इस्लाम की राजनीति

वली नसर : प्रस्तुत लेख निम्न पांच पुस्तकों की समीक्षा पर आधारित है : (1) मिया ब्लूम – ‘डाइंग टू किल : द एल्यूर सुसाइड टेरर’ (कोलम्बिया यूनिवर्सिटी, 2005); (2) जोसिलिन सीज़री – ‘व्हेन इस्लाम एण्ड डिमोक्रेसी मीट : मुस्लिम इन यूरोप एण्ड द यूनाइटेड स्टेट्स’ (पालग्रेवमैकमिलन, 2004) (3) बेवरले मिल्टन एडवर्ड – ‘इस्लामिक फंडामेण्टलिज्म’ (राउटलेग, 2005); (4) मंसूर मोअडेल – ‘इस्लामिक माडर्निज्म, नेशनलिज्म एण्ड फंडामेण्टलिज्म : एपीसोड एण्ड डिस्कोर्स (यूनिवर्सिटी आफ शिकागो, 2005)’; (5) फहद् ज़कारिया – ‘मिथ एण्ड रियलिटी इन द कन्टेम्पोरेरी इस्लामिक मूवमेण्ट’ (प्लूटो, 2005)

11 सितम्बर, 2001 से ‘इस्लामी कट्टरपंथी’, ‘मुस्लिम आतंकवाद’ तथा अब ‘इस्लामी तानाशाही’ जैसे शीर्षकों ने समाचार पत्रों में गंभीर पकड़ बना ली है. वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर पर आत्मघाती हमलों की भयानक तस्वीरों ने सभी का ध्यान केन्द्रित किया है, जिससे अफगानिस्तान में बदले की भावना उत्पन्न हुई. एक ऐसा देश जहां छात्र राज्य कर रहे थे तथा जहां पुरातन कानून लागू था वहां उत्पात उत्पन्न हो गया जिसे इस्लामी ‘लार्ड ऑफ द फ्लाईज़’ ने बहुत बड़े पैमाने पर महसूस किया. इस्लामी जेहाद और हमास ने इज़रायल में आत्मघाती हमले के सम्बन्ध में धर्म प्रचार किया, मेड्रिड और लन्दन में बमबारी हमले किए गए और इराक में हिंसा का आरोप इस्लाम पर लगाया गया. ‘हिज्ब-अल्लाह’ दि पार्टी ऑफ गॉड’ ने इजरायली सेना से लेबनान में बराबरी की लड़ाई लड़ी, जिससे इस्लामी कार्यकर्ताओं ने पश्चिमी समाज में शक और भय की गहरी जड़े बना लीं और जिसके कारण संयुक्त राज्य अमेरिका और उस के सहयोगी इस्लाम के विरुद्ध युद्ध में शामिल हो गए.

सेमुअल हटिंग्टन ने ‘क्लैश ऑफ सिविलाइज़ेशन’ में इस  बात को महसूस किया फिर भी दोनों तरफ की जनता अपेक्षाकृत उनके बारे में कम जानती हैं जिससे ये डरते हैं.

Muslim

यूरोप तथा अमरीका के प्रकाशनों ने इस्लामी राजनीति की अधिक सूचनाएं प्राप्त करने के लिए (जनता की मांग पर) कोशिशें कीं. 1978-79 में ईरान में क्रान्ति के बाद इस पर गहन अध्ययन प्रारम्भ कर दिया गया, जब 1981 में मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात की हत्या हो गई. वास्तव में इस युद्ध का क्षेत्र 1990 के दशक में खुला जब न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर को नष्ट करने का प्रयास किया गया और अल्जीरिया फिलीस्तीन, मिस्र, जॉर्डन, सुडान, टर्की और अफगानिस्तान में धार्मिक संगठनों ने अपनी अप्रत्याशित राजनैतिक शक्ति का प्रदर्शन किया.

सन् 1980 और 1990 के दशक में मुस्लिम विचार और राजनीति में कई मोड़ आए. उनकी मज़बूती का एक अच्छा संकेत प्रकाशकों की, उनमें से कुछ को, पुन: प्रकाशित करने की तत्परता है. 2001 के बाद से कुछ नए मुद्दों ने जन्म लिया. इस अवधि में कुछ लिखने योग्य लम्बे चौड़े सर्वेक्षण पर थोड़ी सी रोशनी डालने से और इस्लामी कट्टरपंथी का अच्छा अध्ययन करके अधिक जानकारी प्राप्त की जा सकती है. इन लेखों के विस्तृत स्तरीय कार्य ने लेखकों को और अधिक पुस्तकें लिखने और अपना ध्यान अधिक सूक्ष्म विषयों पर केन्द्रित करने  के लिए प्रोत्साहित किया. यद्यपि अनेक पुस्तकें जो पुनर्विचार के अन्तर्गत हैं, छोटी-छोटी बातों पर रोशनी ही नहीं डालतीं वरन् वे इस्लामी और मध्य-पूर्वी क्षेत्रों के अध्ययन में विशेषज्ञ हैं और शिक्षित पाठक पर ही नहीं वरन् इस्लाम और राजनीति पर पहले ही से थोड़ा ज्ञान रखने वालों को कुछ न कुछ प्रदान करती हैं.

एक बिन्दु जिस पर आधुनिक तथा पहले के लेखक सहमत हैं, वह यह कि इस्लाम एक अपरिवर्तनीय रहस्य है, जो गुमराह करने वाला है – यह सोच भ्रामक है. तालिबान शासन डरावना था जिससे यह सोच उभरी. इस शासन का कठोर स्वभाव कितना इस्लाम से प्राप्त किया गया था और कितना पश्तून जातीय संस्कृति से, तथा कितना कठोर राजनीतिक हालातों से जिनमें यह आन्दोलन उभरा. ओसामा बिन लादेन ने वर्ल्ड ट्रेड सेन्टर की बर्बादी की और अमेरिकी जनता के मस्तिष्क में इस्लाम की अमानवीय छवि डाल दी, किन्तु उसे इस्लामी धार्मिक स्वभाव का व्याख्यान नहीं कहा जा सकता.

इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिसके मूल तत्वों में कुछ स्पष्ट राजनैतिक पहलू हैं. दूसरे धर्मों के समान इसका समाज से सहजीवी रिश्ता है. दोनों एक दूसरे को उसी प्रकार प्रभावित करते हैं जिस प्रकार भक्ति भगवान को प्रसन्न करने वाला आचरण अपनाने के लिए विश्वासी को प्रेरित करती है.

इस्लाम ने सरकार बनाने का कोई स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत नहीं किया है. इस्लामी भक्ति के स्तम्भ (विश्वास, प्रार्थना, रोजा, जकात और धार्मिक यात्रा) कहीं भी राजनैतिक नहीं है, किन्तु फिर भी इस्लाम अप्रत्यक्ष रूप से कहीं राजनीति से सम्बन्धित है, हर स्तम्भ में लोक पहलू है जो मुसलमानों को एक समुदाय में पिरोने का कार्य करता है जिसे उम्मा कहते हैं. मुहम्मद साहब की मृत्यु के बाद धार्मिक सिद्धान्तों के अनुपालन के लिए उम्मा निर्मित की गई, किन्तु यह समुदाय बहुत जल्दी ही प्रतिद्वन्दी संप्रदायों मे विभाजित हो गए. यह प्रदर्शित करता है कि कुरान और मुहम्मद साहब ने कितना कम राजनैतिक मार्ग दर्शन किया है. सुन्नी राजनैतिक नेता, मुसलमानों की बहुमत सुन्नियों के लिए, बलपूर्वक धर्म के मामले नहीं थोपते बल्कि इस्लाम के पांच स्तम्भों में इंसाफ और कानून का समर्थन करते हैं और अपने समुदाय में गैर मुस्लिमों की धमकियों की परवाह न करते हुए शान्ति रखना चाहते हैं क्योंकि यह राजनैतिक मामला नहीं वरन् सही को लागू करना और गलत को रोकना उनका कर्तव्य है जो व्यक्तिगत मुस्लिम और उम्मा पर लागू होती है.

सही – गलत की पहचान करना, न्याय और नैतिकता को मिलाने के इस आदर्श ने आधुनिक इस्लामी राजनीति की जीवित रखा है. इस्लामी सक्रियतावादी यद्पि पुरातन इस्लामी समुदाय की ओर वापसी की अपील करते हैं, किन्तु वह जानते हैं कि आज विश्व वह नहीं है जो मुहम्मद साहब के समय में था. वह चाहते हैं कि मुहम्मद साहब के न्याय के संदेश को पहुंचा सकें न कि सातवीं शताब्दी को वापस लाएं. इसके उलट पश्चिमी देशों में व्याप्त शक के विरुद्ध इस्लाम अमेरिका-विरोधी नहीं है, बल्कि इस बात से नाराज है कि मुस्लिम देशों में भ्रष्टाचार-अनैतिकता बढ़ती जा रही है और वह अमेरिका के विरुद्ध इसलिए है कि वह भ्रष्ट सरकार का समर्थन कर रहा है. इस प्रकार इस्लाम विरोध की घरेलू राजनीति है.

आलोचक इस्लाम की इस विशेषता को पहचानने में असमर्थ होने के कारण शिकायत करते हैं कि इस्लाम ने कभी भी सुधार का लाभ नहीं उठाया अर्थात् इस्लाम में धर्मस्थल (जैसे चर्च) और राज्य का पृथक्करण नहीं है. मूलभूत रूप से वह इस सच्चाई को नज़रअन्दाज़ कर देते हैं कि इस्लाम में कोई चर्च (वर्गीकृत धार्मिक संस्था) नहीं है (कम से कम सुन्नियों में). वह इस बात को स्वीकार नहीं करते कि पश्चिम में चर्च और राज्य के गहरे रिश्ते हैं. उनमें राज्य चर्च पर ही निर्भर करता है. वैटिकन द्वारा लैटिन अमेरिका में स्वतन्त्रता का दमन करता इस बात  का उदाहरण है कि वहां पर चर्च तथा राज्य में तालमेल व मेल मिलाप है, इसके अतिरिक्त और बहुत से उदाहरण हैं. यूरोप में क्रिश्चिन डिमोक्रेटिक पार्टी से लेकर कैथोलिक चर्च तक जैसे – पोलैण्ड, आयरलैण्ड व इंग्लैण्ड के चर्च जिनमें राज्याध्यक्ष चर्च का सर्वोच्च गवर्नर होता है. अमेरिका में भी जहां पृथ्क्करण का मन्त्र प्राय: प्रयुक्त होता है, धर्म और राजनीति इतनी अभिन्न हैं कि चुनाव में उम्मीदवार को चर्च की सहमति लेनी पड़ती है. दूसरी ओर मुस्लिम देशों में अधिकतर उम्मीदवार किसी धार्मिक संस्था से बंधे नहीं होते. इसका अर्थ यह नहीं है कि इस्लाम राजनीतिक और ईसाईयत नहीं, वरन् किसी धार्मिक संस्था की इस्लाम में अनुपस्थिति मुसलमानों को अपने नाम से स्थापित आदेशों के विरुद्ध करने की स्वतन्त्रता देती है.

किस प्रकार, न्याय और नैतिकता, जिसका वायदा इस्लाम में किया गया है, को पुनर्जीवित किया जाए, तर्क का विषय है. शरीयत को लागू करना ही इसका उत्तर है – किन्तु किस तरह की शरीयत ? मुहम्मद साहब ने कुरान में राजनीति का बहुत थोड़ा वर्णन किया है और मुहम्मद साहब की मृत्यु के पश्चात् शरीयत अधिकतर व्याख्या का परिणाम है, और इसमें व्याख्या का कोई नियम निश्चित नहीं है. अब आधुनिक युग में बहाबी आदर्श उपस्थित हो गए हैं जो इस्लाम का कट्टरवादी दृष्टिकोण है. और जब ओसामा बिन लादेन अतिवादी इस्लामी कर्तव्यों की एक व्याख्या जारी करता है तो कोई भी शक्ति गैर-कट्टरवादी कहकर ठुकराने वाली नहीं होती.

जितनी इस्लाम में कानून और सही बर्ताव के विषय में व्याख्या की कमी है उससे और अधिक कमी है इस्लाम को पुन:  राज्य और समाज में लागू करने के साधनों में एकता की. इस्लामी गुटों में मिस्र के मुस्लिम भाइयों ने सआदत-हुस्नी मुबारक के काल में राजनीति में अहिंसा का मार्ग अपनाया. फिलिस्तीनी मुस्लिम भाई पहले ‘इन्तिफैदा’ से बदल कर ‘हमस’ हो गए जिनके लिए आत्मघाती बमबारी स्वीकार्य हथियार है. उन्होंने इज़रायल को बमबारी का निशाना बनाया जिससे आतंकवाद का रूप धारण कर लिया. दार्शनीय उग्र आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले वही कारण हैं जो राजनीति को किसी भी अन्य स्थान पर प्रभावित करते हैं, अर्थात् स्थानीय सामाजिक, आर्थिक तथा दशा. जहां एक ओर स्थानीय प्रभाव सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, आज इन्टरनेट के सीमा रहित विश्व में 24 घंटे समाचारों द्वारा दूर की घटनाएं भी पहले से अधिक मायने रखती हैं.

आज  का सच यह है कि इस्लाम प्रचलित व्यवस्था से असंतुष्टों के लिए, न्याय प्राप्त करने के आशा के तौर पर स्थापित होता जा रहा है.  हिंसा न्याय प्राप्त करने के मार्ग के रूप में स्वीकार्य होती जा रही है. यह परिस्थिति अचानक उत्पन्न नहीं हुई वरन् इसका उद्भव उन्नीसवीं शताब्दी में ढूंढ़ा जा सकता है, अथवा उससे भी कुछ समय पूर्व में. अमेरिका और यूरोप में लोग इस इस्लामी इतिहास से अनभिज्ञ हैं किन्तु इस राजनैतिक आदर्श के विकास का मूल्यांकन व अध्ययन इस्लाम के गूढ़ रहस्यों को खोलने में सहायक हो सकता है. मन्सूर मोआडेल का ‘इस्लामी आधुनिकवाद’ इस्लामी राजनीति एवं राष्ट्रीय राज्यों के मध्य सम्बन्धों के विषय में विचार करने के लिए एक अच्छा तर्कपूर्ण विवरण है.

मोआडेल आधुनिक राजनैतिक विचारधारा की व्याख्या के लिए एक सामाजिक ढांचा तैयार करता है. यह ढांचा संकेत करता है कि किसी भी समाज में कोई एकता नहीं है, आदर्शों में महत्वपूर्ण परिवर्तन केवल तब होते हैं जब स्थितियों में अप्रत्याशित परिवर्तन समाज को हिला देते हैं और समाज असंतुष्ट हो जाता है. मध्य पूर्व तथा दक्षिण एशिया में 19वीं शताब्दी तक सामाजिक एवं राजनैतिक ढांचे में एक रूपता नहीं थी किन्तु स्थानीय स्तर पर काफी हद  तक स्थिरता थी. इसमें बदवाल यूरोप से प्रभावित हुआ है. बाहरी ताकतों ने एक चुनौती पैदा कर दी है, मध्य एशिया में भी वैश्विक आर्थिक पद्धति के द्वारा दबाव डाला गया कि वह भी यह तकनीक अपनाएं.

वह राज्य जिन्होंने सबसे पहले यूरोप की इस शक्ति का प्रभाव महसूस किया मुगल, आटोमन की शाही हुकूमत तथा काजर ईरान हैं जो किसी हद तक निर्बल राज्य माने जाते थे. राजनीति का नया मोड़ था इस्लाम की आधुनिक उदारवादी व्याख्या, वह धर्म जिसने तीनों हुकूमतों को उनकी ऐतिहासिक पहचान दी. इस्लामी आधुनिकीकरण का भारत के सय्यद अहमद खान तथा आटोमन साम्राज्य के मुहम्मद अब्दुल प्रतिनिधित्व करते हैं. वह तर्क पर भरोसा करते हैं रुढ़ियों पर नहीं. उनके अनुसार प्राचीन रीतियों के स्थान पर आधुनिकता द्वारा प्रदत्त चुनौती का सामना करने के लिए तर्क अधिक महत्वपूर्ण है. बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भिक चरण में स्थिति में परिवर्तन के कारण इस्लामी आधुनिक विचारधारा, उदारवादी राष्ट्रीयता में परिवर्तित हो गई. हसन-अल-बन्ना ने 1928 में मुस्लिम भ्रातृ संघ का आरम्भ किया किन्तु विदेशी प्रभाव से वह निर्बल राजतन्त्रों में परिवर्तित हो गई. उदारवादी राष्ट्रवाद असफल हो गया तथा विदेशी प्रभाव जारी रहा. मिस्र में वफ्द पार्टी प्रभावशाली रही किन्तु वह केवल उच्च वर्ग में ही रूचि रखती थी. जबकि सीरिया में उदारवादी राष्ट्रवादी दल न ही युद्धेतर फ्रांसीसी नियंत्रण समाप्त कर पाए और न ही 1950 की सरकारों को संभाल सके. ईरान में उदारवादी राष्ट्रवाद को प्रधानमंत्री मुहम्मद मुसद्देग के पतन ने शक्तिहीन कर दिया जो एग्लो-अमेरिका गठजोड़ द्वारा 1953 में सम्भव हुआ.

उदारवादी राष्ट्रीय प्रजातन्त्र सामाजिक, आर्थिक विकास या पूर्ण सफलता प्राप्त करने में असमर्थ रहा. हालांकि घरेलू क्षेत्र में इसने कुछ शक्ति प्राप्त की और 1945 के बाद इसमें प्रगति की लहर उत्पन्न हुई और उन्नति का ऐसा इन्जन बना दिया जिसको चुनौती नहीं दी जा सकती. मिस्र, सीरिया, ईरान और अल्जीरिया में ईरान की शाही हुकूमत शाह मुहम्मद रज़ा के अन्तर्गत अरब समाजवाद ने निरंकुश राजतन्त्र स्थापित कर दिया जिसने राजनीति में ही नहीं बल्कि आर्थिक व सांस्कृतिक क्षेत्र में एकाधिकार स्थापित कर लिया. यह धर्म निरपेक्ष राज्य थे और पहली बार राज्य ने धर्म पर पूर्ण नियन्त्रण प्राप्त किया, और उस नियंत्रण को उसी नियम के विरुद्ध प्रयुक्त किया जिसकी वह स्वयं सुरक्षा करता था. जिन्होंने विरोध किया उनको देश निकाला अथवा फांसी की सज़ा दी गई जैसे मिस्र के सैय्यद कुतुब तथा ईरान के अयातुल्ला खुमैनी. इससे विरोध उत्पन्न हुआ. अरब समाजवादी राज्यों ने 1967 में छह दिनों के युद्ध में इज़राइल से मात खाई जबकि ईरान में ‘श्वेत क्रान्ति’ के द्वारा शाह ने जनता को सरकार से दूर कर दिया. हालांकि यह राज्य अपनी गलतियों के बावजूद बच गए. उन राज्यों में जहां राज्य राजनीतिक एवं सांस्कृतिक मामलों में पूर्ण शक्ति रखता है, जहां धर्म निरपेक्षता में विश्वास रखने वाले हैं, उन्हें भी इस्लामी कट्टरवाद की ओर देखना पड़ता है. अत: कट्टरवादी इस्लामी राजनीति मजबूत होती है.

जार्डन ने अधिक उदार उदाहरण प्रस्तुत किया, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि स्थानीय राजनैतिक स्थितियां इस्लामी आदर्शों को मूर्त रूप देती हैं. यद्यपि जॉर्डन के इस्लाम पर भी कट्टरवाद का प्रभाव है, उनका सबसे वृहद गुट, ‘मुस्लिम ब्रदर’ राजनीति में खींचा गया है और उन्हें अपना संदेश राजनैतिक कार्यक्रम के समानान्तर बनाना पड़ा.

मोअडेल का विश्लेषण बहुत ठोस है और तथ्यों पर आधारित है. उसने पाठक को याद दिलाया कि जिस चीज़ के विरुद्ध आदर्श प्रदर्शन करते हैं वही सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. इसके साथ ही पश्चिमी शक्तियों की मध्य-पूर्व और दक्षिण एशिया के राजनैतिक आदर्शों के निर्माण में क्या भूमिका है उन्होंने यह भी स्पष्ट किया. पश्चिमी प्रभाव यद्यपि राजनैतिक विकास में एक कारण रहा है किन्तु मुख्य शक्ति सदा घरेलू आन्तरिक परिवर्तन ही रहे हैं. यूरोप तथा संयुक्त राष्ट्र को सदा इसी दृष्टि से देखा गया है, जैसा आजकल ‘इस्लाम पर वार’ के विषय में माना जा रहा है. यह गहन चिन्ता का विषय है.

इस्लामी आधुनिकतावाद पढ़ने योग्य है, किन्तु गैर-साहित्यिक लोग इस पचाने में कठिनाई महसूस करते हैं. मोअडेल का लेख यद्यपि लोग दिलचस्पी से पढ़ना चाहते हैं किन्तु उसमें लेखकों एवं विषय की इतनी जानकारी है कि प्रारम्भिक पाठक को बहुत समय लग जाता है, किन्तु यह प्रयास सार्थक सिद्ध होगा. क्योंकि, बहुत कम पुस्तकें इतना अधिक ज्ञान प्रदान करती हैं. अन्य महत्वपूर्ण रचना है एल्बर्ट हुरानी की ‘अरेबिक थॉट इन दि लिबरल एज़’

कट्टरवादी इस्लाम के अध्ययन के लिए बेवरली मिलटन एडवर्ड की ‘इस्लामिक फंडामेन्टलिज्म सिन्स 1945’ भी अच्छा ज्ञान प्रदान करती है. एडवर्ड अन्य मुद्दे भी उठाता है जैसे ‘राजनैतिक इस्लाम के उदय में राष्ट्रीय निरंकुश राज्यों को धर्मनिरपेक्ष बनाने की महत्ता’. मिल्टन एडवर्ड के सर्वेक्षण का एक सकारात्मक पहलू यह है कि कुछ गुटों की प्रसिद्धि के कारणों की मान्यता की गई है, जैसे – मिस्र में ‘मुस्लिम ब्रदर्स’, फिलिस्तीन में ‘हमस’ तथा लेबनान में ‘हिज्ब-अल्लाह’. पश्चिमी कल्पना अन्तिम दो गुटों को हिंसा से जोड़ती है. अमरीकी सरकार ने मिस्र में प्रजातन्त्र की स्थापना में मिस्री सरकार के हस्तक्षेप अथवा ‘मुस्लिम ब्रदर्स’ की 2006 के चुनाव में बढ़ती शक्ति पर रोक लगाने के विरोध में कोई विशेष रुख नहीं अपनाया. इन गुटों ने फिर भी अपने आदर्शों से कोई विशेष समर्थक नहीं बटोरे, बल्कि सामाजिक कार्यों – (निर्धनों की सहायता व ऐसे कार्य जो निर्बल और भ्रष्ट सरकारें नहीं कर सकीं) से अधिक समर्थक एकत्रित कर लिए. इससे यह आशाएं बढ़ीं कि यदि सरकार में धर्मपरायण लोग होंगे तो वह कम भ्रष्ट और अधिक नैतिक होगी, राजनीतिज्ञों से बेहतर होगी जहां मिल्टन एडवर्ड गरीबी और अर्थ-सम्बन्धी समस्याओं पर अधिक ध्यान देते हैं, इन्हीं को इस्लामी गुटबन्दी के लिए उत्तरदायी मानते हैं, वहीं चुनाव में फिलस्तीन में ‘हमस’ तथा तुर्की में ए.के. पार्टी की विजय बहुत कुछ कहती है, इन चुनावों में इनके विरोधी भ्रष्ट, धर्म निरपेक्ष प्रशासक थे.

विश्व के दूसरे क्षेत्रों से देखने पर, अनेक इस्लामी संगठन अपने पश्चिम के प्रति वैरभाव के कारण अलग दिखते हैं. मिल्टन एडवर्ड यूरोप तथा अमरीका की जनता को इस विषय पर शिक्षित करता है. यह निश्चित है कि पश्चिमी सभ्यता विरोध का पात्र इसलिए बनती है कि वह अनैतिक मानी जाती है. मुख्य रूप से अमरीकी नीतियां अपशब्द का पात्र बनती हैं. राष्ट्रपति जार्ज बुश के इस उत्तर ने तेजाबी कार्य किया जब उन्होंने इस प्रश्न का – वह हमसे घृणा क्यों करते हैं ? यह कहकर उत्तर दिया कि ‘’वे हमारी स्वतंत्रता से घृणा करते हैं, हमारी धार्मिक स्वतन्त्रता से, हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से, हमारी वोट देने की स्वतंत्रता से घृणा करते हैं. हम जो कुछ हैं उससे नहीं बल्कि हम जो कुछ करते हैं उससे घृणा करते हैं.’’

मिल्टन एडवर्ड ने अपनी पुस्तक में ऐतिहासिक पूर्व की बातों का बहुत थोड़ा सा वर्णन किया है इसमें वर्तनी और अरबी शब्दों की बहुत त्रुटियां हैं, इन सबके बावजूद इस्लामी कट्टरवाद का ठोस परिचय दिया है.

सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ कि मियां ब्लूम ने सैनिक आदर्श पर अधिक अच्छा लिखा है. उसने लिखा है कि पुराने काल में आत्मघाती हमले की तरकीब सफल रही. विशेष रूप से जापान की कमीकजे सैनिक विद्या का वर्णन किया है जो द्वितीय विश्व युद्ध में प्रयोग की गई थी. समकालीन क्षेत्र में उसने एक अध्याय में श्रीलंका तथा तुर्की के कुर्दिश क्षेत्र में आत्मघाती आतंकवाद का वर्णन किया है. इसी के साथ चेचिनिया, कोलम्बिया, लेबनान और उत्तरीय आयरलैण्ड का भी वर्णन है और यह भी वर्णित है कि हमले में यह रूप क्यों अपनाए गए हैं. आत्मघाती हमला अन्तिम हथियार है, यह समाज के स्वीकार करने पर आधारित तथा निर्भर है. यदि समाज इसे स्वीकार करता है तब इसे शत्रु को प्रभावित करने के लिए नहीं वरन् प्रचार के लिए भी प्रयुक्त किया जा सकता है. अधिकतर अध्याय में आत्मघातियों की प्रेरणा पर एक भाग अवश्य लिखा है. विशेष रूप से श्रीलंका पर लिखे अध्याय विश्लेषणात्मक से अधिक वर्णनात्मक हैं.

जोसलीन सिज़ारी की पुस्तक ‘’व्हेन इस्लाम एण्ड डेमोक्रेसी मीट’’ इस्लाम के विषय में अत्यन्त मनोरंजक अध्ययन है. सिज़री के अनुसार मुस्लिम समुदाय को अपने लिए अमरीकी समाज में स्थान बनाने में यूरोप के मुकाबले में कम समस्याओं  का सामना करना पड़ा. शरीयत की स्थानीय व्याख्या उस क्षेत्र के कानून से प्रभावित होती है. किन्तु कुछ मामलों में सरकारों ने इस्लाम को राज्य द्वारा मान्यता प्रधान धर्म माना है और कानूनी मामलों में शरीयत के कुछ तत्व भी स्वीकार किए हैं. इस उन्नत संचार व्यवस्था के युग में यह संभव है कि पश्चिमी क्षेत्रों में रहने वाले मुस्लिम अपने को वैश्विक उम्मा का भाग महसूस करें, प्रजातान्त्रिक, धर्म निरपेक्ष पश्चिम में एक उचित मुस्लिम जीवन व्यतीत करने के लिए किस चीज की आवश्यकता है, इसको आंकने के भी प्रयास जारी हैं. सिजारी ने कुछ समाज सुधारकों जैसे तारिक रमादान और खालिद अबू-अल-फदल का वर्णन किया है. आज के सुधारक तर्क द्वारा अवतरण की व्याख्या इसलिए करते हैं कि वह मुस्लिम जो विभिन्न समाजों में निवास कर रहे हों वे धर्म के आवश्यक तत्तों का पालन कर सकें.

सिज़ारी की पुस्तक यूरोप तथा अमरीका में बड़े चाव से पढ़ी जा रही हैं.

फहद् ज़कारिया की पुस्तक, जिसका अनुवाद इब्राहिम अबू रबी द्वारा किया गया, सादात की हत्या के बाद लिखी गई. इस पुस्तक में, जिसका नाम ‘मिथ एण्ड रियालिटी इन कन्टेम्परेरी इस्लामिक मूवमेंट’ है, धर्मनिरपेक्षता को इस्लामी राजनीति से श्रेष्ठ बताया गया है. ज़कारिया के बचाव के बावजूद धर्म निरपेक्षता ने मिस्र वासियों की आशाओं को पूर्ण नहीं किया. ज़कारिया की पुस्तक इस बात का प्रमाण है कि इस्लाम के मध्य पूर्व  में आज भी अनेक आलोचक हैं.

इसका भविष्य क्या होगा ? उपरोक्त वर्णित पुस्तकों के निष्कर्ष के आधार पर यह तर्क प्रस्तुत किया जा सकता है कि इस्लाम को उग्रवाद से दूर करने के लिए मुस्लिम विश्व में व्याप्त तीखी राजनीति को कम किया जाए. यह सभी पुस्तकें इस बात पर सहमत हैं कि इस्लाम की प्रकृति स्थानीय राजनीति और सामाजिक दशा पर निर्भर करती हैं. जितने कठोर यह क्षेत्र होंगे उतना ही इस्लाम उग्रवाद की ओर बढ़ेगा. जैसा कि जार्डन का उदाहरण प्रस्तुत करके मोअद्दल ने सुझाव दिया है, कि जितने इस्लामी गुटों को प्रतिवाद के प्रतीक के स्थान पर राजनैतिक वर्ग के रूप में कार्य करने का अवसर दिया जाएगा उतना ही वे व्यवहारिक हो जाएंगे. ‘’इस्लाम हल है’’, मुस्लिम ब्रदर्स का आदर्श और ज़कारिया द्वारा निन्दित एक नारा, समझ में आने वाले कार्यक्रम के रूप में काफी नहीं है. यह संभव है कि बुश शासन द्वारा प्रजातन्त्र की ओर बुलाना ही सही हो यदि वाशिंगटन ही नतीजे(परिणाम) को कुशलता पूर्वक घुमा देने के प्रयास से बचने की कोशिश करे.

(पुनर्लेखन : डॉ सोफ़िया अकिल, रीडर, इतिहास विभाग, क्राइस्ट चर्च कॉलेज, कानपुर एवं शोधार्थी शोध-मण्डल)

प्रस्तुत लेख ‘जर्नल ऑफ कन्टेम्पोरेरी हिस्ट्री’, वाल्यूम 42, संख्या 3, 2007, पृष्ठ  555-564 से साभार उद्धत. मूल लेख ‘रिव्यू आर्टिकिल :  द पॉलिटिक्स ऑफ इस्लाम’ शीर्षक से प्रकाशित.

 

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