भारत में राजनीति विज्ञान

घनश्याम शाह : राजनीति विज्ञान मात्र एक विषय या अनुशासन ही नहीं वरन् एक बौद्धि प्रवृत्ति भी है जो एक विषय की सीमाओं से वृहत्तर अध्ययन करती है. इसमें ऐसे बीज विद्यमान हैं जो सामाजिक सम्बन्धों के पुनर्निर्माण के अवधारणात्मक यन्त्र उपलब्ध करात हैं. भारत में एक ऐसे राजनीतिक सिद्धान्त की आवश्यकता है जो अनुभवात्मक तथा परिवर्तनाभिमुखी हो एवं बेहतर परिस्थितियों को जन्म दे सके. अतएव पिछले पांच दशकों में लोकतान्त्रिक नीतियों एवं भारतीय राजनीतिक प्रक्रिया की जटिलताओं के अनुभवों को सिद्धान्त का रूप प्रदान करना भारत के राजनीतिविदों के लिये सबसे प्रमुख कार्य है.

भारत में राजनीति विज्ञान में साठ के दशक में गुणात्मक एवं मात्रात्मक दोनों रूपों में सुधार परिलक्षित होते हैं. राजनीति विज्ञान ने स्वयं को राजनीतिक दर्शन एवं संस्थाओं के विधिक अध्ययन की सीमाओं से निकाल कर राजनीतिक प्रक्रिया एवं राजनीतिक व्यवहार की ओर अभिमुख किया है. जो व्यक्ति राजनीति की प्रकृति एवं कार्यों को समझना चाहते हैं, उन्हें किसी विश्वविद्यालय से औपचारिक प्रमाण-पत्र लेने की आवश्यकता नहीं. यह उनकी बौद्धिक प्रवृत्ति है जो राजनीति को प्रभावित एवं परिवर्तित करने की क्षमता रखती है. ‘अनुशासन’ शब्द जिसे सामान्यतया शैक्षणिक विषय के रूप में प्रयुक्त किया जाता है, लैटिन भाषा के ‘डिस्पिलना’ शब्द से उद्धृत है जिसका तात्पर्य है सूचना देना एवं शिक्षित करना. यह एक विषय  जिसे सामान्यतया संस्थाओं में पढ़ाया जाता है. राजनीति विज्ञान राजनीति को विश्लेषित एवं सैद्धान्तिक रूप देने की इतनी प्राचीन बौद्धिक प्रवृत्ति  जितना कि सामूहिक जीवन का निर्माण, जब विधियां, नियम एवं नियमितताएं, सत्ता का विभाजन, स्रोतों का विभाजन तथा शासन करने वाली औपचारिक संस्थाओं के अस्तित्व का उदय होना आरम्भ हुआ था.

परन्तु राजनीति विज्ञान का एक आधुनिक विषय के रूप में उदय अमेरिका के कोलम्बिया कॉलेज में 1880 में हु था. उस समय इस विषय का उद्देश्य व्यक्तियों का नैतिक, चारित्रिक निर्माण एवं कार्यपालिका के सदस्यों तथा मंत्रियों को लोक-जीवन में सहभागिता के लिये प्रशिक्षित करना था. राजनीतिक नेताओं एवं प्रशासकों को प्रशिक्षित करने की प्रक्रिया निरन्तर चलती रही. इस प्रकार, राजनीति विज्ञान के उप-विषयों के रूप में लोक प्रशासन एवं अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति जैसे विषयों का उद्भव हुआ.

political-science-in-india

द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् व्यवहारवाद के अन्वेषण से राजनीति विज्ञान में एक महान परिवर्तन आया. तब से राजनीति विज्ञान राजनीतिक प्रक्रिया एवं व्यवहार का अध्ययन करने लगा. राजनीतिक घटनाओं का विश्लेषण करना राजनीति विज्ञान का उद्देश्य है. राजनीतिक दर्श जिसका व्यवहारवाद के उद्भव तथा राजनीति विज्ञान के अध्ययन पर एकाधिकार था, इसकी परिधि से बहिष्कृत कर दिया गया.

शैक्षणिक संस्थाओं में एक विषय के रूप में राजनीति विज्ञान को अनेक विवशताओं का सामना करना पड़ता है. प्रथमत: इससे आशा की जाती है कि यह सूचनाएं प्रदान करे, नौकरशाहों एवं कूटनीतिज्ञों को प्रशिक्षित करे तथा नीति निर्धारकों को अपनी गतिविधियों को सुधारने के लिये आगतों को उपलब्ध कराए. जो व्यक्ति राजनीति विज्ञान के विद्यार्थी के रूप में प्रवेश लेते हैं, वे रोजगार के अवसरों को दृष्टिगत करते हुए अध्ययन करते हैं. इस प्रकार वे ऐसी कुशलता प्राप्त करना चाहते हैं जिससे वे सरलता से रोज़गार प्राप्त कर सकें. वे व्यक्ति जो राजनीति में प्रवेश करने के इच्छुक होते हैं, सामाजिक एवं राजनीतिक घटनाओं की जटिलताओं का मात्र उतना ही ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं जिसके द्वारा सामाजिक समस्याओं का समाधान किया जा सके एवं राजनीति के क्षेत्र में अपनी समझ व दृष्टि को सुधारा जा सके. विषय से यह आशा की जाती है कि वह वर्तमान व्यवस्था को सुधारने के लिये सुझाव दे.

राजनीति विज्ञान बौद्धिक प्रवृत्ति के रूप में विषय की सीमाओं से परे जाकर अध्ययन करता है. इसकी प्राथमिकताएं निम्नवत हैं- किसी समय विशेष में राजनीति की प्रकृति क्या है ? एक विशिष्ट प्रकार की राजनीति क्यों प्रचलित है ? एक बेहतर राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवस्था के लिए इसे किस प्रकार परिवर्तित किया जा सकता है? इस प्रकार, क्रान्तिकारी सामाजिक रूपान्तरण में इसका मूल निहित है. राजनीति विज्ञान एक विषय के रूप में उन व्यक्तियों को अवधारणात्मक तथ्य एवं सूचना प्रदान करता है जो राजनीति विज्ञान को बौद्धिक प्रवृत्ति के रूप में आत्मसात् करना चाहते हैं. एक बौद्धिक प्रवृत्ति के रूप में राजनीति को एकान्त में या आत्मनिर्भर घटना के रूप में नहीं समझा जाता है. यह एक सामाजिक प्रक्रिया है जो समय के अनुसार ऐतिहासिक है तथा संस्कृति, सामाजिक व्यवस्था एवं उत्पादक शक्तियों से अन्तरंग रूप से सम्बद्ध है.

‘राज्य केन्द्रित’ अध्ययन का एक कारण यह है कि हम राजनीति विज्ञान को मात्र एक विषय व अनुशासन की मान्यता देते हैं न कि एक बौद्धिक प्रवृत्ति की. भारत में राजनीति विज्ञान एक विषय के रूप में पश्चिम की धरोहर है. ब्रिटिश परम्परा के प्रभाव में भारत में राजनीति विज्ञान राजनीतिक दर्शन, औपचारिक सरकारी संस्थाओं एवं अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन तक सीमित है. आनुभूतिक अध्ययन, जिसके अन्तर्गत संस्थाओं की क्रियात्मकता भी समाहित है, पचास के दशक के अन्तिम वर्षों की देन है जो अमेरिका में विकसित व्यवहारवादी विचारधारा से प्रभावित है. द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् उदारवादी राजनीतिक विचारधारा एवं संरचनात्मक-प्रकार्यात्मक उपागम ने राजनीति विज्ञान को एक नवीन दिशा प्रदान की जिसने संघर्ष एवं परिवर्तन के स्थान पर समाज विज्ञान के साहित्य पर समान रूप से बल दिया. राजनीति विज्ञान, यद्यपि मूल रूप से शक्ति एवं संघर्ष से सम्बन्धित है, पर सामाजिक संघर्ष के मुद्दों पर सामाजिक परिवर्तनों के लिये उन्मुख है. उन अधिकांश व्यक्तियों के लिये जो विद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में राजनीति विज्ञान के अध्यापक हैं, राजनीति विज्ञान मात्र एक अनुशासन है. यह उनके रोज़गार का एक भाग है जिसके लिये उन्हें वेतन दिया जाता है. अत्यन्त अल्प संख्या में अध्यापकों एवं शोधार्थियों के लिये यह एक बौद्धिक प्रवृति है. वे अपने रोज़गार से पृथक राजनीति को समझने एवं विश्लेषित करने में अधिक रुचि रखते हैं क्योंकि वे इसे इस भांति परिवर्तित करना चाहते हैं कि ऐसी आदर्श नीति का निर्माण करें जो उनके उस विचार को साकार कर सके जैसे समाज की कल्पना वे करते हैं. वे सब समाज एवं राजनीति के संदर्भ में समान विचारों से युक्त नहीं है. उन्हें चार श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है- प्रथम राज्य केन्द्रित, द्वितीय, राज्य विरोधी तृतीय, उदारवादी लोकतान्त्रिक तथा चतुर्थ मार्क्सवादी.

‘राज्य केन्द्रित’ विचारधारा के समर्थकों को परम्परावादी भी कहा जा सकता है. यद्यपि वे लोकतन्त्र एवं समानता के सिद्धान्तों को भी मान्यता देते हैं, लेकिन इस तथ्य पर अधिक बल देते हैं कि राजनीति मात्र कुछ चुने हुए कुशल एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों से सम्बन्धित है, केवल वे ही समाज के हितों को समझ सकते हैं. यह विचारधारा न तो विषय की प्रगति में योगदान कर सकती है, न ही समाज के विकास में. वर्तमान समय में अहस्तक्षेप का सिद्धान्त अपनी पूर्ण विकसित अवस्था में है. इसके पक्षधर राज्य के न्यूनतम हस्तक्षेप पर बल देते हैं एवं उनका विश्वास इस तथ्य में है कि बाजार व्यवस्था अधिकतम व्यक्तियों के अधिकतम सुख के सिद्धान्त को उपलब्ध कराए. उनके मतानुसार राज्य व्यक्ति की स्वतन्त्रता के विरुद्ध है. भारतीय समाज के संदर्भ में भारतीय राजनीतिविदों ने इस विचारधारा पर कोई सिद्धान्त या अवधारणा प्रस्तुत नहीं की. उदारवादी लोकतंत्रविदों का भारत में एवं राजनीति विज्ञान में वर्चस्व है, यद्यपि उनका एकाधिकार नहीं है. उनका मुख्यत: उदारवादी लोकतंत्र एवं निर्वाचित प्रतिनिधिमूलक शासन से सम्बन्ध है जिसमें कानून का शासन एवं संविधान भी समाहित है, उनमें से कुछ विचारक पूंजीवाद के नितान्त विरुद्ध हैं. उनका मत है कि राजनीति सामाजिक शक्तियों से मुक्त है एवं राज्य तटस्थ है जो न केवल सर्वजन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है, अपितु समाज में समानता भी स्थापित करता है. उन्होंने भारत में सामाजिक शक्तियों के सामाजिक पक्षों के सन्दर्भ में विचारणीय एवं उल्लेखनीय साहित्य उपलब्ध कराया है. उनका जाति एवं राजनीति, साम्प्रदायिकता इत्यादि पर अध्ययन अति मह्तवपूर्ण है. किन्तु उन्होंने घटनाओं के राजनीतिक-आर्थिक पक्ष को नकार दिया है जबकि राज्य का एक कार्य पूंजी संचयन भी है. उदारवादी लोकतंत्रविदों ने इस दिशा में कतई रुचि प्रदर्शित नहीं की है, उनकी अधिकांश कृतियां मतदाताओं के व्यवहार एवं उनके प्रतिनिधियों पर आधारित है. अपने शोधों में मार्क्सवादी विचारधारा का अनुसरण करने वाले राजनीतिविदों की संख्या अत्यन्त कम है. वे प्रासंगिक प्रश्नों को प्रस्तुत करते हैं एवं भारतीय राज्य तथा राजनीतिक प्रक्रियाओं के कार्यों के आलोचनात्मक विश्लेषण को प्रोत्साहित करते हैं. दलगत राजनीति से परे भारतीय राज्य की प्रकति, शासक वर्ग एवं राज्य व शासक वर्ग के मध्य सम्बन्धों के विश्लेषण के बहुत ही कम प्रयास किए गए हैं. भारतीय राजनीति के सामाजिक-सांस्कृतिक पक्षों विशिष्टतया जाति, लिंग, साम्प्रदायिकता, भाषावाद, क्षेत्रवाद इत्यादि की दिशा में उनके विश्लेषण अत्यन्त सर्वसामान्य एवं कई बार विशिष्ट हैं. उदारवादी लोकतन्त्रविद् एवं मार्क्सवादी दोनों ही बौद्धिक प्रवृत्ति से प्रेरित हैं और लोकतंत्र को बनाए रखने एवं भारत में आर्थिक तथा सामाजिक समानता के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रतिबद्ध हैं. पर उनके लोकतांत्रिक मूल्य भिन्न हैं. अतएव यह कहा जा सकता है कि परम्परावादी संस्थाओं में परिवर्तन हो रहा है. कुछ सीमा तक वे सामाजिक न्याय एवं अधिकारों को उपलब्ध कराने के साधन बन गये हैं. अधिकांश संख्या में नागरिक संस्थाओं का भी उदय हुआ है, साथ ही कुछ संस्थाओं ने राज्य को शक्तिशाली बनाया है अत: भारत में समस्त विचारों को सैद्धान्तिक रूप प्रदान करने की आवश्यकता है.

प्रस्तुत लेख ‘इंडियन जर्नल ऑफ पोलिटिकल साइन्स’ अंक 62, संख्या 1, मार्च 2001, पृष्ठ 11-23 से साभार उद्धृत. मूल लेख ‘पोलिटिकल साइन्स इन इंडिया : ए डिसिप्लिन एण्ड एन इन्टेलेक्चुअल परस्यूट’ शीर्षक से प्रकाशित.

2 comments

  1. Very informative article. You people are doing such a revolutionary work for Hindi medium student.
    Thankfully
    Raman Mahla

Leave a Reply

Your email address will not be published.