भारत-नेपाल सम्बन्ध : पड़ोसी के सरोकार

एस. डी. मुनि : सुरक्षा और प्रजातंत्र के बीच का चयन हमेशा हमेशा ही भारतत की नेपाल नीति की दुविधा रही है. यह उस समय और भी जटिल और पैना हो गया जब 1 फरवरी, 2005 को महाराज ज्ञानेन्द्र ने सत्ता परिवर्तन में शक्ति को सीधा अपने हाथों में लेकर राजनीतिक दलों का दमन आरम्भ कर दिया. ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था. नेपाल के वर्षों पुराने माओवादी संघर्ष तथा महाराज की इस कार्यवाही ने भारत और अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को इसके लिये बाध्य किया कि वे महाराज और माओवादियों में से किसी एक को चुनें क्योंकि महाराज के अनुसार प्रजातांत्रिक व्यवस्था और राजनीतिक दल माओवादियों द्वारा प्रस्तुत सुरक्षा चुनौतियों का समाना नहीं कर सकते हैं.

नेपाल में प्रजातंत्र के पक्ष में भारत की प्रतिक्रिया तुरन्त और तीखी थी. फरवरी 1 के बाद भारत के प्रधानमंत्री, विदेश मंत्रालय एवं अधिकारियों के वक्तव्य स्पष्ट और सुनिश्चित थे. औपचारिक घोषणाओं से हटकर भारत ने 4-5 फरवरी को ढाका में होने वाले दक्षेस सम्मेलन में भाग लेने से मना कर दिया, क्योंकि नेपाल में प्रजातंत्र विरोधी कार्यवाही के लिये इस अवसर पर दुरुपयोग महाराजा ज्ञानेन्द्र कर सकते थे. नेपाल महाराजा के दो संदेशवाहक यथा उनके सहायक शरद शाह और उनके विदेशमंत्री रमेश घाड़े को खाली हाथ लौटा दिया गया और भारत ने अपनी सुरक्षा सामग्री की आपूर्ति को रोक दिया. भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय को अपने पक्ष में कर यह आग्रह किया कि महाराजा अपनी कार्यवाही को वापस लें तथा राजनीतिक दलों और प्रजातंत्रीय व्यवस्था के लिये अर्थपूर्ण भूमिका सुनिश्चित करें.

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माओवादियों द्वारा प्रस्तुत सुरक्षा चुनौतियों को लेकर नेपाल की चिन्ताओं में भारत साझेदार रहा है किन्तु नेपाल ने उनसे निपटने के लिये जो तर्क दिये हैं उन्हें वह स्वीकार नहीं करता. नेपाल की शाही सेना ही वहां केवल मात्र उपलब्ध साधन हैं जिससे माओवादी हिंसा से निपटा जा सकता है. यह महाराजा की स्वामिभक्त और उन्हीं के नियंत्रण में रही है. 2001 के बाद जबकि उसे माओवादी हिंसा के विरुद्ध कार्यवाही के लिये लगाया गया है तबसे उसकी प्रतिष्ठा और दक्षता में वृद्धि नहीं हुई है. फरवरी में सत्ता परिवर्तन के बाद शाही सेना काठमाण्डू की घेराबन्दी तोड़ने में भी असफल रही. काठमाण्डू को अत्यधिक सुरक्षा प्रदान की गई. फिर भी शाही सेना आंशिक रूप से ही काठमाण्डू से अन्य स्थानों के लिये सड़क सामान्य करवा सकी. इसलिये माओवादियों से निपटने में अक्षमता का आरोप राजनीतिक दलों पर लगाना ठीक नहीं लगता.

राजनीतिक दलों पर अक्षमता, भ्रष्टाचार और शक्ति प्रतिस्पर्धा के आरोपों से इन्कार नहीं किया जा सकता है. किन्तु नेपाली सम्बन्धों के पर्यवेक्षक इससे भी भलीभांति परिचित हैं कि राज प्रासाद से जुड़ी व्यवस्थाओं ने राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को बांटा और भ्रष्ट भी किया है. 2002 अक्टूबर से तो महाराजा ने उन्हीं लोगों को प्रधानमंत्री पद के लिये चुना जिनसे किसी भी तरह का कार्य आसानी से करवाया जा सकता था. महाराजा द्वारा कियागया सत्ता परिवर्तन तो उन्हीं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा और शाही सेना को अनिंयत्रित शक्ति बिना किसी उत्तरदायित्व के देने का परिणाम था.  प्रजातांत्रिक व्यवस्था और राजनीतिक दल तो इन आकांक्षाओं के लिये स्वीकृति प्राप्त करने का बहाना मात्र थी.

कोई कारण नहीं था कि भारत या कोई भी अन्य देश महाराजा को उनसे इस सत्ता हथियाने के प्रयास में कृतार्थ करता, ऐसी स्थिति में जबकि महाराजा ने नेपाल में सुरक्षा की स्थितियों को और भी जटिल बना दिया था. माओवादियों के विरुद्ध परिणाम दिखाने के दबाव में शाही सेना ने ग्रामीण क्षेत्रों में निष्ठुर हिंसा की जिसमें निर्दोष लोगों को माओवादी बतलाकर मार दिया गया. प्रेस के कठोर नियमों के कारण शाही सेना की कार्यवाहियों का कोई आधिकारिक और स्वतंत्र ब्यौरा उपलब्ध नहीं है. राष्ट्रीय मानवाधिकार और अन्य अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार समूहों को संघर्ष क्षेत्र तक पहुंचने की अनुमति नहीं थी. वर्दीधारी सैनिकों के अलावा भी अन्य सुरक्षा समूहों को भी माओवादी प्रभाव क्षेत्रों में लूटपाट, हिंसा और लोगों को मारने की छूट रही.

कपिलवस्तु, में लगभग 3000 घर जला दिये गये और लगभग 2500 परिवार बेघरबार हो गये. एशिया मानव अधिकार आयोग ने इन घटनाओं पर अपनी गहरी चिन्ता व्यक्त की और अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय से इन घटनाओं को रोकने के लिये आगे आने की मांग की. इस लगातार जारी हिंसा के दूरगामी गम्भीर परिणाम होंगे जिससे इन हिंसा ग्रस्त क्षेत्रों में सामाजिक समाधान के अवसर और कम हो जायेंगे. इस हिंसा के कारण नैपालियों के पलायन और सीमाक्षेत्र पर बढ़ी माओवादी गतिविधियों के कारण भारत को उनक सामना करना पड़ेगा. यह अस्थिरता नेपाल के लिये महंगी होगी.

महाराजा को विनाश के इस मार्ग को छोड़ने के लिये बाध्य तब ही किया जा सकता है जबकि भारत अपनी प्रजातंत्र के लिये प्राथमिकता पर दृढ़ रहे. भारत के निश्चय को तोड़ने के लिये महाराजा कई तरीकों का प्रयोग कर सकते हैं जिनमें हिन्दू समर्थक और भारत की राजनीति में पूर्व महाराजाओं के समूह का उपयोग नई दिल्ली को अपने प्रति सह्रदय बनाने के लिये किया जा सकता है. साथ ही साथ, वे नेपाली राष्ट्रवाद को भारत विरोधी दृष्टिकोण पर भी संगठित कर सकते हैं. इसका उपयोग नेपाल के राजाओं ने तब-तब किया जब उनके अस्तित्व पर संकट आया. वे अपना अन्तर्राष्ट्रीय अलगाव तोड़ने के लिये पाकिस्तान और चीन के साथ संबंधों को बढ़ा रहे हैं. पाकिस्तान ने नेपाल के महाराजा को समर्थन देने की बात कही है और शाही सेना को प्रशिक्षण और सैन्य सामग्री देने की उत्सुकता प्रकट की है.

पाकिस्तान और चीन से महाराज के बढ़ते सम्बन्धों से भारत को आतंकित नहीं होना चाहिये. ये दोनों देश भारत और अन्य अन्तर्राष्ट्रीय समुदायों द्वारा नेपाल को दिये गये समर्थन का स्थायी विकल्प नहीं हैं. चीन को राजनयिक सूत्रों द्वारा इस बात के लिये तैयार किया जाना चाहिये कि वह एक निरंकुश तानाशाह का समर्थन तेजी से विकसित हो रहे रचनात्मक भारत-चीन सम्पर्कों की कीमत पर न करे. पाकिस्तान को भी सचेत किया जाये कि उसकी नेपाल तक पहुंच भारत से ही है.

अन्तर्राष्ट्रीय शक्तिशाली और महत्वपूर्ण समुदाय से संबंधों में भी महाराजा अमेरिका, इंग्लैण्ड और जापान के साथ सम्पर्कों को बढ़ा रहे हैं. जापान को उन्होंने इसके लिये तैयार कर लिया कि उससे नेपाल को विकास सहायता का प्रवाह निरंतर बना रहे. इंग्लैण्ड को फिर से सैनिक सहायता के लिये आग्रह किया गया है. शाही व्यवस्थाओं का बड़ा हिस्सा तो इस पर केंद्रित है कि वह अमेरिका को भारतीय दृष्टिकोण से दूर करें. यह महत्वपूर्ण है कि नेपाल में अमेरिकी प्राथमिकता आतंक से लड़ाई की है न कि प्रजातंत्र की वापसी में. यह महाराज के सत्ता परिवर्तन के तर्क के अधिक निकट है. इसीलिये महाराजा ने अमेरिकी राजदूत से मिलने का निर्णय किया और भारत के राजदूत को प्रतीक्षारत रखा, जो नई दिल्ली का संदेश देने आया था.

भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिये कि अमेरिका नेपाल में प्रजातंत्र के प्रति अपने समर्थन में न डगमगाए और न ही वहां लोकतन्त्र की पुनर्स्थपना के भारतीय निश्चय को कमजोर करे तब भी नहीं जबकि अमेरिकी विदेश सचिव कान्डोलिज़ा राइस इन्हीं तर्कों पर भारत से बातचीत करती हैं. यहां यह याद करना गलत नहीं होगा कि उन्होंने पाकिस्तान के संदर्भ में कहा कि अमेरिका प्रजातंत्र के लिये विस्तार के प्रयास को आतंकवाद विरोधी मित्रों को समर्थन देने की आवश्यकता से संतुलित करेगा. महाराजा स्वाभाविक रूप से इसे एक नये अवसर के रूप में देखते हैं क्योंकि इसमें पूर्व अमेरिकी अधिकारियों ने स्पष्ट रूप से कहा है कि वे भारत द्वारा नेपाल में की गई पहल से ही निर्देशित होंगे. अमेरिका ने नेपाल की सैनिक सहायता को जटिल कानूनी-प्रक्रिया के अन्तर्गत रोका नहीं है. यदि महाराजा किसी तरह से भारत के दृष्टिकोण और उसके अन्तर्राष्ट्रीय समर्थन में सेंध लगा पाते हैं तो उससे भारत की स्थिति कमजोर होगी. भारत की नेपाल नीति में पूर्व में एक शरारत पूर्ण समझौते की प्रवृत्ति रही है जिसे आन्तरकिक राजनीतिक दबाव और बाह्यय रणनीतिक सरोकारों ने प्रभावित किया है. भारत को अब यह दिखाना होगा वह दबाव से मुक्त हो गया है.

यह नीति फरवरी के सत्ता परिवर्तन से ध्वस्त हुई है. यह दुर्भाग्य पूर्ण है कि भारतीय वक्तव्य अब भी संवैधानिक शक्तियों की एकता की बात करता है जिसका अर्थ राजनीतिक दलों और महाराजा के बीच सहयोग है. नेपाल में लोकतन्त्र के सामान्य मिजाज़ में बदलाव आ गया है. विशेषकर राजनीतिक दलों और काठमाण्डू से बाहर रह रहे लोगों में नेपाल का अस्सी प्रतिशत युवा माओवादी दृष्टिकोण ‘बहु-राजनीतिक दलों वाले गणतंत्र’ के विचार से सहमत है.

फरवरी के शाही सत्ता परिवर्तन के बाद संवैधानिक राजतंत्र के विश्वास को गहरा आघात लगा है. भारत को अपना दृष्टिकोण लोकप्रिय जन आकांक्षाओं के अनुरूप ही सुदृढ़ करना होगा. पिछले पचास वर्षों में हमारी नीति स्थिरता और राजतंत्र के ईर्दगिर्द ही विकसित हुई है. इसे आगे बढ़ाना हमारे प्रजातंत्र के विश्वास को ही कम करेगा. हमें यही स्पष्ट करना होगा कि नेपाल के आम जन क्या चाहते हैं- एक रस्मी राजतंत्र या एक गणतंत्र.

यदि भारत को महाराजा के सत्ता परिवर्तन को पीछे ढकेलना है तो उसे सुरक्षा आपूर्ति पर रोक से आगे जाकर कई उपलब्ध आर्थिक और राजनीतिक विकल्पों का प्रयोग करना होगा. 1988-89 में, अन्तर्राष्ट्रीय विरोध के चलते हुये भारत ने नेपाल को व्यापार और परागमन की विशेष सुविधायें वापस ले ली थीं. भारत ने यह निर्णय लिया कि वे सुविधायें जिनका लाभ नेपाल में सामान्यजन को होता है उन्हें फिर से आरम्भ किया जा सकता है किन्तु यह सुनिश्चित करना होगा कि शाही व्यवस्था इस अपने लाभ के लिये उपयोग में न लेने लगे या इस अपनी व्यवस्थाओं के लिये नैतिक समर्थन न मानने लगे.

खुली और रचनात्मक प्रजातांत्रिक राजनीति के लिये व्यापक राजनीतिक सहमति को विकसित करने के लिये भारत नेपाल में सुविधा प्रदान कर सकता है. भारत को वास्तविक राजनीतिक स्वतंत्रता के लिये आग्रह करना चाहिये. अन्तर्राष्ट्रीय दबाव को एक करने के लिये महाराजा उन राजनीतिज्ञों का उपयोग कर सकते हैं जो नकली प्रजातंत्र में आस्था रखते हैं और इन्हें वह आसानी से अपनी इच्छा के अनुरूप ढाल सकते हैं. नई दिल्ली के कुछ दुस्साहसी स्तम्भकार नेपाल में सैनिक हस्तक्षेप की बात करते हैं, जिन्हें माओवादियों के विरुद्ध भी माना जाये तब भी वह अनुत्पादक होगा.

भारत को राजनीतिक शक्तियों का समर्थन करना चाहिये जिनमें माओवादी भी सम्मिलित हों. भारत के नीति निर्माण और सुरक्षा संस्थानों में नेपाल के माओवादियों के प्रति भय का वातावरण है, जो अतार्किक है और बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है. उनके भारत में उग्रवादी और अलगाववादी समूहों के साथ संबंध, भारत विरोधी भाषा और सैनिक विजय की संभावना भारत के शासक अभिजनों की चिन्ता का विषय है. एक सही और भावुकता से परे आंकलन यह सुझाता है कि माओवादी इस स्थिति में नहीं हैं कि सैनिक रूप से नेपाली राज्य को अपने आप से पराजित कर सत्ता को प्राप्त कर ले, किन्तु वे नेपाल में लम्बे समय से उपेक्षित और दलित ग्रामीण गरीबों की औचित्यपूर्ण आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं. इसीलिये वे नेपाल के राजनीतिक दलों के साथ बहु-दलीय व्यवस्था में कार्य करना चाहते हैं, यदि राजा लोगों को पूर्ण और प्रमाणिक सत्ता प्रदान करते हैं.

उनके भारत के माओवादियों और जातीय विलगाववादियों से व्यापक सम्पर्क हैं किन्तु ये तो केवल विभिन्न कार्यवाहियों और वैचारिक संवाद से ही जुड़े हैं. उनका भारत विरोधी संवाद न तो नया है और न ही उनका अपना, क्योंकि उनकी सभी मांगों को पहले भी राजा और राजनीतिक दल उठा चुके हैं.

वास्तव में कुछ माओवादी नेता जैसे बाबूराम भट्टाराय खुले तौर पर यह कह चुके हैं कि वे जब भी सत्ता में आयेंगे भारत के प्रति उनके दृष्टिकोण व्यवहारिक आधारों पर भारत जैसी स्थिति वाले पड़ोसी के प्रति जैसा होना चाहिये वैसा होगा.

भारत इस बात पर बार-बार यह कह चुका है कि नेपाल में माओवादी विद्रोही गतिविधियों का कोई सैन्य समाधान नहीं है. यह वह समय  है जब राजनीतिक हल के लिये सुनिश्चित पहल की जानी चाहिये. भारत में नीति निर्माताओं की यह जिम्मेदारी हैं कि वे दीर्घकालीन आधार पर भारत के लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुये अपनी नीतियों को नेपाल के व्यापक समूहों की आकांक्षाओं के अनुरूप बनाये. यदि भारत यह करने में असफल रहता है और राजनीतिक स्थिरता के लिये केवल राजतंत्र के लिये कार्य करता है तो इससे न केवल प्रजातंत्र के हितों का नुकसान होगा वरन भारत की स्वयं की क्षेत्रीय शक्ति की विश्वसनीयता को ठे पहुंचेगी.

(पुनर्लेखन : डॉ अरुण चतुर्वेदी, पूर्व-विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान विभाग, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर्, राजस्थान, एवं शोधार्थी शोध-मण्डल)

प्रस्तुत लेख ‘सेमीनार’ संख्या 548, अप्रैल 2005 से साभार उद्धत. मूल लेख ‘इंडिया एण्ड नेपाल क्राइसिस : नेबर्ली कन्सर्न्स’ शीर्षक से प्रकाशित.

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