की उपेक्षा की, और केवल दलित-बहुल अम्बेडकर गांवों के विकास पर ध्यान दिया. इसका प्रमुख कारण यह था कि दलित समाज न तो उद्योग के क्षेत्र में आगे था, न कृषि के क्षेत्र में. वह इन दोनों ही क्षेत्रों में मात्र श्रमिक था. अत: इन क्षेत्रों में विकास का सीधा लाभ उसे नहीं मिल पाता. लेकिन अम्बेडकर गांवों के विकास से उसे सीधा लाभ मिलता था. इसके अतिरिक्त, मायावती की आलोचना सदैव ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर हुई है, पर संभवत: वे अपने विश्वासपात्र अफसरों को महत्वपूर्ण स्थानों पर तैनात करके शांति व्यवस्था की स्थापना करने का प्रयास करती रहीं हैं. एक बेहतर शांति-व्यवस्था का सीधा लाभ दलितों को मिलता था, यद्यपि उससे समाज के अन्य वर्गों को भी राहत मिलती. इसीलिये मायावती सरकार की इस बिन्दु पर सदैव प्रतिष्ठा रही है. लेकिन समावेशी राजनीति के चलते बसपा ने अपनी विकास नीतियों में काफी परिवर्तन किया. कृषि और उद्योग दोनों ही क्षेत्रों में व्यापक निवेश किये गये तथा प्रदेश के 19 हजार अम्बेडकर गांवों के स्थान पर मायावती सरकार द्वारा सभी 97,134 गावों के विकास का लक्ष्य स्वीकार किया गया जिसे पांच चरणों में पूरा किया जाना था. ट्रांसफर व पोस्टिंग को निश्चित अवधि के लिये लागू कर दिया गया, और केवल अत्यावश्यक कारणों से ही किसी का अवधि से पूर्व ट्रांसफर किये जाने का निर्णय लिया गया था. 2007-12 के दौरान मायावती सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं में ऊर्जा, किसानों का सशक्तीकरण और ग्रामीण विकास, आधारभूत संरचनाएं, ट्रांसपोर्ट व शहरी विकास आदि प्रमुख थे जो बसपा की पूर्व सरकारों की नीतियों का एकदम विलोम लगती हैं.

इस प्रकार, बसपा ने दार्शनिक, विचारधारा-मूलक व नीतिगत परिवर्तन करके प्रतिलोम सामाजिक परासरण (रिवर्स सोशल ऑस्मासिस) द्वारा समावेशी रानीति करने का एक ठोस आधार तैयार कर दिया.

प्रतिलोम-सामाजिक परासरण (रिवर्स सोशल ऑश्मासिस)

प्रतिलोम सामाजिक परासरण जातीय आधार पर गठित दलों द्वारा बहिर्वेशी से समावेशी राजनीति की ओर मुड़ने की प्रक्रिया को समझने में मदद करता है, और विभिन्नताओं से परिपूर्ण बहुसांस्कृतिक समाजों में सामाजिक कारकों (जैसे जाति, धर्म, भाषा आदि) का प्रयोग कर लोकतान्त्रिक शासन के लिये वांछित बहुमत पाने का मार्ग प्रशस्त करता है. यह पूर्व वर्णित परासरण की वैज्ञानिक प्रक्रिया की विलोम प्रक्रिया ‘प्रतिलोम परासरण’ (रिवर्स ऑस्मासिस) पर आधारित है.

चित्र  5 व 6 को ध्यान से देखें. प्रतिलोम परासरण में दो भिन्न-भिन्न घनत्व वाले द्रवों को जब अर्द्धपारगम्य झिल्ली से अलग करते हैं तो द्रव का प्रवाह विपरीत दिशा – अर्थात् सघन से विरल की ओर होता है. चूंकि यह परासरण की वैज्ञानिक प्रक्रिया के विरुद्ध है, अत: इसमें सघन क्षेत्र पर बाह्य दबाव बनाना पड़ता है और यह बाह्य दबाव ‘परासरण-दबाव’ से ज्यादा होना चाहिये. इसी वैज्ञानिक प्रक्रिया को प्रतिलोम परासरण कहते हैं.

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इसी प्रतिलोम परासरण का समाज में प्रयोग करके यह समझाने का प्रयास किया गया है कि जाति विशेष पर आधारित दल (बसपा/सपा) उन सवर्ण जातियों को अपने में मिलाने में कैसे सफल हुये जिनके प्रति वे बराबर विष-वमन करते रहे व द्वैष का भाव रखते रहे.

चित्र 7-88 को ध्यान से देखें. इसमें बसपा के सन्दर्भ में प्रतिलोम सामाजिक परासरण को दर्शाया गया है. बसपा के अन्दर ब्राह्यणों (या सभी सवर्णों) की उपस्थिति नगण्य, पर समाज में उनकी उपस्थिति ज्यादा रही है. अत: ब्राह्यणों के सन्दर्भ में बसपा को विरल क्षेत्र व समाज को सघन क्षेत्र के रूप में देखा जा सकता है. यदि ब्राह्यणों या सवर्णों को समाज (सघन क्षेत्र) से बसपा (विरल क्षेत्र) की ओर गतिमान करना है तो सघन क्षेत्र पर दबाव पड़ेगा. मायावती व बसपा ने ब्राह्यण जोड़ों सम्मेलन व ब्राह्यण-दलित भाईचारा बनाओ समितियों के माध्यम से यह दबाव बनाया. इसका प्रभाव यह हुआ कि 2002 व 2007 के विधानसभा चुनावों के मध्य बसपा

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11 प्रतिशत और ज्यादा ब्राह्यणों को अपनी ओर आकर्षित कर सकी. इतना ही नहीं वरन 7 प्रतिशत ज्यादा ठाकुर, 11 प्रतिशत ज्यादा वैश्य और 11 प्रतिशत ज्यादा अन्य वर्ग भी बसपा की और इस दौरान आकृष्ट हुए. कुल मिलाकर, 2002 से 2007 के मध्य बसपा अपने प्रयास में 40 प्रतिशत और अधिक सवर्णों को अपनी ओर आकर्षित कर सकी (चित्र 8 : सीएसडीएस, दिल्ली के आंकड़ों पर आधारित). इस प्रकार, प्रतिलोम सामाजिक परासरण का चतुरता से प्रयोग करके बसपा ने बहिर्वेशी से समावेशी राजनीति की ओर कदम बढ़ाया.

बसपा का सैण्डविच-गठबन्धन

प्रतिलोम सामाजिक परासरण से बसपा ने ब्राह्यणों (सवर्णों) और दलितों को जोड़ने का प्रयास किया. पर यह सामाजिक संरचना के शीर्ष व आधार बिन्दुओं को जोड़ने की कोशिश थी. लेकिन क्या समाज के मध्य भाग की उपेक्षा की जा सकती थी ? क्या ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ व मुसलमानों की उपेक्षा की जा सकती है? संभवत: बसपा ने इन प्रश्नों के महत्व को प्रारम्भ से ही समझा था जब कांशीराम ने बामसेफ (1978) की स्थापना की थी और उसमें दलितों, पिछड़ों व मुसलमानों तीनों को ही सम्मिलित किया था. मायावती के नेतृत्व में बसपा ने कांशीराम के उस सपने को साकार करने के लिये ‘सैण्डविच गठबन्धन’ का सहारा लिया.

‘सैण्डविच-गठबन्धन’ वह सामाजिक गठबन्धन है जिसमें समाज के न केवल शीर्ष व आधार बिन्दु पर स्थित जातियां साथ आ जाते हैं वरन् उन दोनों के मध्य स्थित अन्य अनेक सामाजिक घटक भी साथ हो लेते हैं. सैण्डविच में, जैसा कि हम जानते हैं, कोई टॉप या बॉटम, ऊपरी या निचला हिस्सा नहीं होता;  सैण्डविच को एक तरफ से रखने पर एक सिरा ऊपर हो जाता है, उलट कर रखने पर दूसरा सिरा ऊपर हो जाता है. अत: यदि मायावती के सैण्डविच गठबन्धन को राजनीतिक दृष्टि से देखें तो दलित शीर्ष पर, और सामाजिक दृष्टि से देखें तो ब्राह्यण (सवर्ण) शीर्ष पर दिखाई देते हैं. और सैण्डविच गठबन्धन में भी शीर्ष व आधार के बीच मध्य जातियां – अन्य पिछ़ा वर्ग व मुसलमान – भरे हैं. इस प्रकार, सैण्डविच गठबन्धन समाज के उच्च (सवर्ण), मध्य (पिछड़े) व निम्न (दलित) – सभी जातियों का एक साझा गठबन्धन है.

ऐसा ही एक साझा सामाजिक गठबन्धन कभी कांग्रेस ने बनाया था जिसमें समाज के सभी वर्गों और जातियों के लोग हुआ करते थे, और जिसे ‘इन्द्रधनुषीय गठबन्धन’ के नाम से जाना जाता था. पर ‘सैण्डविच गठबन्धन’ और ‘इन्द्रधनुषीय गठबन्धन’ में गुणात्मक अन्तर है. इन्द्रधनुषीय गठबन्धन में यद्यपि कांग्रेस सभी सामाजिक घटकों का प्रतिनिधित्व करने का दावा करती थी, परन्तु नेतृत्व संरचना में मुख्यत: सवर्णों का ही आधिपत्य था. लेकिन सैण्डविच गठबन्धन  में समाज के सभी घटकों का नेतृत्व संरचना में प्रभावी प्रतिनिधित्व दिया गया है यद्यपि मूल राजनीतिक नेतृत्व ‘दलित’ (मायावती) के हाथ में है. द्वितीय, ‘इन्द्रधनुषीय गठबन्धन’ राष्ट्रीय आन्दोलन में साझा भूमिका के कारण समाज में सभी जातियों और वर्गों के आन्तरिक जुड़ाव पर आधारित था, और उसका एक साझा पर संश्लिष्ट (सिन्थेटिक) व्यक्तित्व था, पर सैण्डविच गठबन्धन में एक कमनीयता है; गठबन्धन के दोनों सिरे सामाजिक व राजनीतिक, ब्राह्यण व दलित, एक दूसरे से दूर हैं, तथा आसानी से अलग-अलग भी हो सकते हैं. इसीलिये, इस सैण्डविच गठबन्धन में किसी स्थायित्व का भाव संश्लिष्ट (सिन्थेटिक) तत्व का अस्तित्व नहीं. स्पष्ट है कि सैण्डविच – गठबन्धन को बनाये रखना एक कठिन कार्य है.

बसपा के  सैण्डविच गठबन्धन पर आधारित सोशल इंजीनियरिंग के दो आयाम है : बाह्य एवम् आन्तरिक.

सोशल इंजीनियरिंग का बाह्य आयाम

सोशल इंजीनियरिंग के बाह्य आयाम के दो प्रमुख घटक हैं : प्रथम, शीर्ष सोशल इंजीनियरिंग, व द्वितीय, आधार सोशल इंजीनियरिंग (चित्र 9-12). शीर्ष सोशल इंजीनियरिंग के माध्यम से समाज के शीर्ष पर स्थापित ब्राह्यणों (सवर्णों) को बसपा नेत्री मायावती से जोड़ने का प्रयास किया गया. इसके लिये पार्टी में ब्राह्यण नेता सतीश चन्द्र मिश्रा ने प्रत्येक जिले व प्रमुख शहरों में ब्राह्यण जोड़ों सम्मेलन आयोजित किये जिसकी चरम परिणत लखनऊ में ‘ब्राह्यण जोड़ो महासम्मेलन’ के रूप में हुई.

इसमें बसपा ने ब्राह्यणों को यह बताने का प्रयास किया कि यदि 21 प्रतिशत दलित व 8.5 प्रतिशत (लगभग) ब्राह्यण मिल जायें तो वे चुनावों में एक मजबूत ताकत के रूप में उभर सकते हैं. (वर्मा : 2007 अ) इसके लिये मायावती ने अपने उद्बोधन में ब्राह्यणों को आश्वस्त भी किया कि ब्राह्यणों को उनके पैर छूने की आवश्यकता नहीं. इसने ब्राह्यण समाज का बसपा में विश्वास बढ़ा.

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इसके विपरीत आधार सोशल इंजीनियरिंग के अन्तर्गत ब्राह्यणों को दलित बस्तियों में ले जाया गया. इसके लिये ब्राह्यण-दलति भाईचारा समितियां बनाई गई. इन समितियों का गठन रोचक था. इसका अध्यक्ष ब्राह्यण, सचिव दलित व शेष सभी सदस्य ब्राह्यण हुआ करते थे अर्थात् सचिव के अतिरिक्त सभी ब्राह्यण. यह समिति जब मलिन बस्तियों में जाती तो दलित बस्ती के लिये एक सुखद आश्चर्य होता, व पूरा वातावरण उत्साह से भर जाता था. इतने ब्राह्यणों का दलितों के साथ मेल-मिलाप, चाय-पानी व उठना-बैठना एक ऐतिहासिक क्षण होता था. इससे ब्राह्यणों व दलितों के बीच जो मनोवैज्ञानिक दूरी थी, वह कम हो जाती और दोनों ही एक दूसरे के कुछ और निटक आ जाते. वास्तव में ब्राह्यणों व दलितों के मध्य कटुता तो जरूर रही है, पर इन दोनों के आर्थिक हित अलग-अलग है, अत: कम टकराते हैं. इसके विपरीत दलितों व अन्य पिछड़ा वर्ग के आर्थिक हित जरूर टकराते हैं : अन्य पिछड़ा वर्ग के ज्यादातर लोग भूस्वामी व किसान है जो दलितों को अपने खेतों पर काम करने के लिये उत्पीड़न करते और प्राय: मजदूरी भी पूरी नहीं देते. इसी आर्थिक संघर्ष के चलते उत्तर प्रदेश व अन्य क्षेत्रों में दलितों और पिछड़ों का कोई साझा राजनीतिक मंच न बन सका. कुछ ब्राह्यण जरूर बड़े जमींदार हैं, पर ज्यादातर ब्राह्यणों का पेशा पंडिताई का है जिसमें दलितों से संघर्ष की कोई संभावना नहीं. अत: जब ब्राह्यणों का दलित बस्तियों में आना-जाना, उठना-बैठना, खाना-पीना होने लगा तो मनोवैज्ञानिक कटुता कम होने लगी और दोनों का राजनीतिक मंच पर साथ-साथ आना संभव हो सका.

इस शीर्ष सोशल इंजीनियरिंग व आधार सोशल इंजीनियरिंग के द्वारा ब्राह्यण समाज एक ओर राजनीतिक शीर्ष पर दलितों की नेत्री मायावती से जुड़ गया, तो दूसरी ओर सामाजिक संरचना के निम्नतम स्तर पर स्थित दलित समाज से भी जुड़ गया. यह जुड़ाव कोई सामान्य घटना नहीं कही जा सकती; इसने सदियों से सामाजिक संरचना के शीर्ष व आधार बिन्दुओं के मध्य चले आ रहे अन्तराल को कम किया, संवाद को बढ़ाया व एक अत्यन्त नई ‘सोशल केमेस्ट्री’ को जन्म दिया जिसने उत्तर प्रदेश में समावेशी लोकतान्त्रिक राजनीति को एक नया आयाम दिया.

सोशल इंजीनियरिंग का आन्तरिक आयाम

बसपा की सोशल इंजीनियरिंग के आन्तरिक आयाम के भी दो घटक हैं; प्रथम, ऊर्ध्व सामाजिक गठबन्धन; द्वितीय, क्षैतिज सामाजिक गठबन्धन. ऊर्ध्व सामाजिक गठबन्धन उस प्रक्रिया का परिणाम है जिसके द्वारा किसी निर्वाचन क्षेत्र में सामाजिक पदसोपानीय संरचना के विभिन्न पदों पर स्थापित विभिन्न जाति समूह परस्पर सम्बद्ध होकर एक ऊर्ध्व लम्ब का आकार ग्रहण कर लेते हैं. (देखें चित्र 13, 14, 15, 16).

चित्र 13 में उत्तर प्रदेश में सामाजिक पद सोपान की संरचना तथा विभिन्न पदसोपानों पर आसीन जातियों का प्रतिशत दिखाया गया है. इसमें दलितों व मुस्लिमों का प्रतिशत जनगणना आयोग (2001), ओबीसी का प्रतिशत मण्डल आयोग से, पर उच्च वर्ग (ब्राह्यण, ठाकुर, वैश्य, कायस्थ) का प्रतिशत गैर-सरकारी सूत्रों से लिया गया है. 1931 के बाद की जनगणनाओं में अनुसूचित जाति व जनजाति के अतिरिक्त अन्य जातियों की गिनती बन्द कर दी गई.

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ऊर्ध्व सामाजिक गठबंधन के अनुसार, यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में सभी जातियां परस्पर जुड़ जाएं तो वे उस निर्वाचन क्षेत्र में विजय के लिये वांछित वज़न पैदा करती हैं और जिस भी दल के प्रति वे मतदान करती हैं उसक विजय सुनिश्चित कर देती हैं. समाज के विभिन्न पद सोपानों पर स्थित जातियों द्वारा ऊर्ध्व लम्ब का आकार ग्रहण करने में हम ‘सामाजिक-परासरण’ की भूमिका देखते हैं. इसके अन्तर्गत किसी निर्वाचन क्षेत्र में एक जाति समूह का संगठित आकार सामाजिक परासरण के कारण बढ़ने लगता है; प्रत्येक जाति समूह में यह प्रवृत्ति देखी जाती है (चित्र 15). इससे जातियों का संगठित स्वरूप स्पष्ट और आकार वृहद् होने लगता है (चित्र 16) परिणामस्वरूप, इन जाति संगठनों की सामाजिक हैसियत बढ़ जाती है जिससे वे एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं. यदि ऐसे संगठित जाति समूहों को परस्पर सम्बद्ध किया जा सके तो एक ऊर्ध्व लम्ब  के आकार की सामाजिक संरचना का निर्माण हो जाता है जो किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में विजय हेतु वांछित वजन प्राप्त कर लेती है. अत: ऊर्ध्व सामाजिक गठबन्धन किसी निर्वाचन क्षेत्र में विजय के लिये नितान्त आवश्यक कारक है.

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‘क्षैतिज-सामाजिक-गठबंधन’  को चित्र 17-18 के द्वारा दर्शाया गया है. इस प्रक्रिया में एक निर्वाचन क्षेत्र का संगठित जाति समूह पड़ोसी निर्वाचन क्षेत्र के अपने सजातीय समूह के प्रति आकर्षण होता है. आकर्षण का कारण भी सामाजिक परासरण के कारण जातियों का बढ़ता संगठित आकार और प्रभाव है. इस प्रक्रिया में एक जाति समूह पड़ोसी निर्वाचन क्षेत्र के सजातीय संगठित समूह से मेल-मिलाप, संचार व संवाद बढ़ाता है.

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इससे किसी जाति समूह का विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में पारस्परिक जुड़ाव बढ़ता है और जिस दल को भी उस जाति समूह का समर्थन मिल जाता है, उसके द्वारा प्राप्त मतों के प्रतिशत में उस जाति के द्वारा दिये गये मतों का प्रतिशत  बढ़ जाता है. परन्तु क्षैतिज सामाजिक गठबन्धन के अन्तर्गत मतों में वृद्धि के बाद भी निर्वाचन में विजय हेतु वांछित वजन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता. अत:, क्षैतिज सामाजिक गठबन्धन जनाधार में वृद्धि के बावजूद निर्वाचन में विजय की कोई गारण्टी नहीं देता. पर यदि कोई दल क्षैतिज सामाजिक गठबन्धन के साथ-साथ ऊर्ध्व सामाजिक गठबन्धन भी बना ले तो उसके पक्ष में आने वाला चुनाव परिणाम बड़ा चौंकाने वाला  हो सकता है. बसपा ने यही करिश्मा 2007 के विधान सभा चुनावों में किया. उसने क्षैतिज व ऊर्ध्व सामाजिक गठबन्धनों की एक ऐसी जटिल संरचना तैयार कर डाली जिसने उत्तर प्रदेश में खण्डित जनादेश, त्रिशंकु विधानसभा व गठबन्धन सरकार की अपरिहार्यता का मिथक तोड़ डाला (चित्र 19). यही कारण है कि मात्र 30 प्रतिशत वोट प्राप्त कर बसपा पूर्ण बहुमत प्राप्त कर सकी, और सपा बिना कोई वोट खोए 46 सीटें हार गई. इसे सारणी 2 व 3 के आधार पर समझा जा सकता है –

सारणी 2 को देखें. आप को पता चलेगा कि सपा समाज के सभी वर्गों में अपना जनाधार न बढ़ा पाई. प्रथम छ: जातियों (ब्राह्यण, ठाकुर, अन्य उच्च जातियां, जाट, यादव व कुर्मी) में तो उसका जनाधार बढ़ा, पर अन्य पांच प्रमुख जातियों (वैश्य, लोध, अति पिछड़ा वर्ग, अन्य अनुसूचित जातियां व मुस्लिम) में उसके जनाधार में गिरावट आई. स्पष्ट है कि सपा द्वारा ‘ऊर्ध्व सामाजिक गठबन्धन’ न बनाया जा सका जिससे उस विजय के लिये वांछित वजन प्राप्त न हो सका. परन्तु सपा को प्रदेश के 38/70 जिलों में अपना जनाधार बढ़ाने में सफलता मिली जो उसकी क्षैतिज सामाजिक गठबन्धन की आंशिक सफलता दर्शाता है. इससे उसे 2002 के मुकाबले अपना जनाधार बनाये रखने में सफलता मिली, पर वह अपनी सीटें न बचा सकी.

सारणी 2 : सपा का जातीय जनाधार (2007)

जाति कुल प्राप्त मत% लाभ/हानि
 

ब्राह्मण

10 +7
ठाकुर 21 +12
अन्य उच्च जाति 17 +3
जाट 11 +6
यादव 73 +1
कुर्मी 21 +12
वैश्य 12 -5
लोध 11 -11
अतिपिछड़ा वर्ग 20 -2
अन्य अनु. जाति 13 -2
मुस्लिम 47 -7

अब सारणी 3 को देखें. इसके अनुसार, बसपा ने समाज की सभी जातियों में अपने जनाधार में वृद्धि की और एक सशक्त ‘ऊर्ध्व सामाजिक गठबन्धन’ बनाया जिसने उसे कम मतों के बावजूद निर्वाचन क्षेत्रों में विजय हेतु वांछित वजन दिया. इतना ही नहीं, बसपा ने क्षैतिज सामाजिक गठबन्धन में भी सफलता प्राप्त की जो इस बात से प्रमाणित होती है कि पार्टी का जनाधार 66/70 जिलों में बढ़ा; केवल बांदा, झांसी, कुशीनगर व बागपत में उसके जनाधार में क्रमश: 0.9, 0.8, 0.5 व 0.4 प्रतिशत की मामूली गिरावट आई. अत: स्पष्ट है कि बसपा की सोशल इंजीनियरिंग के द्वारा ऊर्ध्व एवम् क्षैतिज सामाजिक गठबन्धन की वह जटिल संरचना बन सकी जिससे उसे ऐतिहासिक चुनावी सफलता प्राप्त हुई.

बसपा का जातीय जनाधार (2007)

जाति कुल प्राप्त मत% लाभ/हानि
ब्राह्मण 17 +11
ठाकुर 12 +7
वैश्य 14 +11
अन्य उच्च जाति 16 +11
जाट 13 +13
यादव 7 +2
कुर्मी 16 +6
लोध 19 +7
अतिपिछड़ा वर्ग 34 +15
जाटव 85 +6
मुस्लिम 17 +7

पर सोशल इंजीनियरिंग एक अनवरत चलने वाली प्रक्रिया है. इससे सामाजिक संरचना में कोई स्थायी परिवर्तन आ गया है- ऐसा मानना बसपा की भारी भूल होगी. अभी तो उसने इसकी केवल शुरूआत की है. हम सोशल इंजीनियरिंग के मॉडल को अभी उत्तर प्रदेश में और दृढ़ करने की आवश्यकता है क्योंकि इससे बना ‘सैण्डविच सामजिक गठबन्धन’ अत्यन्त कमनीय व कमजोर है और किसी भी राजनीतिक झंझावात को नहीं सह सकेगा. पर बसपा के राष्ट्रीय नेतृत्व की महत्वाकांक्षाओं के चलते उत्तर प्रदेश में इस दृढ़ करने के प्रयासों में कमी आई है. यही कारण है कि पार्टी को 2012 के विधानसभा चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा. बसपा एक राष्ट्रीय पार्टी है और उसे अपने ‘सोशल इंजीनियरिंग के यूपी मॉडल’ को प्रदेश में दृढ़ करने तथा अन्य राज्यों में भी ले जाने और उसे लागू करने का अधिकार है, पर उत्तर प्रदेश में यदि 2009 में लोकसभा चुनावों में विगत विधानसभा चुनावों के परिणाणों की पुनरावृत्ति हो जाती तो बसपा की सोशल इंजीनियरिंग को सामाजिक वैधता मिल जाती और समावेशी राजनीति का उसका लोकतान्त्रिक मॉडल एक प्रतिमान बन सकता.

‘प्रतिलोम सामाजिक परासरण’ भारतीय लोकतन्त्र में समावेशी राजनीति के एक नूतन मॉडल के रूप में देखा जा सकता है. और यह न केवल भारत के अन्य राज्यों वरन् दक्षिण एशिया और अफ्रीका के बहुसांस्कृतिक समाजों में भी लोकतान्त्रिक व समावेशी राजनीति के प्रतिमान के रूप में प्रयोग किया जा सकता है. संभवत: अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, रूस आदि पश्चिम देशों में बढ़ती जातीयता की समस्या के चलते वहां भी प्रतिलोम सामाजिक परासरण को आधार बना कर समावेशी लोकतान्त्रिक राजनीति की जा सकती है.

प्रस्तुत लेख साउथ एशिया इनिशिएटेवि, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, कैम्ब्रिज, अमेरिका में ‘राइज़ ऑफ मायावती एण्ड चेन्जिंग पॉलिटिक्स ऑफ उत्तर प्रदेश’ पर 25 अप्रैल, 2008 को लेखक द्वारा दिये गये व्याख्यान पर आधारित है.

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