राज्य, नागरिक – समाज एवं लोकतंत्र

सत्य प्रकाश दास : वर्तमान सन्दर्भ में जनमानस द्वारा नागरिक समाज की अवधारणा को एक लोकतान्त्रिक सरकार के कुशल संचालन एवं क्रियान्वयन के लिये व्यापक एवं तीव्रतम गति से आत्मसात किया जा रहा है. परन्तु यह सर्वथा राज्य के अधीन ही कार्यरत रहता है तथा इसमें स्वराज्य के तत्व विद्यमान रहते हैं. नागरिक समाज के पुनरोदय ने राज्य को बल प्रदान किया है तथा लोकहित के लक्ष्य की प्राप्ति को सुगम बनाया है. लोकतांत्रिक सरकार के सफल क्रियान्वयन के लिये नागरिक समाज एक खोज है तथा लोकतांत्रिक शासन में विद्यमान अवगुणों की समाप्ति के लिए वह एक प्रभावशाली पूर्वावस्था है, विशेषत: विकासशील समाजों में आर्थिक लक्ष्य व विकास की प्राप्ति के लिये.

लोक-कल्याणकारी राज्य की अवधारणा बीसवीं शताब्दी की एक महत्वपूर्ण देन है. एक कल्याणकारी राज्य में सरकार को विविध कार्यों को सम्पन्न करना होता है. कल्याणकारी राज्य अपने नागरिकों को सामाजिक सेवा का अथाव सागर उपलब्ध कराता है किन्तु समय के साथ नागरिकों को सामाजिक सेवा के अवसर प्रदान करने में राज्य पर कार्यों का असीमित भार दृष्टिगोचर होता है. जन-कल्याणकारी राज्य सकारात्मक स्वतन्त्रता का प्रतिपादन करता है जिसमें अधिनायकवादी प्रवृत्ति स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहती है. यह नागरिकों के समस्त लक्ष्यों को आत्मसात कर लेती है. फलस्वरूप व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाने के स्थान पर उन्हें नैतिक रूप से पंगु बना देती है. यह एक प्रकार से निर्भरता व अधीनता की प्रवृत्ति को प्रदर्शित करती है. अतएव जनता द्वारा राज्य के अधीनस्थ एवं अन्तर्गत इसके विकल्प के रूप में एक साधन की खोज की जाती है और यह नागरिक समाज के पुनर्जीवन को अवसर प्रदान करती है. एक समाजिक समुदाय राज्य की शक्ति की विशिष्टता के साथ स्वयं के आत्मनिर्भर संगठन के लिये सक्षम होता है. इस प्रकार नागरिक समाज राज्य की सत्ता के अधीन कार्यरत होता है एवं इसमें राज्य को चुनौती देने की प्रवृत्ति कदापि परिलक्षित नहीं होती. नागरिक समाज एक प्रकार से असंगठित भीड़ को संगठन का स्वरूप प्रदान करता है. नागरिक समाज स्वराज्य अवधारणा के अधीन संगठन का प्रतिनिधित्व करता है जो राज्य में आत्मनिर्भरता में समाहित है. यह एक ऐसा संगठन है जो राज्य की शक्ति को न्यून करता है, साथ ही साथ, समाज में व्यक्तियों एवं विभिन्न समूहों को अपने हितों को प्रत्यक्ष रूप में सम्पादित करने में सहायता देता है. तथापि नागरिक समाज लोकतन्त्र में प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के विकास के समान अवसर प्रदान किए जाते हैं.

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नागरिक समाज एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें बौद्धिक दृढ़ संकल्प व्यक्ति ऐच्छिक रूप से दूसरों के साथ सामाजिक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए प्रवेश करते हैं. यह सामाजिक सम्बन्ध समानता, विश्वास, सम्मान, घनिष्ठ रुचियों एवं नियमों, मान्यताओं और मूल्यों के आज्ञापालन व अनुसरण पर आधारित होता है. सामाजिक सम्बन्ध संगठनात्मक जीवन के रूप में विकसित होते हैं तथा नागरिक संगठन के उदय के लिए उत्तरदायी होते हैं. नागरिक संगठन सामान्य जनता के कल्याण के लिए सामाजिक सामंजस्य एवं सहकारिता की प्रवृत्तियों की स्थापना करते हैं तथा इस प्रकार लोकतान्त्रिक सिद्धान्तों का क्रियान्वयन होता है.

आज वह युग है जिसमें नीति निर्माण में विकेन्द्रीकरण, स्थानीय स्वशासन, आर्थिक सुधार एवं बाज़ार व्यवस्था में विश्वास इत्यादि प्रवृत्तियों पर बल दिया जा रहा है. इन परिस्थितियों में नागरिकों की सहभागिता तथा ऐच्छिक संगठनों द्वारा सामान्य कृत्य जनता को पूर्ण सन्तुष्टि प्रदान करने में निश्चित रूप से सक्षम हैं.

एक नागरिक समाज की वास्तविक शक्ति सामाजिक पूंजी की उपलब्धता पर निर्भर होती है. सामाजिक पूंजी मौद्रिक एवं मानवीय पूंजी से नितान्त भिन्न होती है. साधारण शब्दों में हम कह सकते हैं कि सामाजिक पूंजी सामुदायिक स्रोतों से सम्बद्ध है जो एक समुदाय में अन्तर्निहित होती है. यह कुछ सीमा तक अस्पष्ट एवं अव्यक्त होती है किन्तु जब प्रभावशाली रूप में इसका उपयोग किया जाता है तो इसके परिणाम स्वष्टत: परिलक्षित होते हैं. सामाजिक पूंजी को ‘अन्तवैंयक्तिक विश्वास’ के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जिसके माध्यम से जनमानस परस्पर सहयोगी रूप में कार्य कर सकता है. सामाजिक पूंजी सामाजिक संगठन के तत्वों से भी सम्बद्ध है यथा विश्वास, मूल्य, संरचना, संस्थाएं, परस्पर सम्बन्ध इत्यादि, जो समाज की कुशलता को समन्वयात्मक कृत्यों के क्रियान्वयन द्वारा सुधार सकती है. सामाजिक पूंजी का स्तर विकास के लिए अर्थपूर्ण क्रियाकलापों में निहित है यथा शैक्षणिक विकास, स्वास्थ्य सेवाएं एवं ग्रामीणोत्थान इत्यादि.

एक दृढ़ नागरिक समाज सरकारी एवं निजी क्षेत्र को समान रूप से नियंत्रित करने में सक्षम है. नागरिक समाज जनता को मुखर बनाता है, सहभागिता को प्रकाश में लाता है एवं स्वतन्त्रता के अमूल्य मंत्र का वितरण करता है, किन्तु निजी क्षेत्र से पृथक एवं भिन्न, इसका उद्देश्य जनहितकारी कृत्यों का संपादन है.

टॉकविले के अनुसार नागरिक समाज अपने नागरिकों के सामान्य विषयों पर विशेष ध्यान देता है तथा इसका उद्देश्य सभ्यता के संरक्षण में अन्तर्निहित है अन्यथा समाज एवं राज्य में सर्वत्र बर्बरता एवं असभ्यता के तत्व दृष्टिगोचर होने लगते. टॉकविले का मत है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व के जनहितकारी एवं लोककल्याणकारी लक्ष्यों की प्राप्ति में नितान्त निष्क्रियता के कारण संगठन अपरिहार्य है. व्यक्ति एवं जनता की आवश्यकताओं को पूर्ण करने के लिए ये संगठन एकजुट हुए एवं उनके प्रयास निजी आवश्यकताओं के लिए सकारात्मक रूप से प्रभावी हुए. उनका विश्वास है कि ये संगठन राज्य शक्ति के समक्ष लोकतांत्रिक यंत्र के अनुसार कार्यरत हैं. इस प्रकार के संगठन राज्य में केन्द्रीकृत नौकरशाही एवं असहनीयता के विरुद्ध विषहर के समान हैं.

उदारवादियों के अनुसार, लोकतांत्रिक मूल्यों एवं आत्मा के संरक्षण के लिए नागरिक समाज को एक अपरिहार्य माध्यम की संज्ञा दी जाती है. उदारवादी विचारधारा राज्य के हस्तक्षेपों से रहित एक ऐसे क्षेत्र की स्थापना की आवश्यकता पर बल देती है जिसमें व्यक्ति एवं समाज की प्रत्यक्ष एवं परस्पर सम्बद्धता हो तथा जिसमें राज्य को एक भी ऐसा अवसर न प्रदान किया जाए जो नागरिक समाज को दबाए या कुचले. व्यक्ति राज्य के अतिक्रमण एवं नौकरशाही प्रशासन से पूर्ण रूप से स्वतन्त्र है. अपनी स्वराज्य की अवधारणा तथा प्रकृति को बनाये रखते हुए, जनसामान्य के कल्याण के कार्यों को गति प्रदान करते हुए नागरिक समाज समुदाय की कल्याणकारी भावना के अनुरूप कार्य कर सकता है.

मार्क्सवादी नागरिक समाज की उदारवादी अवधारणा की कठोर शब्दों में निन्दा व आलोचना करते हैं तथा उनका मत है कि नागरिक समाज राज्य का ही एक विस्तृत रूप है जो बुर्जुआ वर्ग द्वारा नियंत्रित है तथा इस प्रकार मजदूर वर्ग के लिए शोषणकारी एवं आक्रामक है. मार्क्स का मत है कि जब राज्य स्वयं दलितों, शोषितों एवं अधिकार विहीन व्यक्तियों की रक्षा के लिए अयोग्य एवं असमर्थ है तो यह तथ्य सर्वथा अतार्किक एवं भ्रमात्मक है कि सामुदायिक सहभागिता नागरिक समाज के माध्यम से इस वर्ग के लिए किसी भी प्रकार से लाभकारी हो सकती है. इसका लाभ भी मात्र बुर्जुआ वर्ग को ही प्राप्त होगा.

नागरिक समाज के क्षेत्र में प्रथम बार यह तत्व परिलक्षित होता है कि व्यक्ति को निजी सम्पत्ति का लाभ प्राप्त हुआ है तथा उसके सिद्धान्तों ने स्वामी व दास, शोषक एवं शोषित तथा अधिकार-प्राप्त व अधिकार-विहीन जैसे भेदभावों के अस्तित्व को ही समाप्त कर दिया है. उदारवादियों की दृष्टि में यही वह नागरिक समाज है जिसकी उन्होंने परिकल्पना की थी. किन्तु मार्क्स नागरिक समाज के तथ्य को कभी भी मान्यता प्रदान नहीं करता.

अब तक सर्वथा असंगठित एवं दिशाहीन नागरिक समाज की अवधारणा का पुनर्जीवन एवं समकालीन समय में इसकी महत्ता अवश्य ही स्वागत करने योग्य है. सामान्य जनता के कल्याण के लिए व्यक्ति की स्वार्थी एवं वैयक्तिक प्रवृत्ति का स्थान सहकारिता की प्रवृत्ति ने ले लिया है जो नागरिक समाज के माध्यम से सम्भव हुआ है. जो जनता अपने आपोक लोकतांत्रिक शासन में भी राज्य के समक्ष असहाय एवं अशक्त अनुभव करती थी, नागरिक समाज ने जनहितकारी लक्ष्यों को प्राप्त कराने में उसे पूर्णतया समर्थ बना दिया है.

प्रस्तुत लेख ‘द इंडियन जर्नल ऑफ पोलिटिकल साइन्स’ अंक 62, संख्या 2, जून 2001, पृष्ठ 241-252 से साभार उद्धृत. मूल लेख ‘स्टेट, सिविल सोसाइटी एण्ड डिमोक्रेसी : ए नोट’ शीर्षक से प्रकाशित.

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