रॉल्स का न्याय सिद्धान्त

राबर्ट एमडूर : 1950 व 1960 के दशक में यह शंका व्यक्त की जाने लगी कि ‘राजनीतिक सिद्धान्त’ विषय ही खत्म हो गया. इसैया बर्लिन ने 1961 में लिखा कि अमेरिका व इंग्लैण्ड में यह मान्यता होने लगी कि ‘राजनीतिक दर्शन’ की मृत्यु हो गई है. इसका मूल कारण यह था कि बीसवीं शताब्दी में ‘राजनीतिक-दर्शन’ में कोई गम्भीर रचना नहीं हुई. लेकिन 1971 में जॉन रॉल्स की पुस्तक ‘ए थ्योरी ऑफ जस्टिस’ ने इस धारणा को तोड़ा.

रॉल्स का सिद्धान्त : रॉल्स का उद्देश्य ऐसे सिद्धान्त विकसित करना था जो हमें समाज के मूल ढांचे को समझने में मदद करे. किस तरह से संविधान और समाज की प्रमुख संस्थाएं अधिकारों और कर्त्तव्यों का वितरण करती हैं? और किस तरह से सामाजिक सहयोग से होने वाले लाभ का वितरण किया जाता है? संविधान और ये संस्थाएं अनेक पदों का सृजन करती हैं और इन पदों पर आसीन लोगों की जीवन से भिन्न-भिन्न अपेक्षाएं होती हैं. सामाजिक-आर्थिक असमानताएं जीवन की अपेक्षाओं को नियन्त्रित करती हैं. अत: सामाजिक न्याय का सिद्धान्त इन असमानताओं पर ही सबसे पहले लागू होना चाहिये. रॉल्स चाहता है कि हम सोचें कि सामाजिक-संरचना के मूल सिद्धान्त के बारे में प्रारम्भिक सहमति क्या रही होगी. संविदा-सिद्धान्त की मान्यता है कि समाज न्याय के प्रारम्भिक सिद्धान्तों को तय कर सकता है, अथवा, यह कि लगभग समानता की स्थिति में विवेकपूर्ण और स्वहितकारी लोग अपने लिये कुछ सिद्धान्तों की रचना कर सकेंगे. रॉल्स चाहता है कि हम उस मीटिंग की कल्पना करें जहां सामाजिक सहयोग के आधार पर लोगों के उन सिद्धान्तों की रचना की होगी जिनके आधार पर अधिकारों और कर्त्तव्यों का वितरण किया जाना चाहिये और सामाजिक लाभ का विभाजन किया जाना चाहिये. रॉल्स के अनुसार वास्तव में ऐसी कोई मीटिंग न  तो हुई, न ही उसकी कोई आवश्यकता ही थी; यह एक परिकल्पना मात्र है जो केवल इस बात का एहसास दिलाना चाहती है कि किसी भी न्यायपूर्ण समाज में आधारभूत सिद्धान्तों की रचना कैसे की जानी चाहिये.

रॉल्स के तर्कों को दो भागों में बांटा जा सकता है. प्रथम, वह उन परिस्थितियों का निर्माण करता है जो एक न्यायपूर्ण सहमति के लिये आवश्यक है; द्वितीय, वह यह बताने की कोशिश करता है कि इन परिस्थितियों में विवेकपूर्ण लोग अपनी बुद्धि का प्रयोग करके कुछ निश्चित सिद्धान्तों पर अवश्य पहुंच जायेंगे. मूल समझौता करने वालों का ‘उपलब्ध ज्ञान’ एक प्रमुख परिस्थिति है. वे जानते हैं कि वे एक अभावग्रस्त समाज के लिये सिद्धान्तों की रचना कर रहे हैं, जहां सबकी आवश्यकताएं व रुचियां तो लगभग एक सी हैं, पर जीवन के प्रति दृष्टिकोण अलग-अलग हैं. इससे उनके उद्देश्य व लक्ष्य भिन्न-भिन्न हो जाते हैं जिससे वे प्राकृतिक एवम् सामाजिक संसाधनों पर परस्पर विरोधी दावे करने लगते हैं. वे यह भी जानते हैं कि उनकी पारस्परिक विपरीत रुचियों के साथ-साथ उनके दार्शनिक व धार्मिक विश्वास तथा राजनीतिक व सामाजिक सिद्धान्त भी अलग-अलग हैं. इसके अलावा वे राजनीतिक घटनाओं, आर्थिक सिद्धान्तों, सामाजिक-संरचना के आधारों और मानव-मनोविज्ञान के सिद्धान्तों को भी जानते हैं. लेकिन स्वयं अपने बारे में वे कुछ नहीं जानते और रॉल्स चाहता है कि वे इसी ‘अज्ञानता के पर्दे’ में रहकर अपने निर्णय लें. उन्हें उनकी नैसर्गिक क्षमताओं व योग्यताओं, सामाजिक स्थिति, पसन्द तथा प्राथमिकताओं अथवा जीवन की भावी योजना के बारे में कुछ भी नहीं बताया जायेगा. ‘अज्ञानता के पर्दे’  में रहकर निर्णय लेना रॉल्स को अन्य संविदावादियों से अलग करता है. इससे उनकी नैतिकता को प्रभावित किये बिना उन्हें वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष निर्णय लेने के लिये सम्यक् परिस्थिति प्रदान की जा सकेगी. इससे कोई अपने हित को ध्यान में रखकर निर्णय न ले सकेगा. क्योंकि किसी को पता ही नहीं कि उन निर्णयों से उसका हित कैसे प्रभावित होगा.

लेकिन यदि लोगों को अपनी योजनाओं या इच्छाओं का पता ही नहीं तो वे किस आधार पर निर्णय लेंगे? इसका समाधान करने के लिये रॉल्स ‘प्राथमिक-सामाजिक-वस्तुओं’ की अवधारणा का प्रतिपादन करता है. इन वस्तुओं की आवश्यकता प्रत्येक विवेकशील प्राणी को रहती है. इन्हें प्राप्त कर वे अपनी वांछित योजनाओं व इच्छाओं को सफलतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं. इन्हें रॉल्स अधिकारों, स्वतन्त्रताओं, अवसरों, सम्पत्ति, आय व आत्म-सम्मान के रूप में व्यक्त करता है जिनके द्वारा वे अपनी जीवन-योजनाओं को व्यावहारिक स्वरूप देते हैं. लेकिन इन सबमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण ‘आत्म-सम्मान’ ही है, उसके बिना अन्य ‘सामाजिक-वस्तुएं’ बेकार हैं. मूल-संविदावादियों में एक दूसरे के प्रति न तो दया न ही द्वेष का भाव था, वे एक दूसरे के प्रति उदासीन थे. किसी भी स्थिति में वे केवल स्वयं या अपने उत्तराधिकारियों के लिये ही अधिकतम ‘सामाजिक-वस्तुएं’ जुटाना चाहते हैं. इसके अलावा उनकी रुचि केवल उन सिद्धान्तों का चयन करने में है जो एक स्थायी समाज को जन्म दे सकें. वे सिद्धान्त इतने औचित्यपूर्ण होने चाहिये जिससे व्यक्तियों के जीवन में तनाव न आये तथा जो समाज के विखण्डन का कारण न बनें.

इसलिये रॉल्स चाहता है कि मूल-संविदावादी निम्न दो सिद्धान्तों पर सहमत हों-

(क) मूलभूत समान-स्वतन्त्रता के व्यापकतम संसार में प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे समान अधिकार प्राप्त हों जो दूसरों के ऐसे ही समान अधिकारों के अनुरूप हों;

(ख) सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को इस प्रकार विन्यासित किया जाय कि (i) उससे सबसे कमज़ोर वर्ग को सर्वाधिक लाभ मिले तथा (ii) उन्हें अवसरों की उचित समानता के सिद्धान्त के अन्तर्गत सभी को उपलब्ध पदों से सम्बद्ध किया जा सके.

प्रथम सिद्धान्त में उल्लिखित मूल-स्वतन्त्रताओं से रॉल्स का आशय ‘नागरिकता की स्वतन्त्रताओं’ से है. इनमें राजनीतिक स्वतन्त्रता (अर्थात् मत देने और निर्वाचित होने की स्वतन्त्रता), भाषण व सभा करने की स्वतन्त्रता और मनमाने ढंग से बन्दी बनाने या समान जब्त करने के विरुद्ध स्वतन्त्रताएं सम्मिलित हैं. पर, उनमें आर्थिक स्वतन्त्रताएं (जैसे उत्पादन के साधनों का स्वामित्व, संविदा की स्वतन्त्रता, अथवा वंशानुक्रम के आधार पर सम्पत्ति का अधिग्रहण अथवा आबंटन आदि) सम्मिलित नहीं है. जबकि अनेक विद्वान – मिल्टन फ्रीडमैन, एफ. ए. हायक व रॉबर्ट नॉज़िक – मानते हैं कि आर्थिक स्वतन्त्रताएं भी रॉल्स की ‘मूल-स्वतन्त्रताओं’ जैसा ही महत्वपूर्ण हैं.

प्रथम सिद्धान्त के अनुसार मूल-स्वतन्त्रताएं समान और व्यापकतम होनी चाहिये. रॉल्स के दूसरे ‘विभिन्नता के सिद्धान्त’ का प्रथम अंश सम्पत्ति और शक्ति के समान वितरण की मांग तो नहीं करता, लेकिन वह यह जरूर चाहता है कि सभी असमानताएं कमजोर वर्गों को सर्वाधिक लाभ पहुंचाएं. रॉल्स  चाहता है कि इन असमानताओं के रहते ऐसे वर्गों की ‘ट्रेनिंग का खऱ्चा उठाया जाए’ या ऐसे लाभ दिये जायें जिससे इन वर्गों के प्रयास और ज्यादा उत्पादकतापूर्ण हो सकें. प्राकृतिक गुणों से सम्पन्न लोगों को प्रेरित किया जाय कि वे अपनी योग्यताओं का प्रयोग ऐसे वर्गों के उत्थान हेतु करें. असमानताओं को न्यायोचित ठहराने के लिये जरूरी है कि वे सबसे निचले वर्ग की अपेक्षाओं को अधिक से अधिक पूरा करें.

रॉल्स के सिद्धान्तों पर आधारित समाज का सबसे मज़बूत प्रतिस्पर्धी उपयोगितावादी समाज है पर उपयोगितावादी समाज में सर्वाधिक कमजोर वर्ग को ‘अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख’ के लिये न्यौछावर होना पड़ सकता है. इससे इस वर्ग के लोगों के आत्म-सम्मान को ठेस लगेगी और यदि उन्हें ऐसा लगने लगा कि वे ‘अधिकतम लोगों’ के सुख के लिये साधन मात्र होकर रह गये हैं तो वे न केवल आहत महसूस करेंगे, वरन् उनमें प्रतिशोध की ज्वालाभी भड़क सकती है. ऐसा समाज अस्थायी होगा, पर रॉल्स द्वारा प्रतिपादित समाज में इसकी संभावना नहीं रहती; वहां सर्वाधिक कमजोर वर्ग का आत्म-सम्मान सुरक्षित रहता है और उसकी इच्छाएं पूरी होती हैं जिससे समाज स्थायी होता है.

यदि रॉल्स के प्रथम व द्वितीय सिद्धान्तों में टकराव हो जाये तो क्या होगा? जब समाज में सम्पन्नता का एक न्यूनतम-स्तर प्राप्त हो जाये, तो रॉल्स के अनुसार प्रथम सिद्धान्त को ही वरीयता दी जायेगी. इसका अर्थ यह है कि सम्पत्ति और सत्ता की असमानता को ऐसे विन्यासित किया जायेगा कि वह प्रथम सिद्धान्त के अन्तर्गत वांछित समान स्वतन्त्रता के अनुरूप हो. लेकिन जब समाज सम्पन्नता का वांछित स्तर भी प्राप्त कर ले तब भी उन लोगों को अपनी अधिक से अधिक समान स्वतन्त्रताओं को बनाये रखना होगा जो समाज से सामाजिक और आर्थिक लाभ प्राप्त कर रहे हैं. प्रथम सिद्धान्त को द्वितीय सिद्धान्त की तुलना में वरीयता देने का कारण यह है कि ‘सम्पन्नता’ के एक स्तर के नीचे लोग अपनी स्वतन्त्रता का प्रभावी प्रयोग नहीं कर सकते. लेकिन वह स्तर प्राप्त करने के बाद लोग सामाजिक व आर्थिक वस्तुओं की तुलना में स्वतन्त्रता को ही महत्व देते हैं. वे आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक अभिरुचियों और राजनीतिक सहभागिता को महत्व देने लगते हैं. ‘स्वतन्त्रता’ न केवल इन्हें वरन् आत्म-सम्मान को भी प्राप्त करने में मदद करती है.

न्यायपूर्ण समाज : रॉल्स के सिद्धान्त के राजनीतिक व सामाजिक निहितार्थ क्या हैं? उसके दोनों सिद्धान्तों से कैसे समाज की परिकल्पना होती है? रॉल्स का प्रथम सिद्धान्त एक ऐसे संवैधानिक लोकतन्त्र की परिकल्पना करता है जिसमें राजनीतिक और बौद्धिक स्वतन्त्रता होगी तथा समतामूलक समाज होगा. अनेक आलोचक उसके विचारों को असमानता का समर्थन करने वाला मानते हैं, लेकिन बाज़ार-अर्थव्यवस्था का समर्थक होने के बावजूद रॉल्स असमानता को सीमित रखने के लिये राज्य के हस्तक्षेप की वकालत करता है. इसी हस्तक्षेप में अनेक सामाजिक सुधारों की संभावना छिपी है. रॉल्स जिस समाज की परिकल्पना करता है उसमें राजनीतिक प्रक्रिया में सभी को समान हिस्सेदारी मिलेगी, सभी लोग राजनीतिक दलों के सदस्य हो सकेंगे, चुनाव लड़ सकेंगे, उच्च पदों पर आसीन हो सकेंगे और सबके मत का मूल्य बराबर होगा. ऐसा होने से जो कानून बनेंगे वे न्यायपूर्ण तथा प्रभावी होंगे. उस समाज में चिन्तन, वाद-विवाद और अन्तरात्मा की स्वतन्त्रता होगी. ये स्वतन्त्रता जिन हितों को सुरक्षित करती हैं वे आर्थिक व सामाजिक सुविधाओं से कहीं ज्यादा जरूरी हैं. पर ये स्वतन्त्रताएं निरंकुश नहीं; उन पर दो प्रकार के अंकुश रखे जा सकेंगे- (1) समाज की सम्पूर्ण स्वतन्त्रता – व्यवस्था को और पुष्ट करने के लिये, (2) समाज को सम्पन्नता के उस वांछित स्तर तक ले जाने के लिये, जहां स्वतंत्रता का समुचित प्रयोग हो पाता है- जैसे समाज में शांति-व्यवस्था और सुरक्षा के लिये अथवा आर्थिक रूप से पिछड़े समाजों में उच्च आर्थिक विकास के लिये ऐसे प्रतिबन्ध लगाये जा सकते हैं. यद्यपि यह प्रतिबन्ध महत्वहीन नहीं है, फिर भी रॉल्स की मूल मान्यता यही है कि राज्य व्यक्ति की मूल-स्वतन्त्रताओं में हस्तक्षेप नहीं करेगा.

रॉल्स के दूसरे सिद्धान्त (सम्पत्ति व आय के वितरम के सम्बन्ध में) के निहितार्थ कम स्पष्ट हैं. रॉल्स बाज़ार-अर्थव्यवस्था को दक्षता के लिये उपयोगी तो मानता है, लेकिन वह राज्य को बाज़ार में हस्तक्षेप का व्यापक अधिकार भी देता है. इसका कारण यह है कि मूल संविदावादी बाज़ार की अस्थिरता व उसमें आने वाले खतरों से बचना चाहते थे. बाज़ार व्यक्ति की आय को नियन्त्रित करता है, लेकिन राज्य सबसे गरीब लोगों को कुछ धन देकर उनकी दीर्घकालीन अपेक्षाओं को संभव बनाता है. राज्य यह धन टैक्स के माध्यम से एकत्र करता है. ऐसे गरीबों को बहुत ज्यादा लाभ देने से भी उनकी स्थिति में कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता है. रॉल्स के आलोचक इससे सहमत नहीं है. संभवत: वे यह नहीं देख पाते कि असमानता को नियंत्रित करने के लिये रॉल्स दो तत्वों – स्वतन्त्रता का एक न्यायोचित स्तर, और आत्म-सम्मान पर बल देता है. स्वतंत्रता के न्यायोचित स्तर को बनाये रखने के लिये वह राजनीति और राजनीतिक परिचर्चा पर धनिकों के प्रभाव को नियंत्रित करना चाहता है. हालांकि रॉल्स यह नहीं बताता कि समाज को किस सीमा तक समानता की ओर जाना चाहिये जिससे स्वतन्त्रता अक्षुण्य रह सके. लेकिन ‘आत्म-सम्मान’ को रॉल्स हर कीमत पर बनाये रखना चाहता है. इसके लिये वह मानता है कि समाज अपने सदस्यों का आत्म-सम्मान बनाये रखने के लिये उन्हें समान स्वतन्त्रता दे, भले ही उसे अन्य प्राथमिक वस्तुएं देने  में विभिन्नता का सिद्धान्त अपनाना पड़े. हालांकि लोगों को अपने पदों और अपनी आय के अनुरूप भी अपने आत्म-सम्मान को देखना आता है. यदि समाज के वंचितों की सम्पत्ति और धन बढ़ भी जाय तो भी वे अन्य गंभीर असमानताओं के चलते स्वयं को ‘तुलनात्मक-वंचना’ का शिकार मानेंगे. अत: सरकार को मान्य सामाजिक असमानताओं का निर्धारण करने में इसका ध्यान रखना पड़ेगा और उन असमानताओं को दूर करना पड़ेगा जिससे निचले तबके के लोगों में आत्म-सम्मान घटता है. वैसे तो आत्म-सम्मान का वस्तुनिष्ठ आंकलन संभव नहीं, फिर भी उन असमानताओं को अवश्य चिन्हित किया जा सकता है जिससे सबसे निचले तबके के लोगों का आत्म-सम्मान आहत होता हो. रॉल्स उन सभी प्रतिबन्धों का समर्थन करता है जिससे एक ‘न्यायपूर्ण-समान-स्वतंत्रता’ तथा ‘सबसे निचले तबके के आत्म-सम्मान’ की रक्षा ही जा सके.

रॉल्स के सिद्धान्त का एक और पहलू है : न्यायपूर्ण समाज की परिकल्पना करने के बाद भी यह जानना जरूरी है कि वर्तमान समाज के अन्याय से कैसे निपटा जाये (चाहे वह अन्याय सामाजिक संरचना में दिखे या व्यक्तियों के व्वहार में). इन ‘गैर-आदर्श परिस्थितियों’ से निपटने के लिये क्या सिद्धान्त हों? दण्ड, अनुपूरक – न्याय (कम्पेन्सेटरी जस्टिस) और अन्यायी सत्ता के विरोध के सम्बन्ध में कैसी व्यवस्थाएं होनी चाहिये ? रॉल्स मूल संविदावादियों से अपेक्षा करता है कि वे ‘न्याय हेतु प्राकृतिक कर्त्तव्य’ के सिद्धान्त पर सहमत होंगे. इसके अनुसार वे न्यायपूर्ण संस्थाओं का समर्थन करेंगे; जहां ऐसी संस्थाएं नहीं हैं वहां उन्हें स्थापित कर अन्याय को समाप्त करने का प्रयास करेंगे. इसके लिये वे (काफी हद तक) न्याय पर आधारित समाज में ‘सविनय-अवज्ञा’ का सहारा लेंगे जो शक्ति-प्रदर्शन के लिये नहीं, वरन् बहुसंख्यकों के न्यायबोध को जागृत करने का प्रयास करेगा और उन्हें बताएगा कि स्वतन्त्र व समान लोगों में ‘सामाजिक सहयोग के सिद्धान्त’ का पालन नहीं हो रहा है. सविनय अवज्ञा सार्वजनिक व अहिंसक होगी और यदि उन्हें इसके लिये दण्ड दिया जायेगा तो वे उसे इसलिये नहीं स्वीकार करेंगे कि वे उसके भागी हैं, वरन् इसलिये कि वे दिखाना चाहते हैं कि वे समाज के मूल ढांच को न्यायपूर्ण मानते  और उनका विरोध कानून के दायरे में ही है. कुछ आलोचक रॉल्स पर यह आरोप लगाते हैं कि उसने विरोध के अन्य गंभीर तरीकों की उपेक्षा की है. पर वे शायद नहीं जानते कि रॉल्स सविनय-अवज्ञा को केवल उन्हीं समाजों के लिये उचित मानता है जो न्याय के काफी निकट हों. पूर्णत अन्याय पर आधारित समाजों में तो वह विरोध के अन्य तरीकों, यहां तक कि हिंसा को भी औचित्यपूर्ण ठहराता है.

अन्तर्राष्ट्रीय समाज: रॉल्स विभिन्न समाजों के आपसी सम्बन्धों पर ज्यादा कुछ नहीं कहता. लेकिन यह जरूर कहता है कि मूल संविदावादियों को विभिन्न समाजों के प्रतिनिधि के रूप में भी देखा जा सकता है जो आपसी विवादों को हल करने के लिये कुछ मूल सिद्धान्तों का चयन करेंगे. यद्यपि वह किसी सिद्धान्त की वकालत नहीं करता लेकिन उन सिद्धान्तों के उदाहरण देता है जिन्हें वह समझता है कि मूल संविदावादियों द्वारा विभिन्न समाजों के सम्बन्धों का संचालन करने के लिये अपनाया गया होगा. ये मूलत: ‘न्यायपूर्ण युद्ध के सिद्धान्त’ के उदाहरण हैं जिनमें आत्म-निर्णय, आत्म-रक्षा और सन्धियों का पालन करने के सिद्धान्त हैं. वह कुछ प्रकार की हिंसा जैसे नाभिकीय या आतंकवादी हमले को न्यायपूर्ण युद्ध की परिभाषा के बाहर रखता है.

रॉल्स विभिन्न समाजों के मध्य सम्पत्ति के वितरण के बारे में कुछ नहीं कहता, वरन् अपना पूरा ध्यान समाज के अन्दर सम्पत्ति के वितरण पर लगाता है. यथापि वह मानता है कि विभिन्न समाजों के मध्य ‘वितरणात्मक न्याय’ का प्रश्न उठता है, अत: रॉल्स यह भी कहता है कि समाज में आन्तरिक पुनर्वितरण के बाद बाह्य पुनर्वितरण पर भी ध्यान देना होगा. विभिन्न विद्वानों का मानना है कि मूल अन्तर्राष्ट्रीय संविदावादी विभिन्नता के सिद्धान्त को मान्यता देंगे लेकिन वे केवल उन्हीं असमानताओं को स्वीकार करेंगे जिससे विश्व में सबसे गरीब देशों की महत्वकांक्षाएं पूरी हो सकें.

रॉल्स यह मानता है कि कोई सम्पन्न देश आन्तरिक रूप से न्यायपूर्ण हो सकता है. पर हो सकता है, वह अन्य राज्यों के सापेक्ष अन्यायी हो. अत: न्याय की मांग है कि ऐसे राज्य में मुद्रा व व्यापार सम्बन्धी सुधार हों, ऋणों को माफ किया जाए. और विकास के लिये अनुदान दिया जाये- अर्थात् धनी देशों द्वारा गरीब देशों के पक्ष में सम्पत्ति का पुनर्वितरण हो. इस तरह, ‘भिन्नता का सिद्धान्त’ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इसी मान्यता पर खड़ा है कि उससे गरीबों की भावी अपेक्षाएं पूरी होंगी. अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर रॉल्स गरीब देशों को अहिंसात्मक तरीके से सम्पत्ति के पुनर्वितरण का सुझाव देता है, पर यह भी कहता है कि इसकी असफलता पर इसे लागू करने के लिये लड़ा गया युद्ध अन्यायपूर्ण नहीं माना जायेगा – हालांकि वह आतंकवाद या परमाणु युद्ध को इसके लिये अनुचित मानता है.

गरीब देशों के अधिकार धनी देशों के कर्त्तव्य की मांग करते हैं; धनी देशों का कर्त्तव्य है कि वे अपने देश में ऐसे नेताओ व नीतियों का समर्थन करें जिससे समतामूलक अन्तर्राष्ट्रीय समाज की स्थापना हो सके. पर आन्तरिक व अन्तर्राष्ट्रीय पुनर्वितरण में अन्तर है. अन्तर्राष्ट्रीय पुनर्वितरण में गरीब देशों के सरकारों की प्रमुख भूमिका होनी चाहिये, लेकिन यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि जो धन उन्हें प्राप्त हो उसका आन्तरिक वितरण इस ढंग से किया जाय कि सबसे गरीब तबके को उसका लाभ मिल सके. संभवत: एक ‘विश्व-सरकार’ ही यह सुनिश्चित कर सकती है कि विभिन्न सरकारें उस धन का प्रयोग ‘वैश्विक-भिन्नता’ के सिद्धान्त के आधार पर करें. जब तक ऐसा नहीं हो पाता तब तक धनी देश गरीब देशों पर यह दबाव बनाने के लिये स्वतन्त्र हैं कि वे उस धन का प्रयोग ‘सर्वाधिक गरीब लोगों’ की भावी अपेक्षाओं को पूरा करने में करें. ऐसा न करने वाले राज्यों के विरुद्ध हस्तक्षेप भी किया जा सकता है यद्यपि इसे वे राज्य अपनी संप्रभुता के उल्लंघन के रूप में देख सकते हैं. अनेक लोग यह भी महसूस करते हैं कि अन्य समाज के लोगों के प्रति उनकी प्रतिबद्धताएं उतनी मज़बूत नहीं जितनी अपने समाज के लोगों के प्रति. अत: यदि मूल अन्तर्राष्ट्रीय संविदावादी ‘वैश्विक-भिन्नता’ के सिद्धान्त को न भी अपना सकें तो भी वे कम से कम ‘पारस्परिक सहायता के कर्त्तव्य’ सिद्धान्त पर तो सहमत हो ही सकते हैं. इस सिद्धान्त के अनुसार दूसरे के खतरे में होने पर हमें उसकी मदद करना होगा जब तक कि स्वयं हमें अपने ऊपर बहुत बड़ा संकट न लगे या हानि की संभावना न हो.

आलोचना : रॉल्स के सिद्धान्त की आलोचना कई स्तर पर की जाती है –

  1. जॉन हरसान्यी के अनुसार इस बात की संभावना कम है कि रॉल्स के दोनों सिद्धान्तों को मूल संविदावादी स्वीकार करेंगे. उसका तर्क है कि मूल संविदावादियों द्वारा इस बात की उपेक्षा कैसे की जा सकती है कि अज्ञानता का पर्दा उठने कैसे की जा सकती है कि अज्ञानता का पर्दा उठने पर वे अपने को विभिन्न सामाजिक अस्थितियों में पायेंगे और यदि ऐसा हुआ तो वे केवल उपयोगितावादी सिद्धान्तों तक ही जा पायेंगे, रॉल्स के सिद्धान्तों तक नहीं.
  2. ब्रियान बैरी जैसे आलोचक यह तो मानते हैं कि मूल स्थिति में संविदावादी रॉल्स के सिद्धान्तों को स्वीकार कर सकेंगे, पर ऐसा रॉल्स की मूल मान्यताओं का उल्लंघन करके ही किया जा सकता है. फिर, रॉल्स उन सिद्धान्तों तक पहुंचने के लिये जिन परिस्थितियों व शर्तों की परिकल्पना करता है, वे संभव नहीं.
  3. ब्रियान बैरी के अनुसार, रॉल्स अपने सिद्धान्तों के प्रतिपादन में जिन तथ्यों और नियमों पर विश्वास करता है वे संदेहास्पद हैं. उदाहरण के लिये, रॉल्स की मान्यता है कि लोग ‘अन्य सामजिक वस्तुओं’ की तुलना में स्वतन्त्रता को महत्व देते हैं, सही नहीं है. कुछ अन्य आलोचक मानते हैं कि रॉल्स ने अनेक मान्य नियमों की उपेक्षा करके मूल संविदावादियों से जिन सिद्धान्तों पर सहमति बनवाई, उसका स्वरूप दूसरा होता यदि उसने उन नियमों की उपेक्षा न की होती.
  4. रॉल्स के ‘प्राथमिक वस्तुओं’ की अवधारणा की भी आलोचना हुई है. आलोचकों का प्रश्न है कि क्या विभिन्न सांस्कृतिक समाजों में इन ‘प्राथमिक वस्तुओं’ का अर्थ एक समान होता है? क्या सम्पत्ति, आय, स्वतन्त्रता और अवसर प्रत्येक समाज में उतने ही महत्वपूर्ण हैं? माइकल टिटेलमैन के अनुसार विभिन्न समाजों में लोगों की आवश्यकताएं व प्राथमिकताएं काफी अलग-अलग हैं. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने पर यह और भी स्पष्ट हो जाता है (जैसे सम्पत्ति हर देश-काल में समान महत्व की नहीं रही). टामस नगेल के अनुसार रॉल्स जिन वस्तुओं पर बल देता है वे वैयक्तिक-विकासोन्मुखी हैं, सामुदायिक-विकासोन्मुखी नहीं.

पुनर्लेखन – सम्पादक एवम् शोधार्थी शोध-मण्डल

प्रस्तुत लेख ‘वर्ल्ड पॉलिटिक्स’, वाल्यूम 29, नवम्बर 3, अप्रैल 1977, पृष्ठ 483-461 से साभार उद्धृत. मूल लेख ‘रॉल्स थ्योरी ऑफ जस्टिस : डोमेस्टिक एण्ड इण्टरनेशनल पर्सपेक्टिव’ शीर्षक से प्रकाशित. 

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  37. Absolutely NEW update of captcha regignizing package “XRumer 16.0 + XEvil”:
    captchas solving of Google (ReCaptcha-2 and ReCaptcha-3), Facebook, BitFinex, Bing, Hotmail, SolveMedia, Yandex,
    and more than 8400 another subtypes of captchas,
    with highest precision (80..100%) and highest speed (100 img per second).
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  38. Incredible update of captcha regignizing software “XRumer 16.0 + XEvil 4.0”:
    captchas solving of Google (ReCaptcha-2 and ReCaptcha-3), Facebook, BitFinex, Bing, Hotmail, SolveMedia, Yandex,
    and more than 8400 another types of captcha,
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  39. Perfect update of captchas breaking software “XRumer 16.0 + XEvil”:
    captcha breaking of Google (ReCaptcha-2 and ReCaptcha-3), Facebook, BitFinex, Bing, Hotmail, SolveMedia, Yandex,
    and more than 8400 another categories of captcha,
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  40. Perfect update of captchas solution software “XEvil 4.0”:
    captcha solving of Google (ReCaptcha-2 and ReCaptcha-3), Facebook, BitFinex, Bing, Hotmail, SolveMedia, Yandex,
    and more than 8400 another types of captcha,
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  41. Incredible update of captcha recognition package “XRumer 16.0 + XEvil”:
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    captcha solving of Google (ReCaptcha-2 and ReCaptcha-3), Facebook, BitFinex, Bing, Hotmail, SolveMedia, Yandex,
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