आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन में आधुनिकता

सशीज हेगड़े : प्रस्तुत लेख में आधुनिक भारत में बौद्धिक एवं वैचारिक इतिहास में ‘आधुनिकता’ को निर्धारित करने क प्रयास किया गया है. ऐसा करने में मैंने 19वीं तथा 20वीं सदी के प्रारम्भ में दिये गये विचारों को आधार बनाया. लेकिन इसके लिये इस अवधि की सभी रचनाओं को सिलसिलेवार न पढ़कर उन भावों, बिम्बों और प्रवृत्तियों को पिरोने की कोशिश की गई है जो परस्पर संबद्ध हैं. इससे संभवत: हमें अपनी संस्कृति और राजनीति की अवधारणाओं को परिष्कृत करने का अवसर मिलेगा. इसके लिये भारतीय संस्कृति और राजनीतिक व्यवहार की समस्याओं और प्रवृत्तियों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करना पड़ेगा. चूंकि ज्यादातर विद्वान एक से ज्यादा समस्या या प्रवृत्ति को तरजीह नहीं देते, इसलिये आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन के एक से ज्यादा प्रकार होने की मान्यता का नितान्त अभाव है.

हमारे ‘आधुनिकता’ का फ्रेमवर्क दो कारणों से विवादित रहा है. एक, आधुनिकता की अवधारणा का जटिल और विवादास्पद इतिहास है, दो, विभिन्न सन्दर्भों और मान्यताओं के आधार पर ‘आधुनिकता’ को परिभाषित करने की कोशिश की जाती रही है. आधुनिकता की कभी स्पष्ट समझ नहीं रही क्योंकि यह कोई एकल नहीं वरन विभिन्नताओं के संश्लेषण पर आधारित अवधारणा है. यदी अट्ठारहवीं शताब्दी से बीसवीं शताब्दी के मध्य तक के समय को आधुनिक – काल जीवन की सामाजिक परिस्थितियों को ‘आधुनिकता’ की संज्ञा दी जा सकती हैं, तथा उसके सांस्कृतिक घटक को ‘आधुनिकता’ कहा जा सकता है. बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में पेरिस को हम ‘आधुनिक’ और ‘आधुनिकता’ का केंद्र कह सकते हैं, पर बीसवीं शताब्दी के अन्त में ‘धर्म और राजनीति में कट्टरवाद’ तथा ‘दर्शन और कला में उत्तर – आधुनिकता’ के अभ्युदय ने उनकी उपलब्धियों को चुनौती देना शुरू कर दिया. इसके कारण आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन में ‘आधुनिक’ के निर्धारण का काम और कठिन हो गया है.

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‘आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन’ को संभवत:  चार बार पुनर्परिभाषित करने का प्रयास किया गया है. प्रथम, जब उन्नीसवीं शताब्दी में आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन ने पुनर्जागरण का आलिंगन किया, तथा राजा राममोहन राय, ज्योतिराव फुले एवं ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जैसे सुधारकों ने विवेक के आधार पर कुरीतियों एवं परम्पराओं के प्रभाव से संघर्ष का सिंघनाद किया. इस बिन्दु पर भारतीय राजनीतिक चिन्तन में बौद्धिकता, विज्ञान, समानता और मानव अधिकार जैसी अवधारणाओं का वर्चस्व हो गया, अवधारणायें जो यूरोपीय पुनर्जागरण से जन्मी थी. इसके लिये साम्राज्यवादी राज्यों द्वारा कानून बना कर हस्तक्षेप किया गया. द्वितीय बिन्दु उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में आया जब राष्ट्रवाद पर विमर्श और राजनीति का प्रादुर्भाव हुआ. इसने ‘आधुनिकता’ के लिये साम्राज्यवादी राज्य के विधिक सुधारवादी हस्तक्षेप पर इस आधार पर आपत्ति की कि इससे किसी ‘राष्ट्र’ की अपनी सामाजिक समस्याओं के (विशेषत:  सांस्कृतिक क्षेत्र में) समाधान करने की क्षमता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा होता है. टैगोर ने 1916 में टोक्यो में अपने सार्वजनिक भाषण में कहा था – ‘मन की स्वतन्त्रता, न कि समरूप चिन्तन की दासता ही सच्ची आधुनिकता है. यह किसी यूरोपीय स्कूल मास्टर के निर्देशन में न होकर स्वतन्त्र रूप से कार्य व चिन्तन की स्थिति है. आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन का तृतीय पड़ाव तब दिखाई देता है जब राष्ट्रवाद पर विमर्श और राजनीति के परिप्रेक्ष्य में आधुनिकता को परिभाषित करने की कोशिश की गई. इस बिन्दु पर विचारणीय है कि क्या ’भारतीय-आधुनिक’ स्वंय अपने कुछ ‘मानक’ स्थापित कर सकता है ? पर यह नहीं भूलना चाहिये कि राष्ट्रीयता के आधार पर ‘आधुनिक’ को परिभाषित करने में अनेक जटिलतायें हैं. संभवत: ‘अपूर्ण-आधुनिकता’ उसमें एक बड़ा अवरोध है. चौथे पड़ाव में ‘आधुनिक’ की सभी किस्में समाहित हैं. इस प्रकार, आज भारत में ‘आधुनिक’ कोई एक समरूप विचार नहीं है, वरन् विविधताओं का एक पुंज है. इस कारण इसे किसी सिद्धान्त से जोड़ना कठिन है. फिर भी आवश्यकता इस बात की है कि पाश्चात्य अवधारणा और भारतीय राष्ट्रवाद के मध्य सन्तुलन स्थापित करते हुये ‘आधुनिक’ भारतीय राजनीतिक चिन्तन को परिभाषित किया जाय.

स्पष्ट है कि आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन को किसी बौद्धिक राजनीतिक सिद्धान्त से नहीं जोड़ा जा सकता, और वस्तुत: ऐसा करने का प्रयास भी नहीं करना चाहिये. फिर भी यह नहीं भूलना चाहिये कि उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के काल में आधुनिक भारत ने पाश्चात्य पुनर्जागरण से उत्पन्न राजनीतिक सिद्धान्तों का आलिंगन किया. इससे ‘आधुनिक’ के निर्धारण में बौद्धिक इतिहासकारों, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं तथा समाजिक-राजनीतिक सिद्धान्तकारों के विचार या निष्कर्ष एकांगी था संकीर्ण नहीं हो सकते. लेकिन ये सभी विचार या निष्कर्ष प्रतिक्रियावादी-राजनीति के सामने बौने हो जाते हैं. अत: हमें उन विचारों या निष्कर्षों तथा उनके वर्गीकरण पर कुछ सीमा रेखा खींचनी होगी. आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन पर जो राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय अस्मिता की मुहर देखना चाहते हैं, ऐसे दो थीसिसों का उल्लेख जरूरी है. एक को ‘तत्वमूलक’ तथा दूसरे को ‘प्रक्रिया मूलक’ थीसिस कहा जा सकता है. वे लोग जो भारत में आधुनिक के द्वितीय, तृतीय व चतुर्थ पड़ावों को स्वीकार करने की स्थिति में हो उन्हें इन थीसिसों में न केवल राष्ट्रवाद की विशिष्टताओं का आभास होगा, वरन् भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के आन्तरिक तत्व का भी भास होगा.

प्रथम ‘थीसिस’ के अनुसार, ‘राष्ट्रवादी’ पुनर्जागरण एवं उसकी प्रतिक्रिया के दौरान किसी ऐसे विचार के सामान्यीकरण की कोशिश करते हैं जिसने विश्व और उसकी घटनाओं को दिशा दी. इसके अनुसार राष्ट्रों को भी कुछ वैसा ही आचरण करना चाहिये जैसा आधुनिकता के अन्तर्गत वैयक्तिक स्वतन्त्रता प्राप्त लोग करते हैं- अर्थात उन्हें न केवल आत्म-निर्णय, वरन् ‘प्रमाणिक राष्ट्रवाद’ के अनुरूप आत्मपूर्णत्व को भी प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिये. राष्ट्रवाद की अनेक धाराओं ने इसका समर्थन किया है. भारतीय राष्ट्रवाद की उदारवादी, हिन्दू, सांस्कृतिक-राष्ट्रवादी, परम्परावादी, मार्क्सवादी तथा दलित आदि धाराएं ऐसे किसी ‘थीसिस’ का समर्थन करती हैं. पर वे सभी स्वतन्त्रता की किसी विशिष्ट व्याख्या से सम्बद्ध भी हैं. इस प्रकार, स्वतन्त्रता का आधुनिक विमर्श आत्मनिर्णयन के माध्यम से आत्मपूर्णत्व तक पहुंचाता है जिससे अन्तत: हम एक ‘प्रमाणित राष्ट्रवाद’ की अवधारणा तक पहुंचते हैं.

द्वितीय थीसिस हमें उस ‘प्रमाणित राष्ट्रवाद’ के आधार तक ले जाती है. इस सम्बन्ध में चार्ल्स टेलर ने अफने लेख ‘नेशनलिज्म एण्ड माडर्निटी’ (सम्पादित जान ए, हल, द स्टेट आफ द नेशन : अर्नेस्ट गेलनर एण्ड द थियरी ऑफ नेशनलिज्म, केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस 1998) में राष्ट्रवाद के सन्दर्भ और स्रोत में फर्क किया. उसके अनुसार आधुनिक राजनीतिक जीवन का एक ‘राष्ट्रवादी आयाम’ है जिसमें राष्ट्रनिर्माण की प्रक्रिया से सामान्यत: बहुसंख्यक-संस्कृति के लोगों का ही हित होता है. यह राष्ट्रीय आन्दोलनों के अभ्युदय को स्पष्ट करता है. वे राष्ट्रनिर्माण के आधुनिकीकरण प्रोजेक्ट के स्वाभाविक परिणाम नहीं, वरन् स्वयं राष्ट्रनिर्माण का एक स्वरूप है. लेकिन इससे राष्ट्रवाद को पूरी तरह स्पष्ट नहीं किया जा सकता क्योंकि हमें अभी भी ज्ञात नहीं कि क्यों कुछ लोग संघर्ष कर राष्ट्रीय आन्दोलनों में हिस्सा लेते हैं, और क्यों कुछ लोग नहीं ? इसका उत्तर देने के लिये हमें ‘राष्ट्रवाद के स्रोत’ सम्बन्धी सिद्धान्त को खोजना होगा – ठीक जैसे ही जैसे हम ‘आत्मसम्मान’ और ‘अस्मिता’ के प्रश्नों के लिये सिद्धान्त खोजते हैं. लेकिन इन बातों का प्रथम थीसिस से क्या सम्बन्ध ? पर एक ढंग से देखा जाये तो सम्बन्ध है – ‘अस्मिता की मांग’ और ‘आत्मसम्मान की दलील’ आत्मपूर्णत्व की प्रमाणिकता हेतु प्रयोग की जाती है. पर राष्ट्रवाद के स्रोत पर टेलर और हमारे प्रश्नों में काफी फर्क है. इसके अलावा हमें उदारवादी और अनुदारवादी राष्ट्रवाद को भी अलग करना पड़ेगा और देखना पड़ेगा कि क्यों कुछ राष्ट्रीयतायें उदारवादी तो कुछ अनुदारवादी हो जाती हैं. दुर्भाग्य से आत्मसम्मान और अस्मिता को ‘प्रमाणित-राष्ट्रवाद’ के मानक मानने से हमारी समस्या हल नहीं होती क्योंकि बहुसंख्यक और शक्तिशाली तथा अल्पसंख्यक और कमजोर दोनों ही प्रकार के राष्ट्रवादी समूह प्रमाणित-राष्ट्रवाद के अनुदारवादी स्वरूप की वकालत करते देखे जाते हैं.

राष्ट्रवादी भावनाओं के निर्माण की प्रक्रिया में ‘प्रमाणिकता’ का बड़ा महत्व है, किसी भी ‘स्थिति’ और किसी भी ‘मानक’ को तभी मान्यता मिलेगी जब उसे लोगों की स्वीकृति मिले. प्रमाणित राष्ट्रवाद का अर्थ है कि राष्ट्रवाद की सैद्धान्तिक एवं व्यवहारवादी मान्यतायें सांस्कृतिक आधार पर संगठित लोगों की इच्छाओं के अनुरूप हैं. पर समस्या यह है कि यह परस्पर भिन्नताओं वाले समाज में कैसे लागू हों, यह अम्बेडकर, सावरकर, हिंदूराष्ट्रवादियों, गांधी व नेहरू सभी के लिये भिन्न-भिन्न हो सकती है.

प्रमाणित – राष्ट्रवाद का आज व्यवहारवादी आयाम हो गया है, और अनेक सांस्कृतिक प्रवृत्तियों और सामाजिक प्रक्रियाओं के कारण यह राष्ट्र निर्माण कार्यक्रम से आगे निकल कर नैतिक परिवेश के निर्माता का स्वरूप ग्रहण कर चुका है पर इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण संस्कृति निर्माण की प्रक्रिया है जो हमारा ध्यान वर्तमान राजनीतिक शिक्षा और राष्ट्रीय संस्कृति की ओर आकृष्ट करती है. ‘प्रमाणित-राष्ट्रवाद’ की प्रवृत्तियां प्राय: किसी नुकसान जिसमें किसी की मृत्यु का भाव हो, जिसके लिये लोगों का एक समुदाय जिम्मेदार हो, तथा जिनकी अनुपस्थिति असहनीय हो रही हो. ये प्रवृत्तियां स्वयं कभी उस नुकसान से एकाकार नहीं होतीं, न ही उसे व्यक्त करती हैं और इस प्रकार, ये राष्ट्रवादी प्रवृत्तियां वर्तमान समाज की बीमारी के ‘लक्षण’ को ही उसका ‘कारण’ मानने की गलती कर बैठती हैं. राष्ट्रवादी वास्तव में इसीलिये एक ‘अदृश्य खाई’ है. चूंकि बहु-सांस्कृतिकता या बहुल-राष्ट्रवादिता के प्रति आदर का भाव नहीं है.

इस परिप्रेक्ष्य में ऐसा लग सकता है कि हम राष्ट्रवाद और आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन के समीकरण को छिन्न-भिन्न कर रहे हैं. पर शायद ऐसा इसलिये लग सकता है क्योंकि भारत में  ‘आधुनिक’ की अवधारणा को देश-काल व परिस्थिति से जोड़ कर देखने पर गहराई से ध्यान नहीं दिया गया है. प्रत्येक काल का एक विशेष ढंग से राष्ट्रवाद की अवधारणा को परिभाषित करने में सशक्त हस्तक्षेप करता है. अत: यह स्पष्ट ही नहीं हो पाता कि कोई राजनीति कब शुरू की जाये और कैसे शुरू की जाये. इस व्याख्या में लोगों की रुचि कम, पर इससे उत्पन्न चुनौतियों में ज्यादा है. यह प्रवृत्ति भारतीय समाज विज्ञानों तथा राजनीतिक सिद्धान्तों के क्षेत्र में देखी जा सकती है. मेरा यह आशय नहीं कि ‘आधुनिक’ को पुनर्परिभाषित करने का कोई ‘पांचवा’ प्रयास इनके द्वारा किया जा रहा है. दीपेश चक्रवर्ती ने अपनी पुस्तक ‘रोमाण्टिक आर्काइव्स: लिटरेचर एण्ड द पालिटिक्स ऑफ आइडेन्टिटी इन बंगाल’ (2004) में संकेत किया है कि (बंगाल के परिप्रेक्ष्य में) राष्ट्रवादी राजनीति मूलत: सामाजिक संरचनाओं- वर्ग, जाति, धार्मिक या धर्मनिरपेक्ष समुदायों- से उद्भूत हुई है. अत: उनका मानना है कि साहित्य व कला की तुलना में समाज विज्ञान की नूतन विधायें इस पर ध्यान देने के सर्वथा उपयुक्त हैं.

इस सम्बन्ध में पाश्चात्य प्रभावों और भारतीय प्रतिक्रियाओं को समझना पड़ेगा. ऐसा लगता है कि ‘आधुनिकता’ की समझ इतनी स्थापित हो चुकी है कि किसी घटना के घटने से पूर्व ही जैसे उसकी व्याख्या कर दी जाती है. ऊपर आधुनिकता के जिन ‘विभिन्न कालों’ का उल्लेख किया गया है वे कहीं परस्पर मिलते भी हैं (जो आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन की आधुनिकता को कहीं जोड़ते हैं), तो कहीं वे असम्बद्ध घटकों के रूप में देखे जाते हैं. इस पर भी विचार करना पड़ेगा कि उन्हें हम भारतीय राष्ट्रवाद की अभिव्यक्तियों के रूप में देखें या आधुनिक भारत में विभिन्नताओं के काल के रूप में.

सुदीप्त कविराज के अनुसार गैर-पाश्चात्य जगत में ‘राजनीतिक आधुनिकता’ को ‘पाश्चात्य सामाजिक सिद्धान्त’ के बिना समझना असंभव है, और उसे केवल उसी चिन्तन परम्परा में समझना और भी असंभव है क्योंकि ‘चिन्तन-प्रक्रिया’ में हम जब पाश्चात्य-साहित्य(पुस्तकें) पढ़ रहे होते हैं तो हमारी दृष्टि अपने इतिहास पर होती है. पर इस पूरी खोज को ऐतिहासिक समाजशास्त्र परिसीमित करता है. नागरिक समाज में राजनीति और इतिहास के विचारों का विश्लेषण करने में कविराज स्वयं गैर-पाश्चात्य जगत पर ध्यान केन्द्रित करते हैं पर हमें उस ‘समझ’ पर ध्यान देने होगा जिसने औपनिवेशिक परिवेश में बौद्धिक व राजनीतिक परम्पराओं को आकार दिया. इस ‘समझ’ का एक आन्तरिक तथा एक बाह्य आयाम है जिसे राष्ट्रवादी स्वदेशी या विदेशी कह कर व्यक्त करते हैं. यह समझ कैसे बनती है – इसकी प्रक्रिया व गत्यात्मकता क्या है- इस पर प्रश्न है, तथा इसके लिये हमें उन आधुनिक भारतीय रचनाओं पर ध्यान देना होगा जो आधुनिक भारतीय इतिहास से संदर्भ लेती हैं. उन रचनाओं तथा उनमें अन्तर्निहित गत्यात्मक सिद्धान्तों को तो हम अपनी समझ और संस्कृति के अनुरूप ग्रहण करते हैं, पर उन गत्यात्मक सिद्धान्तों का समाज में क्या स्वरूप है – यह स्पष्ट नहीं.

मेरी मान्यता यह है कि औपनिवेशिक काल में न केवल हमारी संवेदनाएं बदल गईं वरन् उससे भी ज्यादा कुछ गम्भीर बदल गया. सांस्कृतिक गिरावट के इस काल में न केवल ज्ञान, व्यवहार व हक के पदसोपान के बारे में बातचीत का तरीका बदल गया, वरन जैसाकि होमी जे. भाभा ने कहा – हम वर्णसंकर हो गये, द्विभाषी विद्वानों की जमात इसका प्रमाण है. पर समस्या यह बनी रही कि ये द्विभाषिये उन मूल रचनाओं तक नहीं पहुंच सके और उनकी वास्तविकताओं को अपने लेखों में व्यक्त नहीं कर सके जिसे वे करने का दम भरते थे. ज्योतिरावफुले के राजनीतिक विचारों के सम्बन्ध में हम इसे समझ सकते हैं. यद्यपि आज उन्हें औपनिवेशिक काल के विद्वानों की संज्ञा दी जाती है, लेकिन उनकी रचनायें किसी राष्ट्रवादिता की स्थापना से प्रेरित न थीं, वरन वे तो उन ऐतिहासिक अन्याय व उत्पीड़न के विरुद्ध शंखनाद कर रही थीं जो सदियों से भारत में चली आ रही थीं. यह आन्तरिक राष्ट्रवादी तत्व को व्यक्त करती हैं.

बाह्य राष्ट्रवादी तत्व को व्यक्त करने के लिये अम्बेडकर के ‘बुद्ध’ पर विचारों को ले सकते हैं. अम्बेडकर ने बुद्ध के विचारों से आदर्शों को ग्रहण किया जो बाद में भारत में स्वतंत्रता, समानता और बन्धुत्व जैसे आधुनिक आन्दोलनों की आधारशिला बने. अम्बेडकर के लिये बौद्ध धर्म हिन्दू धर्म से अलग था क्योंकि वर ईश्वर, ईश्वर- पूजा और आत्मा की अवधारणा को नहीं मानता. बुद्ध जीवन में ही निर्वाण चाहते थे, मृत्यु के बाद नहीं. अम्बेडकर के अनुसार, बुद्ध के धर्म में नैतिकता को ईश्वर की मान्यता दी गई है. इस प्रकार, अम्बेडकर में हमें एक गैर-धार्मिक धर्म की अवधारणा दिखाई देती है.

अम्बेडकर वास्तव में समाज के दलित वर्ग के लिये राजनीतिक अवसरों के अभाव की परिपूर्ति करने का ही प्रयास नहीं कर रहे, वरन् पूरे ’सांस्कृतिक मुहावरे’ को ही बदलना चाहते हैं. पर अम्बेडकर की पुस्तक ‘द बुद्धा एण्ड हिज़ धम्म्’ की भाषा एवम् भाव की उपेक्षा की जाती है. चार्ल्स टेलर ने सांस्कृतिक व असांस्कृतिक सिद्धान्तों की चर्चा की है, असांस्कृतिक सिद्धान्त उन सार्वभौमिक घटनाओं या प्राप्तियों की मीमांसा करते हैं जो सांस्कृतिकता से स्वायत्त होती हैं. अम्बेडकर द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्त इसी श्रेणी में आता है.

गांधी हमारे तीसरे उदाहरण हैं जिनकी रचनाओं में राजनीतिक के स्थान पर नैतिकता की प्रधानता दिखाई देती है. उनका जीवन स्वयं ही एक ऐसी रचना है जो व्यक्ति का स्वयं से, दूसरों से व देवी-देवताओं से सम्बन्धों को रेखांकित करता है. भारतीय राष्ट्रीयता के केन्द्र में होने के बावजूद, गांधी राष्ट्रवाद के मुद्दे से जुड़ते दिखाई नहीं देते. जहां अनंद कुमारस्वामी समाज व सभ्यता में कोई फर्क नहीं करते, वही गांधी की पूरी राजनीतिक शैली ही इस फर्क पर आधारित है. इसीलिये गांधी हमेशा मानते हैं कि छुआछूत व जातिगत भेदभाव का विरोध भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना गरीबी व मशीनीकरण का विरोध. गांधी का पश्चिम विरोध तरीका उपनिवेशवाद से प्रभावित हो सकता है, पर उसमें भारतीय राष्ट्रवाद या प्रमाणित राष्ट्रवादिता का अभाव अवश्य है.

इन सबसे कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे उठ खड़े होते हैं. राष्ट्रवाद का निर्माण करने वाले ऐसे आन्तरिक व बाह्य कारकों की विविधता व विस्तार पर ध्यान देना होगा. इस पर भी ध्यान देना होगा कि कैसे अनेक समाजिक व धार्मिक घटक (अंग्रेजों के आगमन से पूर्व से) और ज्यादा जातिवादी और व्यवस्थावादी हो गये जिससे कि द्विभाषी विज्ञान उपनिवेशवाद में पूर्व – परम्पराओं को सुदृढ़ करने में लग गये. मेरी दृष्टि में कोई ‘एक भारतीय मानसिकता’ आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन की आधारशिला नहीं है, वरन् अनेक मानसिकताओं का संजाल जो एक दूसरे से अलग भी है और कहीं जुड़ती भी है – मिलकर उस आधारशिला का निर्माण करती है.

(पुनर्लेखन : सम्पादक एवं शोधार्थी शोध-मण्डल)

सशीज हेगड़े हैदराबाद यूनिवर्सिटी, हैदराबाद में समाजशास्त्र के प्रोफेसर हैं

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